चारधाम यात्रा का सैलाब आखिर क्यों हो रहा है उत्तराखण्ड सरकार के बूते से बाहर?
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देेश के मैदानी इलाकों में पड़ रही भयंकर गर्मी से निजात पाने और इसी बहाने हिमालयी तीर्थों में पुण्य लाभ कमाने के लिए इस वर्ष उत्तराखण्ड के विख्यात चार धामों और पर्यटन स्थलों पर अत्यधिक भीड़ उमड़ रही है जिसे संभालना उत्तराखण्ड सरकार के बूते से बाहर हो गया है। आशा से अधिक जनसमुदाय के हिमालय पर उमड़ पड़ने के कारण चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से लेकर परिवहन, आवास एवं शौचालय की जैसी सुविधाएं नाकाफी हो गई हैं।
बद्नीनाथ और केदारनाथ में क्षमता से कहीं अधिक तीर्थ यात्रियों के पहुंचने से आवासीय व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। नैनीताल में तो हालत इतनी खराब है कि पर्यटकों के वाहनों को 10 किमी पीछे ही रोक दिया जा रहा है। चारों धामों में इस बार एक माह की अवधि में ही हृदय गति रुकने और ठण्ड आदि से मरने वाले की संख्या 41 तक पहुंच गई है। इन मौतों में सड़क दुघटनाओं में मरने वाले शामिल नहीं हैं। संवेदनशील हिमालय पर इतनी भीड़ ने पर्यावरण प्रेमियों की पेशानी पर भी बल डाल दिए हैं।
लू धकेल रही है लोगों को हिमालय पर
जून का महीना शुरू होना ही था कि उत्तराखण्ड में विश्व विख्यात हिमालयी तीर्थों के लिए तीर्थयात्रियों की बाढ़ सी आ गई है। मैदानी इलाकों में आसमान से आग बरसने के कारण भी लोग शीतलता और शांति की चाह लेकर मध्य हिमालय की ओर उमड़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 18 एवं 19 मई की बहुचर्चित बद्री-केदार यात्रा ने तो चारधाम यात्रा पर चार चांद लगा दिए। आम श्रद्धालुओं में यह संदेश गया कि जिस तरह बद्रीनाथ और केदारनाथ के दर्शन करने से प्रधानमंत्री मोदी की मनोकामना पूरी हुई उसी तरह उनकी मनोकामनाओं को पंख लग जाएंगे। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी बी.डी. सिंह के अनुसार 8 जून तक इन दोनों धामों में देश -विदेश के 9,64,809 तीर्थ यात्री दर्शन लाभ कर चुके थे।
क्यों बढ़ रही है पहाड़ों पर भीड़
रमजान का महीना निपटते ही रोजदार रहे साधन सम्पन्न लोग भी इन दिनों भारी संख्या में नैनीताल और मसूरी जैसे पर्यटन स्थलों की ओर रुख कर रहे हैं। यही नहीं जब पंजाब जैसे प्रदेशों में सूरज आग उगल रहा हो तो फिर हेमकुण्ड साहिब जैसा शांत और शीतल तीर्थ और कहां हो सकता हैं।
समुद्रतल से 4,633 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हेमकुण्ड साहिब विश्व का सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित गुरुद्वारा है जो कि हिमालय की स्थाई हिमरेखा की दहलीज पर है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इन दिनों लगभग 1350 किमी लंबे चार धाम यात्रा मार्ग एवं समुद्रतल से लगभग 2 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी पर्यटन नगरों में मानव बाढ़ जैसी आ गई है। चूंकि तीर्थाटन और पर्यटन राज्य की आर्थिकी के प्रमुख आधारों में से एक होने के कारण राज्य सरकार भी चाहती है कि यहां मानव सैलाब उमड़ता रहे मगर सरकार के पास वर्तमान मे इतनी भीड़ को संभालने की न तो क्षमता है और ना ही कोई विजन है।
ऋषिकेश में ही व्यवस्थाएं ध्वस्त
