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अल नीनो की आहट हमारे खेत, रसोई और अस्पताल तक
सार
अल नीनो कोई नई घटना नहीं है। सामान्यतः दो से सात वर्ष के अनियमित अंतराल पर मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है और उससे वायुमंडलीय परिसंचरण बदलने लगता है।
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अल नीनो का दिखने लगा असर।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
प्रशांत महासागर में हजारों किलोमीटर दूर पानी का असामान्य रूप से गर्म होना भारत में किसी बच्चे को डेंगू, किसान को सूखे, मजदूर को लू और पहाड़ के किसी गांव को आपदा के रूप में प्रभावित कर सकता है। जलवायु और स्वास्थ्य के इसी जटिल रिश्ते की ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन की 5 सितंबर को जारी ‘ग्लोबल पब्लिक हेल्थ सिचुएशन एनालिसिस—अल नीनो 2026’ ने दुनिया का ध्यान खींचा है।
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भारत को उन देशों में रखा गया है, जहां इस जलवायु घटना से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम गंभीर हो सकते हैं। डब्ल्यूएचओ का आग्रह बीमारी फैलने की प्रतीक्षा करने के बजाय जोखिम का पूर्वानुमान लगाकर तैयारी करने का है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 3 सितंबर की ताजा रिपोर्ट इस चिंता को और भी गंभीर बनाती है।
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उसके अनुसार अल नीनो अब पूरी तरह स्थापित हो चुका है और आने वाले महीनों में इसके अत्यंत प्रबल होने की संभावना है। फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना लगभग सौ प्रतिशत आंकी गई है। मध्य-पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंच चुका है और यह घटना वर्ष के अंत में चरम पर पहुंच सकती है।
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अल नीनो कोई नई घटना नहीं है। सामान्यतः दो से सात वर्ष के अनियमित अंतराल पर मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है और उससे वायुमंडलीय परिसंचरण बदलने लगता है। इसका प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर वर्षा और तापमान पर पड़ सकता है। भारत जैसे मानसून आधारित देश में इसलिए अल नीनो केवल मौसम का विषय नहीं, बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन, अर्थव्यवस्था और जनस्वास्थ्य का भी प्रश्न है।
इस बार स्थिति इसलिए भी ध्यान देने योग्य है कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन सितंबर-नवंबर के दौरान लगभग सभी भूभागों में सामान्य से अधिक तापमान की आशंका जता रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप भी इससे अछूता नहीं है। साथ ही हिंद महासागर में सकारात्मक ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ बनने का अनुमान है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि भारत पर पड़ने वाला वास्तविक प्रभाव केवल अल नीनो से तय नहीं होगा। हिंद महासागर और स्थानीय मौसम प्रणालियां उसके असर को बढ़ा, घटा या बदल सकती हैं। इसलिए अल नीनो को प्रत्येक सूखे, बाढ़ या बीमारी का अकेला कारण बताना वैज्ञानिक भूल होगी।
यही सावधानी स्वास्थ्य के मामले में भी जरूरी है। अल नीनो स्वयं डेंगू या मलेरिया पैदा नहीं करता। वह तापमान, वर्षा और आर्द्रता जैसी उन परिस्थितियों को बदल सकता है जिन पर मच्छरों का प्रजनन, जीवनचक्र और सक्रियता निर्भर करती है। कहीं अधिक वर्षा नए जलभराव पैदा करती है तो कहीं सूखे के कारण घरों में पानी जमा करने की मजबूरी मच्छरों के प्रजनन स्थल बढ़ा सकती है। डब्ल्यूएचओ को दक्षिण एशिया में मलेरिया, डेंगू और कुछ अन्य संक्रामक रोगों को लेकर इसी कारण चिंता है।
