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विषमता और असमानता के बीच अर्थव्यवस्था संभालती महिलाएं

Fri, 25 Sep 2020 07:49 AM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Fri, 25 Sep 2020 07:49 AM IST
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Women handle the economy amidst gender inequality, there is need to respect for her labor and evaluation
हमारे देश में घरेलू महिलाओं के श्रम को इसी अदृश्य श्रम के अंतर्गत रखा गया जिसका न कोई मूल्य है न कोई मोल।

कोविड-19 महामारी का सबसे ज्यादा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ा है। इसके कारण वैश्विक स्तर पर देश की सीमाओं से लेकर व्यापार तक को कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया, जिसका सीधा प्रभाव देश की आर्थिक स्थिति पर देखने को मिल रहा है। अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। उत्पादन की कमी के कारण रोजगार सीमित हो रहे हैं और श्रम का तेजी से अवमूल्यन हो रहा है। 

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देश को इस संकट से उबारने के लिए लगातार इस पर चर्चा और बहस जारी है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए नए विकल्पों की तलाश की जा रही है। इस महामारी के समय में विश्वव्यापी बंदी के कारण जब आम आदमी की आर्थिक स्थिति बदतर हो चली है तो उसमें उसे कुछ राहत मिल सके, इस पर लगातार विचार किया जा रहा है। अर्थव्यवस्था और जीडीपी की वृद्धि में रोजगार और श्रम का विशेष महत्व होता है। किंतु रोजगार की कमी और श्रम के अवमूल्यन के कारण जीडीपी पर लगातार नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है। लेकिन यह हमारे चर्चा का विषय नहीं है। 
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उत्पादन और अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए उसके पीछे बहुत से अदृश्य श्रम होते हैं। जिनके होने या न होने से जीडीपी के घटने व बढ़ने का पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। क्योंकि हमारी आर्थिक व्यवस्था में इस अदृश्य श्रम का कोई मूल्य निर्धारित नहीं है। जिस श्रम का मूल्य नहीं होगा वह अर्थव्यवस्था को कैसे चला सकती है? जीडीपी में उसकी भूमिका क्या हो सकती है? उत्पादन व विकास के इस अर्थतंत्र में यह अदृश्य श्रम हमेशा उपेक्षित ही रहा है। 
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हमारे देश में घरेलू महिलाओं के श्रम को इसी अदृश्य श्रम के अंतर्गत रखा गया जिसका न कोई मूल्य है न कोई मोल। जिसका न ही अर्थव्यवस्था में कोई योगदान है न ही जीडीपी में। जिसके कारण उसका श्रम सदैव उपेक्षित रहा और उनके काम को ‘कुछ नहीं’ के रूप में पहचाना जाता है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि श्रम का महत्व उसके मूल्य से अधिक व्यक्ति की पहचान से जुड़ा है। श्रम के महत्व व मूल्य के आधार पर ही व्यक्ति की सामाजिक व पारिवारिक पहचान निर्मित होती है।

कोविड-19 महामारी के समय में सबसे अधिक दोहन अगर किसी का हुआ है तो वह यही अदृश्य श्रम है। उसमें भी कामकाजी घरेलू महिलाओं की स्थिति ओर भी चिंतनीय व दयनीय है। वे श्रम की दोहरी मार से जूझ रही हैं। ऐसा नहीं है कि कोविड 19 महामारी से पूर्व वे इन स्थितियों से नहीं जूझ रही थी। किंतु उस समय घरेलू सहायिका उनके श्रम का कुछ हिस्सा बांट लेती थी। लेकिन महामारी के बाद जहां हर कोई स्वयं को सुरक्षित करना चाहता है तो यह सहयोग भी कामकाजी महिलाओं से छीन गया। 

घरेलू श्रम की हिस्सेदारी पर जब भी परिवारों में बहस होती है तो उसका हल घरेलू सहायिका का रखा जाना ही होता है। मगर महामारी ने सभी को घरों के भीतर कैद कर दिया है। ऐसे में अधिकांश महिलाएं अकेले ही घरों में काम कर रही है। यह वही काम है जिसे अमूमन समाज में पूछे जाने पर कि ‘आप की पत्नी क्या काम करती है?’ और उत्तर मिलता है ‘कुछ नहीं’ क्योंकि वह ‘हाउस वाइफ’ है। 