शासन प्रशासन द्वारा पर्यटन और तीर्थाटन के लिए की गई तमाम व्यवस्थाएं यात्रा मार्ग के आधार ऋषिकेश में ही जवाब दे गई हैं। केदार आपदा के दौरान यात्रियों का पूरा डेटा न होने के कारण मृतकों या लापता यात्रियों की सही संख्या का पता नहीं लग पाया था, इसलिए अब ऋषिकेश में राज्य सरकार द्वारा यात्रियों के लिए बायोमीट्रिक रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की गई है। इस रजिस्ट्रेशन केन्द्र से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक वहां पर 4,77,598 यात्रियों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है। इनमें सर्वाधिक 9 जून तक 3,60,669 रजिस्ट्रेशन केदारनाथ के लिए, 3,53,741 बदरीनाथ के लिए, 2,19,165 गंगोत्री और 2,11694 यमुनोत्री के लिए पंजीकृत हुए थे।
केदारनाथ आपदा के बाद यात्रियों के लिए बायोमीट्रिक पंजीकरण जरूरी है, मगर भारी भीड़ के कारण लोग लाइनों में खड़े होने के बजाय अपने निजी वाहनों से सीधे यात्रा पर निकल जाते हैं। ऋषिकेश के अलाया चारधाम यात्रा मार्ग पर 10 बायोमीट्रिक रजिस्ट्रेशन केन्द्र बनाए गए हैं। भारी भीड़ के कारण चारधाम यात्रा के आधार केन्द्र ऋषिकेश में यत्रियों को चारधाम ले जाने वाली बसों का भारी टोटा पड़ गया है। गढ़वाल की दो सबसे बड़ी परिवहन कंपनियों में से एक टीजीएमओ कम्पनी के अध्यक्ष प्रीतम सिंह नेगी के अनुसार कंपनी की कुल 600 बसों में से लगभग 300 बसें यात्रा में लगी हुई हैं। नेगी के अनुसार लोग अब प्रायः अपने निजी वाहनों से ही चारधाम यात्रा कर रहे हैं।
कितने काम के हैं सरकारी इंतजाम?
एक अनुमान के अनुसार वहां पर आजकल हर रोज यात्रियों को भेजने के लिए लगभग 200 बसों की जरूरत है, मगर इतनी बसों की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। कुमाऊं मण्डल से भी बसें मंगाने पर समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। मजबूरन यात्रियों को या तो होटल और धर्मशालाओं में बसें मिलने तक शरण लेनी पड़ रही है या फिर ऊंची दरों पर टैक्सियां और जीपें लेनीं पड़ रही हैं।
ऋषिकेश में सफाई व्यवस्था चरमरा रही है और स्वच्छ पेयजल के लिए आम यात्रियों को बोतलबंद पानी का सहारा लेना पड़ रहा है। इतनी भीड़ के लिए टीकाकरण की व्यवस्था भी नाममात्र की रह गई है। अधिकांश बसें तीर्थ यात्रियों को ढोने पर लगा दिए जाने से प्रदेश के स्थानीय यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
गुफा में मोदी की साधना ने किया आकर्षित
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 18 मई को केदारनाथ की गुफा में साधना और 19 मई को बद्रीनाथ में पूजा अर्चना करनी ही थी कि देशभर से तीर्थ यात्रियों का एक सैलाब सा इन हिमालयी तीर्थों की ओर उमड़ने लगा।
यात्रियों की अप्रत्याशित भीड़ को देखकर लगता है कि मोदी का केदारनाथ की गुफा में 15 घण्टों तक साधनालीन रहना देश-विदेश के सनातन धर्मावलम्बियों की केदारनाथ के प्रति आस्था को झकझोर गया। केदारनाथ आपदा से पहले और उसके बाद स्थिति सामान्य होने पर पूरे 6 माह के यात्रा सीजन में 6 लाख के आसपास यात्री केदारनाथ पहुंचते थे। लेकिन इस बार एक महीने में ही लगभग 16 किमी की पैदल यात्रा के बावजूद केदारनाथ पहुंचने वाले यात्रियों की संख्या 8 जून तक 4,58,637 तक पहुंच गई थी।
