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Viksit Bharat: क्या विकसित भारत सिर्फ एक सपना रहेगा, या हम मिलकर इसे सच बनाएंगे?
सार
क्या हमें समय-समय पर अपनी नीतियों, व्यवस्थाओं और कानूनों की समीक्षा नहीं करनी चाहिए? हर देश बदलती परिस्थितियों के अनुसार सुधार करता है। भारत को भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्याय व्यवस्था और सामाजिक नीतियों पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए।
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विकसित भारत (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : AI Generated
विस्तार
देश का संविधान लागू हुए 76 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान भारत ने विज्ञान, अंतरिक्ष, रक्षा, तकनीक, लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था जैसे कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।
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फिर भी आज हम 2047 तक विकसित भारत बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जबकि कुछ ऐसे देश, जो हमसे बाद में स्वतंत्र हुए, आज विकसित देशों की श्रेणी में गिने जाते हैं।
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ऐसा क्यों है?
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके 140 करोड़ नागरिक हैं। जब भी देश पर कोई बाहरी संकट आया, पूरा देश एकजुट होकर खड़ा हुआ। चाहे 1965, 1971 या कारगिल जैसे युद्ध हों, या फिर गुजरात का भूकंप, उत्तराखंड की त्रासदी और कोविड महामारी। हर बार देश ने दिखाया कि एकता हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।
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लेकिन क्या हमारी जिम्मेदारी सिर्फ संकट के समय एकजुट होने तक सीमित है?
क्या हमें समय-समय पर अपनी नीतियों, व्यवस्थाओं और कानूनों की समीक्षा नहीं करनी चाहिए? हर देश बदलती परिस्थितियों के अनुसार सुधार करता है। भारत को भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्याय व्यवस्था और सामाजिक नीतियों पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए।
इन्हीं विषयों में एक है आरक्षण व्यवस्था
मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसका लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। साथ ही, देश में ऐसी व्यवस्था भी विकसित होनी चाहिए जिसमें हर युवा को उसकी योग्यता, मेहनत और क्षमता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिले।
इसका अर्थ यह नहीं कि सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों की अनदेखी की जाए। जिन लोगों को वास्तव में सहारे की जरूरत है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार, दिव्यांगजन, शहीदों के आश्रित और अन्य जरूरतमंद। उन्हें हर संभव सहायता और अवसर मिलना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि अवसरों का वितरण न्यायपूर्ण, पारदर्शी और प्रभावी हो।
सिर्फ आरक्षण ही नहीं, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं किसी विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार होनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिसमें किसी परिवार को इलाज के लिए आर्थिक रूप से टूटना न पड़े और कोई प्रतिभाशाली छात्र केवल आर्थिक कारणों से शिक्षा से वंचित न रहे।
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। हमारे पास ज्ञान है, कौशल है, संसाधन हैं और अपार संभावनाएं हैं। हिमालय से लेकर समुद्र तक, उपजाऊ भूमि से लेकर खनिज संपदा तक, प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाएं।
हमें जाति, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर यह सोचना होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसा भारत छोड़कर जाना चाहते हैं। ऐसा भारत जहां हर जरूरतमंद को अवसर मिले, हर मेहनती व्यक्ति को सम्मान मिले और हर नागरिक को आगे बढ़ने का समान मौका मिले।
विकसित भारत सिर्फ सरकारों के फैसलों से नहीं बनेगा। यह तब बनेगा जब हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझे, सुधारों पर रचनात्मक संवाद करे और देशहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।