वास्तविक स्थिति यह है कि ‘पुरुष कामगार तभी काम कर सकता है जब उसकी पत्नी घर में उसके लिए खाना बनाती है और सफाई करती है। न केवल वह उसका ख्याल रखती है और उसकी सेवा करती है बल्कि वह घर की उसकी तमाम जिम्मेदारियां मसलन’ उसके छोटे बच्चों का लालन–पालन और बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल आदि का भी निर्वाह करती है’। 

Women handle the economy amidst gender inequality, there is need to respect for her labor and evaluation
हम सभी ऐसे परिवेश में जी रहे हैं जो लैंगिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित है

ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय महिलाएं और लड़कियां हर रोज बिना भुगतान वाला देखभाल का काम करने में तीन अरब घंटे खर्च करती हैं। अगर इसकी एक कीमत तय की जाए तो यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लाखों करोड़ रुपये का योगदान होगा। ऐसे में आप खुद ही सोचिए कि अगर महिलाओं के श्रम का मूल्य निर्धारित किया जाता तो अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक उन्हीं का योगदान दर्ज होता। 

लेकिन हम सभी ऐसे परिवेश में जी रहे हैं जो लैंगिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित है तभी तो हमें घरेलू श्रम पर कभी चर्चा सुनने को नहीं मिलती यदि होती भी है तो महिलाओं को उनका पारिवारिक दायित्व बोध स्मरण करा दिया जाता है और फिर यह विषय जिस पर बहस और सामाजिक स्तर पर स्वीकार्यता होनी जरुरी है। वह स्त्री धर्म बना दिया जाता है। श्रम शक्ति के उत्पादन का केंद्र घर है और उसी में किया गया श्रम मूल्यहीन हो जाता है। उसकी पहचान सामाजिक व पारिवारिक व्यवस्था में गौण हो जाती है जिसका सीधा संबंध उसके श्रम से है।

महिला श्रम व उनकी पहचान के मुद्दे पर विभिन्न सामाजिक संगठनों व कार्यकर्ताओं द्वारा समय-समय पर आवाज उठाई जाती रही है बहस होती रही है। कामकाजी महिलाओं द्वारा सत्तर के दशक में घरेलू श्रम के मूल्य निर्धारण पर भी बहस चली थी। उस बहस में दो धड़े उभर कर सामने आए एक वह जिनका मानना था कि महिलाओं को घरेलू श्रम का पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए। 

जैसा कि चेंज ऑर्गनाइजेशन में दायर सुबर्णा घोष की पिटिशन में साइन करने वाली एक सहयोगी महिला जयश्री पाटिल भी इस बात का समर्थन करती है और कहती हैं, "मोदीजी, कृपया सभी महिलाओं की मदद करें और भारतीय महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव करें। इस मुद्दे को हल करने के लिए कानून होना चाहिए। सभी पुरुषों को समान रूप से काम करना चाहिए। अपनी पत्नी के साथ घर में और अगर वे काम नहीं करते हैं, तो महिलाओं को वेतन मिलना चाहिए, लेकिन बाई की तरह नहीं, इसे और अधिक करना चाहिए क्योंकि महिलाएं प्यार और जुनून के साथ घर में काम करती हैं। यह एक सख्त कानून होना चाहिए, अगर पुरुषों की मदद नहीं होती है, तो उन्हें अपनी पत्नी के खाते में कुछ फिक्स राशि का भुगतान करना होगा और अगर वह पैसा हर महीने नहीं आता है, तो बैंक को घर और बैंक को नोटिस भेजना चाहिए उसके बाद कानूनी कार्रवाई।"

वहीं एक अन्य पिटिशन साइनकर्ता ने लिखा, "यह सब लड़कों की परवरिश का कारण है, उन्हें भी बचपन से घरेलू काम सिखाया जाना चाहिए।" 70 के दशक में बहस के दूसरे धड़े का सोचना था कि यदि महिलाओं को घरेलू श्रम का पारिश्रमिक दिया जाता है तो वह घर में सीमित हो जाएंगी और उनके लिए आगे बढ़ने के अवसर कम हो जाएंगे। ऐसे में पुरुष महिलाओं के घरेलू काम का कोई दबाव महसूस नहीं करेंगे और महिलाएं पुरुषों के काम को कोई प्रोत्साहन नहीं देगी। यह विचार लैंगिक समानता को लाने में सहायक नहीं बन सकेगा लैंगिक असमानता को समझदारी और साझेदारी के साथ सहयोग करके ही कम किया जा सकता है।