केदारनाथ के लिए ऋषिकेश में अब तक बद्रीनाथ की तुलना में अधिक रजिस्ट्रेशन हुए हैं। रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल के अनुसार 7 जून को एक दिन में 36,179 तथा 8 जून को 35,122 शिव भक्त केदारनाथ पहुंचे थे। केदारनाथ में लगभग 8 हजार लोगों के ठहरने की व्यवस्था है, लेकिन जब वहां चार गुना से अधिक तीर्थ यात्री पहुंचेंगे तो आवासीय संकट पैदा होना स्वाभाविक ही है।
केदारनाथ में सरकारी व्यवस्था ध्वस्त
केदारनाथ यात्रा तथा दर्शन व्यवस्था सुव्यवस्थित करने के लिए जिला प्रशासन ने इस बार टोकन की व्यवस्था शुरू की थी। लेकिन तीर्थयात्रियों का रेला इस तरह उमड़ पड़ा कि टोकन व्यवस्था भी ध्वस्त हो गई। इस अव्यवस्था के कारण प्रशासन की भरपूर कोशिशों के बावजूद यात्रियों को उपलब्ध कराई जाने वाली चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, परिवहन, पेयजल, खाद्य एवं आवास जैसी मूलभूत सुविधाएं ध्वस्त हो गई हैं।
स्थिति ये है कि केदारनाथ में दर्शन के लिए लंबी कतारें लगाने से पहले रास्ते में बनाए गए अस्थाई शौचालयों में महिला यात्रियों को लंबी लाइनें लगानी पड़ रही हैं। रामबाड़ा से लेकर केदारनाथ तक के 16 किमी के पैदल ट्रैक पर पेयजल और चिकित्सा की व्यवस्थाओं पर भारी दबाव के चलते वे नाकाफी हो रही हैं, जिस कारण कमजोर और उम्र दराज तीर्थयात्रियों की जान पर बन रही है।
इस साल एक महीने की तीर्थ यात्रा में हुई 41 मौतों में से 27 यात्रियों की मौत अकेले इसी पैदल मार्ग पर हुई हैं। पैदल यात्रा से बचने के लिए आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों के लिउ फाटा से हैली सेवाएं संचालित की जा रही हैं, मगर अत्यधिक भीड़ का लाभ उठाते हुए ब्लैकिये वहां भी मजबूर यात्रियों का शोषण करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
वैकुण्ठ धाम बद्रीनाथ में भी यात्रियों का सैलाब
19 मई को वाराणसी में मतदान के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केदारनाथ में साधना करने के बाद बद्रीनाथ पहुंचे थे। उनकी इस सफल यात्रा का असर केदारनाथ के साथ ही बद्रीनाथ यात्रा पर भी नजर आ रहा है। इस वर्ष बद्रीनाथ के कपाट 10 मई को खुले थे। इस एक माह से भी कम अवधि में 8 जून तक बद्रीनाथ पहुंचने वाली तीर्थ यात्रियों की संख्या 5,06,172 तक पहुंच गई थी।
मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी बी.डी. सिंह के अनुसार 8 जून को एक ही दिन में 20,121 तीर्थ यात्री बद्रीनाथ पहुंचे थे। बद्रीनाथ और केदारनाथ के तीर्थ यात्रियों के आगमन की तुलना करें तो केदारनाथ यात्रा पर मोदी की 15 घण्टों की साधना का चमत्कारिक असर नजर आता है। कुछ सालों पहले तक जोशीमठ से बद्रीनाथ जाने के लिए गेट व्यवस्था थी जिसमें निश्चित समय पर वाहनों को छोड़ा जाता था। लेकिन अब कभी भी यात्री अपने वाहनों या सार्वजनिक परिवहन से सीधे बद्रीनाथ जा रहे हैं। बद्रीनाथ में भी यात्रियों की अत्यधिक भीड़ का दबाव आवासीय तथा अन्य व्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। बद्रीनाथ मार्ग पर अभी से जाम की समस्या पैदा होने लगी है।
हर जगह ट्रैफिक जाम से हर कोई परेशान
यात्रियों और पर्यटकों की भारी भीड़ के कारण राज्यभर में ट्रैफिक की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। चारधाम यात्रा मार्ग तो आए दिन ट्रैफिक समस्या से जूझ ही रहे हैं, लेकिन टाउन प्लानिंग और बेहतर नागरिक सुविधाओं पर ध्यान न दिए जाने से देहरादून जैसे नगरों में भी आम आदमी का समय से अपने गंतव्य तक पहुंचना मुश्किल हो गया है।
