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पश्चिम बंगाल से ग्राउंड रिपोर्ट: सवालों के घेरे में पश्चिम बंगाल का पंचायत चुनाव

Tue, 27 Jun 2023 02:35 PM IST
J K Singh जे के सिंह
Updated Tue, 27 Jun 2023 02:35 PM IST
सार

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा और इसमें लोगों के मारे जाने की कई दशक पुरानी परंपरा है। अभी तक नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी करने में ही 10 लोगों की हत्या हो चुकी है। एक नजर डालते हैं पिछले आंकड़ों पर। 2003 में 70,  2008 में 36, 2013 में 39 और 2018 में 40 लोगों की हत्या हुई थी। 

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west bengal panchayat elections 2023 violence controversy and political issues in bengal tmc
West Bengal Panchayat Election - फोटो : Social Media

विस्तार

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव 8 जुलाई को होना है। तारीख तो तय है, पर लोगों के जेहन में कई सवाल उठ रहे हैं। नामांकन दाखिल करने के दौरान हुई हिंसा में 10 लोगों की मौत हो चुकी है। इस वजह से लोग आतंकित हैं। जाहिर है कि ऐसे में पहला सवाल यह है कि इस चुनाव में और कितनी लाशें गिरेंगी। राज्यपाल और राज्य चुनाव आयुक्त के बीच टकराव के कारण सवाल है कि क्या पंचायत चुनाव निर्धारित तारीख को हो पाएंगे? हाईकोर्ट में मामला दायर होने के कारण यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

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आइए शुरुआत करते हैं पहले सवाल से

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा और इसमें लोगों के मारे जाने की कई दशक पुरानी परंपरा है। अभी तक नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी करने में ही 10 लोगों की हत्या हो चुकी है। एक नजर डालते हैं पिछले आंकड़ों पर। 2003 में 70,  2008 में 36, 2013 में 39 और 2018 में 40 लोगों की हत्या हुई थी। 

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अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 2003 में 70 लोग मारे गए थे। इसकी वजह यह थी कि उस दौरान विपक्ष मजबूत था। इस बार भी विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच कड़ा मुकाबला है, इसलिए संभावित मौत का आंकड़ा लोगों को सता रहा है। इस बार पंचायत चुनाव में करीब 76 हजार सीटों पर चुनाव होना है और 20585सीटों पर विपक्ष के उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल ही नहीं करने दिया गया है। हालांकि 2018 में तो करीब 34 फीसदी सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बगैर किसी मुकाबले के चुनाव जीत गए थे। इस बार भाजपा के 57 हजार, वाममोर्चा के 49 हजार और कांग्रेस के 18 हजार उम्मीदवार चुनावी मैदान में मौजूद हैं। इस कड़े मुकाबले के कारण ही आम लोगों में खौफ है। 

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West Bengal Panchayat Election - फोटो : Social Media

शांत और निष्पक्ष चुनाव कराए जाने के मामले में चुनाव आयुक्त की भूमिका ही सवालों के घेरे में है। आयोग ने केंद्र सरकार से चुनाव के दौरान 22 कंपनी सेंट्रल फोर्स देने की मांग की थी, यानी बंगाल के 23 जिलों के लिए सेंट्रल फोर्स के कुल 17 सौ जवानों की मांग की गई थी। याद दिला दें कि 2013 के पंचायत चुनाव में सेंट्रल फोर्स की 800 से अधिक कंपनियां तैनात की गई थी। यह चुनाव पांच चरणों में कराए गए थे। इस बार एक ही दिन में चुनाव कराया जाना है।

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग ने राज्य सरकार के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है। राज्यपाल के. वी.आनंद बोस चुनाव आयोग की भूमिका से बेहद नाराज हैं। उन्होंने नामांकन के दौरान हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया है। यह बात राज्य सरकार को बेहद नागवार लगी है। भाजपा और कांग्रेस की तरफ से पंचायत चुनाव के दौरान सेंट्रल फोर्स तैनात किए जाने को लेकर हाईकोर्ट में पीआईएल दायर की गई है। 

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West Bengal Panchayat Election - फोटो : Social Media

चीफ जस्टिस की बेंच ने सुनवाई के बाद आदेश दिया था कि राज्य के सात संवेदनशील जिलों में चुनाव के दौरान सेंट्रल फोर्स तैनात की जाए। इस पर अमल करने की बजाय राज्य चुनाव आयोग और राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए वापस हाईकोर्ट में भेज दिया। इसके बाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि बंगाल के सभी जिलों में सेंट्रल फोर्स तैनात की जाए और उनकी संख्या 2013 के पंचायत चुनाव के मुकाबले अधिक होनी चाहिए। चीफ जस्टिस के आदेश का पालन नहीं हुआ तो चुनाव आयोग के खिलाफ कंटेंप्ट का मामला दायर कर दिया गया है। 

चुनाव आयुक्त को जवाब देने का आदेश दिया है। इसकी सुनवाई 28 जून को होनी है। केंद्र सरकार ने सेंट्रल फोर्स की 300 से अधिक कंपनियों को पश्चिम बंगाल में भेज दिया है और 500 कंपनियों का अभी बाकी है। सरकार की तरफ से पैरवी करते हुए एडीशनल सॉलीसीटर जनरल ने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय  का हवाला देते हुए कहा है कि अगर 2013 के मॉडल पर पंचायत चुनाव कराया जाता है तो केंद्र सरकार को सेंट्रल फोर्स देने में सहूलियत होगी। 

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बंगाल पंचायत चुनाव - फोटो : Self

इसके अलावा 2013 में पांच चरणों में चुनाव कराए गए थे। इस बार तो एक ही दिन चुनाव कराए जाने की योजना है, इसलिए संशय बना हुआ है कि क्या 8 जुलाई को पंचायत चुनाव हो पाएंगे? अगर हाईकोर्ट 2013 के मॉडल का हवाला देते हुए पंचायत चुनाव कराए जाने का आदेश देता है तो क्या होगा?

इधर, अंतिम सवाल है कि राज्यपाल ने राज्य सरकार की सिफारिश पर राजीव सिन्हा को चुनाव आयुक्त के पद पर नियुक्त किया है। इसके बाद से ही पंचायत चुनाव को लेकर राज्यपाल और चुनाव आयुक्त बीच जबरदस्त टकराव बना हुआ है। 

राज्यपाल ने राज्य चुनाव आयुक्त की ज्वाइनिंग रिपोर्ट को स्वीकार करने से इंकार कर दिया है। इस वजह से उनके अपने पद पर बने रहने की वैधानिकता को लेकर सवाल खड़ा हो गया है। इस बाबत हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है। अगर उनकी नियुक्ति अवैधानिक हो जाती है तो उनकी तरफ से चुनाव के लिए जारी अधिसूचना वैधानिक कैसे हो सकती है। इस लिहाज से पचायत चुनाव के लिए 28 जून की तारीख बेहद अहम है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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