अगर हम भारतीय सामाजिक संदर्भों में देखें तो यह पाते हैं कि भारतीय परिवार कितने ही शिक्षित व उच्च पदों पर कार्यरत्त क्यों न हो, वह भी लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रसित है। उनमें घर के काम झाड़ू, बर्तन, कपड़े, खाना व अन्य संबंधित कार्य महिला ही करेगी, का भाव होता है। ऐसे में सुबर्णा घोष द्वारा ‘चेंज ऑर्गेनाइजेशन’ के जरिए इस मामले में एक याचिका दायर की गई है।  साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस लैंगिक विभेद की मानसिकता पर दखल देने को कहा है।

Women handle the economy amidst gender inequality, there is need to respect for her labor and evaluation
भारतीय पुरुषों को कहा जाए कि वह भी घर के कामों में बराबर की हिस्सेदारी दें

सुबर्णा ने लिखा है, "माननीय प्रधानमंत्री जी आप अपने अगले संबोधन में भारतीय पुरुषों को कहें कि वह भी घर के कामों में बराबर की हिस्सेदारी दें, उनका यह भी प्रश्न है कि पुरुष क्यों नहीं घर के कामकाज़ में हिस्सा बँटाते हैं?" वे चाहती हैं कि प्रधानमंत्री इस मामले में दखल दें, उपाय सुझाएं और पुरुषों को इस बात के लिए उत्साहित करें कि पुरुष भी घर का काम बराबरी से करने की अपनी जिम्मेदारी को समझें। 

उनके द्वारा दायर याचिका पर जनसमुदाय का भारी समर्थन मिल रहा है, जिसमें महिलाओं के साथ भी पुरुष भी शामिल है। उनकी इस अपील ने स्त्री श्रम के मुद्दे को एक बार पुन: बहस के केंद्र में ला दिया है। ‘इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में भारत के शहरों में महिलाओं ने बिना भुगतान वाले देखभाल के काम करने में 312 मिनट खर्च किए। इसके उलट पुरुषों ने इस काम पर महज 29 मिनट खर्च किए। वहीं गांवों में महिलाओं के लिए यह समय 291 मिनट रहा जबकि पुरुषों ने केवल 32 मिनट इस पर दिए। 

इससे आप समझ सकते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था को संभालने वाले अदृश्य हाथ इन्हीं महिलाओं के हैं जिन्हें कभी उनके कामों का उचित मूल्य तो दूर उचित सम्मान भी नहीं दिया गया। इसी वजह से कोविड 19 महामारी के समय इसी कभी न खत्म होने वाले घरेलू काम व परिवार में बच्चों व बुजुर्गों की जिम्मेदारी के कारण अधिकांश महिलाएं काम छोड़ रही है या अवसाद का शिकार हो रही है। महिलाओं की यह स्थिति भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक फलक पर भी लगभग एक जैसी है। 

सुबर्णा घोष की तरह ही सिमोन रैमोस, जो इंश्योरेंस मार्केट में ब्राजील की महिला संघ की सलाहकार हैं और पेशे से लेखक भी है, मानती हैं कि इस महामारी में महिलाओं पर काम का अतिरिक्त दबाव बना है। उनका घर में रहकर बच्चों और घर के सभी सदस्यों की देखभाल के साथ काम करना संभव नहीं है। एक कामकाजी महिला को दो शिफ्टों में काम करना होता है एक ऑफिस और एक घर। ऐसे में घर और बाहर के कामों के बीच बिना पारिवारिक सहयोग के तालमेल बैठाना संभव नहीं है। 
 

हमारे भारतीय समाज में जहां लैंगिक असमानता एक बड़ा मसला है इसे जब तक दूर नहीं किया जाएगा, परिवार व समाज में महिलाओं के इस अदृश्य कहे जाने वाले सदृश्य व सबसे महत्वपूर्ण श्रम की अवहेलना होती रहेगी। यहां प्रश्न महिलाओं के श्रम के उचित मूल्य का ही नहीं अपितु यह प्रश्न उनकी पहचान से जुड़ा है जिसे उचित सम्मान दिया जाना चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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