भारत में महानगरों के साथ छोटे शहरों और कस्बों तक इसका फैलाव बता रहा है कि समस्या केवल मौसम की नहीं है। अनियोजित शहरीकरण, जलभराव, कचरा प्रबंधन की कमजोरी, निर्माण स्थलों पर जमा पानी और घरेलू जल भंडारण भी मच्छरों को अनुकूल वातावरण देते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन और कमजोर नागरिक प्रबंधन मिलकर जोखिम को कई गुना बढ़ा सकते हैं। लेकिन अल नीनो की चेतावनी को केवल डेंगू तक सीमित कर देना उससे बड़े संकट को अनदेखा करना होगा।
अत्यधिक गर्मी अपने आप में बड़ी स्वास्थ्य आपदा बन रही है। लू और निर्जलीकरण के अतिरिक्त अधिक तापमान हृदय, श्वसन, गुर्दे और चयापचय संबंधी बीमारियों को गंभीर बना सकता है। गर्भवती महिलाएं, नवजात, बच्चे, बुजुर्ग, खुले में काम करने वाले श्रमिक और पहले से बीमार लोग अधिक संवेदनशील हैं।
डब्ल्यूएचओ ने अल नीनो से जुड़े प्रमुख स्वास्थ्य जोखिमों में अत्यधिक गर्मी, जलजनित और मच्छरजनित रोग, कुपोषण तथा आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान को भी शामिल किया है। भारत के सामने विडंबना यह है कि एक क्षेत्र में वर्षा की कमी तो दूसरे में अतिवृष्टि जनस्वास्थ्य के लिए संकट बन सकती है।
सूखा फसल और पेयजल उपलब्धता घटाकर खाद्य असुरक्षा तथा कुपोषण बढ़ा सकता है। दूसरी ओर बाढ़ पेयजल स्रोतों को दूषित करने, स्वच्छता व्यवस्था ध्वस्त करने और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच रोकने का कारण बन सकती है। इसीलिए अल नीनो का स्वास्थ्य प्रभाव अस्पताल की चारदीवारी से बहुत बाहर तक जाता है। हिमालयी भारत के लिए इसका एक और आयाम है।
यहां अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, सड़क अवरोध और बाढ़ किसी बीमारी से ज्यादा खतरनाक तब हो जाते हैं, जब अस्पताल तक पहुंच ही टूट जाए। तापमान में बदलाव मच्छरों के लिए पहले प्रतिकूल रहे ऊंचाई वाले क्षेत्रों की पारिस्थितिकी भी बदल सकता है। इसलिए दिल्ली, राजस्थान, बिहार, असम, केरल और उत्तराखंड के लिए एक जैसी स्वास्थ्य रणनीति कारगर नहीं हो सकती।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था मौसम की चेतावनी को स्वास्थ्य चेतावनी में बदलने के लिए तैयार है? भारत के पास मौसम पूर्वानुमान, उपग्रह, रोग निगरानी और विशाल स्वास्थ्य तंत्र है, लेकिन इन प्रणालियों के बीच वास्तविक समय का समन्वय निर्णायक होगा।
यदि किसी जिले में आने वाले सप्ताहों के तापमान, वर्षा और आर्द्रता से डेंगू का जोखिम बढ़ने का संकेत मिल रहा हो तो वहां जांच किट, अस्पताल के बिस्तर, रक्त और स्वास्थ्यकर्मियों की तैयारी बीमारी फैलने से पहले क्यों न हो? मौसम विभाग का पूर्वानुमान केवल छाता साथ रखने या किसान को वर्षा बताने की सूचना न रहकर स्वास्थ्य प्रशासन की कार्ययोजना का आधार बनना चाहिए। जिला स्तर पर मौसम, रोग और अस्पतालों के आंकड़ों को जोड़ने वाली पूर्व चेतावनी व्यवस्था विकसित करनी होगी।
चेतावनी को अवसर बनाना होगा
अल नीनो की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि अचानक आने वाले भूकंप के विपरीत इसका महीनों पहले अनुमान लगाया जा सकता है। यही उसकी चुनौती के भीतर छिपा अवसर भी है। डब्ल्यूएचओ भी पूर्व चेतावनी और अग्रिम कार्रवाई को नुकसान कम करने का प्रभावी साधन मानता है।
भारत को इसलिए अल नीनो से भयभीत होने के बजाय उससे मिलने वाली अग्रिम सूचना का लाभ उठाना चाहिए। नगर निकाय अभी से मच्छरों के प्रजनन स्थलों पर प्रहार करें, स्वास्थ्य विभाग रोग निगरानी बढ़ाए, अस्पताल संभावित दबाव का आकलन करें और कृषि तथा जल प्रबंधन तंत्र खाद्य एवं पेयजल जोखिमों की तैयारी करे।
असल चेतावनी यह है कि दूर समुद्र में होने वाला परिवर्तन अब हमारे खेत, रसोई, नल, शहर और अस्पताल तक पहुंच सकता है। इक्कीसवीं सदी में सक्षम स्वास्थ्य व्यवस्था वही होगी जो मरीज के अस्पताल पहुंचने के बाद ही नहीं, मौसम बदलने से पहले सक्रिय हो जाए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।