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क्या ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप से हो गई बड़ी कूटनीतिक भूल? भारत के लिए क्यों बढ़ रहा है सिरदर्द?

Wed, 08 Jan 2020 02:55 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Wed, 08 Jan 2020 02:55 PM IST
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Us iran tensions america India in trouble due to donald trump's mistake
कूटनीतिक गलियारों की चर्चाएं संकेत दे रही हैं कि ट्रंप ने यह क़दम अपनी दूसरी पारी के लिए चुनाव जीतने की खातिर उठाया है। - फोटो : अमर उजाला

बुरे फंसे डोनाल्ड ट्रंप। उनके करीबी राजनयिकों और सलाहकारों तक को यह गुमान नहीं था कि वे मूड में आकर यह फ़ैसला ले सकते हैं। व्हाइट हाउस की दीवारों की फुसफुसाहट भी यही कह रही है कि इस बार फिर गलती हो गई। ईरान के साथ परमाणु संधि से बाहर आकर उस पर प्रतिबंध लगाने के ट्रंप के निर्णय की आलोचना तो अमेरिका के मित्र देश पहले से ही कर रहे थे। ईरान के सेनाध्यक्ष क़ासिम सुलेमानी को मारने के बाद से तो कनाडा समेत यूरोप के अनेक मुल्क स्तब्ध हैं।

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दरअसल, कूटनीतिक गलियारों की चर्चाएं संकेत दे रही हैं कि ट्रंप ने यह क़दम अपनी दूसरी पारी के लिए चुनाव जीतने की खातिर उठाया है। वे क़ासिम सुलेमानी की तुलना ओसामा बिन लादेन से कर रहे हैं, जिसे मारकर उनके पूर्ववर्ती  बराक़ ओबामा भी देश के नायक बन गए थे। लेकिन ओसामा से सुलेमानी की कोई तुलना नहीं है।
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एक देश के सेनाध्यक्ष को मारना और बरसों तक पाकिस्तानी कंदराओं में छिपे रहे कुख्यात आतंकवादी को मारने के बीच अंतर तो करना ही होगा। सुलेमानी की अंत्येष्टि में दस लाख से अधिक लोग शामिल हुए। एक आतंकवादी के लिए इस तरह लोग नहीं रोते। ओसामा बिन लादेन को समंदर में फेंका गया तो उसका कुनबा भी नहीं रोया था।
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दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के सबसे अराजक नेताओं में अव्वल साबित हुए हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को यूटर्न राजनेता कहा जाता है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप उनसे भी बड़े यूटर्न राजनेता साबित हुए हैं।

उत्तर कोरिया,जापान,चीन,भारत,पाकिस्तान,अफगानिस्तान,तालिबान और अनेक अंतरराष्ट्रीय मामलों में बढ़े हुए क़दम खींचकर अपना रवैया अचानक बदलने का जो हुनर डोनाल्ड ट्रंप ने दिखाया है, उससे उनकी कई बार किरकिरी हो चुकी है।
 

Us iran tensions america India in trouble due to donald trump's mistake
ट्रंप के इस कदम की अमेरिका में आलोचना भी हो रही है। - फोटो : फाइल फोटो

ट्रंप की अमेरिकी मीडिया में उनकी आलोचना होती रही है। इस बार अमेरिकी नागरिकों की मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काकर वे राष्ट्रपति पद का दूसरा कार्यकाल पाना चाहते हैं, लेकिन ईरान के साथ जंग में उलझकर उनकी मंशा शायद ही पूरी हो। वे पहले ही अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज को वापस बुलाने के दबाव का सामना कर रहे हैं।

अमेरिकी नागरिक अपने फौजियों के अन्य देशों में बेवजह मारे जाने से खफा हैं। वे कहते हैं- उनके बेटे अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं हैं न ही देश बचाने के लिए उनकी इस तरह क़ुर्बानियों की जरूरत है। इसका अर्थ यह है कि ट्रंप अब अपने जाल में ही उलझ कर रह गए हैं। उन्होंने ईरान को इराक़ और अफगानिस्तान समझने की भूल की है। भले ही ईरान इस जंग में न जीते मगर अमेरिका के लिए यह हमेशा के लिए एक सबक हो सकता है। ट्रंप ख़ुद को उस स्थान पर ले गए हैं ,जहां से उनकी वापसी कठिन है।

सवाल यह है कि भारत इस जंग में कहां है ? उसके अपने हित और नीति क्या चाहते हैं। भारत के प्रधानमंत्री डोनाल्ड ट्रंप के साथ खड़े होने की बात तो करते हैं पर देश के हित फ़िलहाल इसकी इजाज़त नहीं देते। हिंदुस्तान और ईरान के संबंध दशकों से अत्यंत भरोसे भरे रहे हैं। किसी भी दल की सरकार रही हो, इन रिश्तों पर असर नहीं पड़ा। अमेरिकी दबाव में हमने इन संबंधों की डोर चटका दी है। उसके इशारों पर नाचने के बावजूद हम अमेरिका को पाकिस्तान से अलग नहीं कर पाए हैं।

इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने हिंदुस्तान के लिए केवल गाल बजाए हैं। उसका ताज़ा फ़ैसला पाकिस्तानी सेना को प्रशिक्षण देना है। इसके बाद क्या छिपा हुआ है? कारोबारी झटका वह पहले ही दे चुका है। भारतीय कंपनियों ने ईरान में एक लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। यह निवेश डूबता सा लग रहा है।

चाबहार बंदरगाह का रणनीतिक और कारोबारी इस्तेमाल फ़िलहाल नहीं कर पाएंगे। तेल आयात में झंझटें बढ़ जाएंगी। ईरान से तेल आयात बन्द करने के बाद हम अमेरिकी तेल पर निर्भर हो गए थे। अब ट्रंप ने अपने देश को युद्ध की आग में झोंक दिया तो वह हमें तेल देने की चिंता में क्योंकर दुबला होगा?  हम और क्या खोकर अमेरिका को प्रसन्न करना चाहते हैं? और क्यों? 

लब्बो लुआब यह कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की चुप्पी भी इस मामले में ठीक नहीं है। कनाडा,चीन,रूस  जैसे देश दम साधे वैश्विक मंच पर  सजते युद्ध के मैदान को देख रहे हैं। मामला अपनी सीमा पार करे, इससे पहले ही कोई रास्ता निकालना होगा। अन्यथा ईरान तो बारूद के ढेर पर बैठा ही है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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