यमुनोत्री से लेकर बद्रीनाथ तक का यातायात घोर अव्यवस्था का शिकार हो गया है। ऋषिकेश से लेकर चार धामों तक जाने वाले लगभग 1350 किमी लंबे मार्गों पर एक भी व्यवस्थित बस अड्डा न होने से यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
बस स्टेशनों पर स्थानाभाव के कारण वाहनों को प्रमुख नगरों में रुकने नहीं दिया जाता जिस कारण यात्री अपनी जरूरत की वस्तु तक नहीं खरीद पाते। राज्य गठन के 19 साल बाद भी राज्य सरकार ने एक भी बस अड्डा नहीं बनाया। यमुनोत्री के लिए जानकी चट्टी से पैदल मार्ग पर जहां तहां कीचड़ की शिकायत है। चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में केदारनाथ की ही तरह यमुनोत्री मार्ग भी यात्रियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
गत् 23 मई तक यमुनोत्री मार्ग पर 14 यात्रियों की मौत हो चुकी थी। गंगोत्री के यात्रियों को भी घण्टों तक ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में बद्रीनाथ मार्ग पर पेट्रोल न मिलने के कारण कई किमी तक वाहनों की कतार लगी रही। नैनीताल में पार्किंग सुविधा के अभाव में 10 किमी पीछे बल्दियाखान में पर्यटक वाहनों को रोका जा रहा है तथा वहां से पर्यटकों को सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के तहत जीप आदि से नैनीताल नगर तक छोड़ा जा रहा है।
इस तरह वहां रोके गए वाहनों की कई किमी लंबी कतार देखी जा सकती है। वहां होटलों की ऑनलाइन बुकिंग तो होती ही है, लेकिन अत्यधिक भीड़ के कारण रोपवे की सैर करने के लिए भी तीन दिन पहले बुकिंग करानी पड़ रही है। इस अव्यवस्था से नाराज होटल-रेस्तरां मालिकों ने विरोध स्वरूप एक रात्रि के लिए कुछ समय के लिये ब्लैक आउट भी किया था। इस अव्यवस्था के कारण नैनीताल के स्थानीय निवासी भी काफी परेशान हैं। उनका भी घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है।
यात्रा मार्ग पर पेट्रोल-डीजल की किल्लत
चारधाम मार्ग पर पेट्रोल की सामान्य उपलब्धता से कहीं अधिक खपत बढ़ जाने से भी अक्सर पेट्रोल और डीजल का संकट खड़ा हो रहा है। केदारनाथ मार्ग की जड़ पर तथा बदरीनाथ मार्ग के एक मुख्य नगर रुद्रप्रयाग में तथा उसके आसपास के 9 पेट्रोल पम्पों पर सामान्य दिनों में औसतन 10 हजार लीटर पेट्रोल और 30 हजार लीटर डीजल की खपत होती है, मगर इन दिनों वहां पेट्रोल की मांग 30 हजार और डीजल की मांग 80 हजार लीटर तक पहुंच गई है।
बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित 9 पेट्रोल पम्पों पर सामान्य दिनों औसतन 10 हजार लीटर पेट्रोल और 25 हजार लीटर डीजल की खपत होती है, मगर इन दिनों पेट्रोल की मांग सवा लाख लीटर और डीजल की मांग 45 हजार लीटर तक पहुंच गई है। मैदानी क्षेत्र से इतना तेल समय से इन पेट्रोल पम्पों पर नहीं पहुंच पाता है, जिस कारण पेट्रोल पम्पों से सीमित मात्रा में ही तेल दिया जा रहा है। इस किल्लत का लाभ भी ब्लैकिये उठा रहे हैं। पेट्रोल की किल्लत के कारण गत् दिनों जोशीमठ से नीचे कई वाहनों की किमी लंबी कतार लगने से यात्रा बाधित रही। ऑल वेदर रोड के निर्माण कार्य के कारण भी पेट्रोल आपूर्ति में विलम्ब हो रहा है। सड़क निर्माण के कारण भी रास्ते में कभी-कभी घण्टों तक जाम लग जाता है।
यात्रियों के मरने का रिकॉर्ड
इस साल मध्य हिमालय की चारधाम यात्रा के दौरान पहले एक महीने में कोई बड़ी सड़क दुर्घटना तो नहीं हुई मगर मगर हार्ट अटैक जैसी बीमारियों से यात्रियों के मरने की संख्या का रिकॉर्ड अवश्य ही टूट गया है। इस साल 8 जून तक चारों धामों के यात्रा मार्गों पर मरने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 41 तक पहुंच गई है जबकि गत् वर्ष 2018 की यात्रा में पहले एक महीने में 27 यात्रियों की जानें गईं थीं। इतने यात्रियों की मौतें तो इस बार अकेले केदारनाथ यात्रा के दौरानएक महीने में हो गईं हैं।
डॉक्टरों के अनुसार यात्रियों की ज्यादातर मौतें हाइपोक्सेमिया (रक्त में ऑक्सीजन का न्यूनतम स्तर) के कारण हार्ट अटैक होने से हुई हैं। पिछले साल 6 माह के पूरे यात्रा सीजन में 65 यात्रियों की मौतें हुईं थीं। स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार तीर्थ यात्री अपनी स्वास्थ्य सम्बन्धी शारारिक क्षमता की अनदेखी कर यात्रा कर रहे हैं जिस कारण उनकी लापरवाही जानलेवा साबित हो रही है। इस एक महीने के अन्दर सर्वाधिक 14 मौतें महाराष्ट्र के यात्रियों की हुईं। उसके बाद कर्नाटक के 10, मध्य प्रदेश के 9 और गुजरात के 6 यात्रियों की मौतें हुई हैं।
हिमालय के पारितंत्र पर भीड़ का धावा
इतनी विशाल अनियंत्रित भीड़ का हिमालय पर पहुंचना पारितंत्र के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है। पर्यावरणविदों के अनुसार हिमालय पर ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने की लालसा केदारनाथ जैसी एक और आपदा का निमंत्रण दे सकती है। गढ़वाल गजेटियर के अनुसार 20 वीं सदी के मध्य तक प्रति वर्ष लगभग 50 से लेकर 60 हजार तक तीर्थयात्री बद्रीनाथ आते थे। लेकिन आज लाखों की संख्या में यात्री अपने वाहनों समेत बदरीनाथ और गंगोत्री तक जा रहे हैं। तीर्थयात्रा के नाम पर इस तरह लाखों की संख्या में वाहनों के सीधे सतोपन्थ ग्लेशियर और गंगोत्री ग्लेशियर के एकदम निकट पहुंचने से उत्पन्न लोकल वार्मिंग से भी पारितंत्र प्रभावित हो रहा है।
वैज्ञानिकों का मत है कि ये वाहन मैदान की तुलना में पहाड़ पर चार गुना प्रदूषण करते हैं। मैदानों में प्रायः 60 किलोमीटर प्रति घण्टा चलने वाले वाहन पहाड़ों की चढ़ाइयों और तेज मोड़ों पर पहले और दूसरे गेयर में 20 किलोमीटर से भी कम गति से चल पाते हैं। जिससे उनका ईंधन दोगुना खर्च होता है। इस स्थिति में वाहन न केवल कई गुना अधिक काला दूषित धुआं छोड़ते हैं बल्कि इतना ही अधिक वातावरण को भी गर्म करते हैं। समुद्रतल से ऊंचाई के साथ ही पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी बढ़ती जाती है।
हिमालय पर ऊंचाई बढ़ने के साथ ही ऑक्सीजन और वर्षा कम होने लगती है। उत्तराखण्ड की चारधाम यात्रा ऋषिकेश से शुरू होती है, जो कि समुद्रतल से लगभग 300 मीटर की उंचाई पर स्थित है। वाहन यहां से शुरू होकर समुद्रतल से 3042 मीटर की उंचाई पर स्थित गंगोत्री और 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ पहुंचते हैं।
एक अनुमान के अनुसार एक यात्रा सीजन में लगभग 30 हजार वाहन सीधे गंगोत्री पहुचंते हैं। इतने वाहन अगर गोमुख के इतने करीब पहुंचेंगे तो वाहनों की आवाजाही का सीधा असर गंगोत्री ग्लेशियर पर पड़ना स्वाभाविक ही है। पिछले एक दशक से हजारों कांवड़िए जल भरने सीधे गोमुख जा रहे हैं। यही नहीं गंगोत्री और गोमुख के बीच कई जैनेरेटर भी लग गए हैं।
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