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जिजीविषा: विचारों का प्रवाह और आत्मा की गति है मारुत तत्व

Tue, 01 Apr 2025 12:56 PM IST
Ananya Mishra अनन्या मिश्रा
Updated Tue, 01 Apr 2025 12:56 PM IST
सार

मारुत तत्व केवल वायु नहीं है। यह हमारे विचारों की गति है, हमारी ऊर्जा का प्रवाह है। इसे समझना और नियंत्रित करना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। जब हम अपने मन को केंद्रित करते हैं, जब हम अपनी आंतरिक वायु को सही दिशा में प्रवाहित करते हैं, तब जीवन में स्थिरता और शांति आती है।

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Survival: IIM Indore Dr. Ananya Mishra Blog flow of thoughts Maruta tattva
योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का नियंत्रण। - फोटो : freepik

विस्तार

क्या आपने कभी तेज हवाओं को महसूस किया है- वो जो कभी हल्की फुहारों की तरह मन को सुकून देती हैं, तो कभी आंधी बनकर सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देती हैं? क्या आपको भी लगता है कि हमारी सोच, हमारी भावनाएं भी इसी तरह होती हैं? कभी शांत, कभी उत्तेजित, कभी नियंत्रित, तो कभी अनियंत्रित? हमारे भीतर का मन भी 'मारुत तत्व' की तरह है। यह निरंतर गतिशील है, परिवर्तनशील है और कई बार नियंत्रण से बाहर भी हो जाता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मारुत केवल वायु नहीं है, बल्कि एक गूढ़ तत्व है जो जीवन की गति और विचारों के प्रवाह से गहरा संबंध रखता है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में 'मारुत' देवताओं का उल्लेख है, जो ऊर्जा, गति, और परिवर्तन के प्रतीक हैं। यह तत्व केवल बाहरी वातावरण में ही नहीं, बल्कि हमारी चेतना के स्तर पर भी प्रभाव डालता है।
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"वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।" (इशोपनिषद)

वायु केवल बाह्य संसार में प्रवाहित होने वाली शक्ति नहीं, बल्कि हमारे भीतर की चेतना को भी गतिशील बनाए रखती है। जब यह नियंत्रित होती है, तो जीवन में संतुलन बना रहता है। जब यह अनियंत्रित होती है, तो मानसिक अशांति उत्पन्न होती है। आधुनिक मनोविज्ञान भी इस विचार से सहमत है। साइकोलॉजिकल फ्लो (Psychological Flow) नामक अवधारणा बताती है कि जब मन एक केंद्रित अवस्था में होता है, जब विचारों की धारा नियंत्रित होती है, तब व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है। लेकिन, जब यह धारा बाधित होती है तो तनाव, बेचैनी और अस्थिरता बढ़ जाती है। 
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डॉ. मिहाय चिकसेंटमिहाय ने इस विषय पर गहराई से अध्ययन किया और बताया कि जब हमारा मन पूर्ण समर्पण के साथ किसी कार्य में लीन होता है, तो हम एक विशेष मनोवैज्ञानिक अवस्था में पहुंचते हैं, जिसे 'फ्लो स्टेट' कहते हैं। यह वही स्थिति है जब एक कलाकार अपने चित्र में डूब जाता है, एक संगीतकार सुरों में लयबद्ध हो जाता है, या एक साधक ध्यान में विलीन हो जाता है। यह अवस्था हमारी आंतरिक 'वायु' को संतुलित करती है। लेकिन, क्या हो जब यही वायु असंतुलित हो जाए?
हम सभी ने ऐसे क्षण महसूस किए हैं जब मन अशांत हो जाता है। जब विचारों की गति बेकाबू हो जाती है, जब भावनाएं आंधी बनकर हमें विचलित कर देती हैं। इसे ही मनोराज्य विक्षेप (Cognitive Disarray) कहा जाता है। योग और ध्यान में इसे 'चित्तवृत्ति' कहा गया है, जो तब उत्पन्न होती है जब विचार अस्थिर हो जाते हैं और मन भटकने लगता है। पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है: "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।" अर्थात, योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का नियंत्रण। जब विचारों की गति को सही दिशा में प्रवाहित किया जाता है, तो मन शांत और संतुलित रहता है। 

वेदों में कहा गया है कि वायु जीवनदायिनी है। यह प्राणशक्ति है, जो हमें ऊर्जा प्रदान करती है। लेकिन, यह केवल शरीर तक सीमित नहीं है। मारुत तत्व आत्मबल से जुड़ा हुआ है। जब मन शांत और संतुलित होता है, तब आत्मबल भी प्रबल होता है। यही कारण है कि साधना, ध्यान और प्राणायाम को इतना महत्व दिया गया है। 

उपनिषदों में, तत्वों और परम वास्तविकता के परस्पर संबंध को गहराई से खोजा गया है, विशेष रूप से वायु, प्राण (जीवन शक्ति), आत्मा (व्यक्तिगत आत्मा) और ब्रह्म (परम चेतना) की अवधारणाओं के माध्यम से। वायु, या हवा, केवल एक भौतिक तत्व नहीं है, बल्कि इसे जीवन की सांस के रूप में देखा जाता है, जो पूरे अस्तित्व में व्याप्त है। छांदोग्य उपनिषद (3.14.1) में, इसका उल्लेख है, "आकाशात् वायु, वायुः अग्निः, अग्निं प्राणः" ("अंतरिक्ष (आकाश) से, वायु उत्पन्न होती है; वायु से, अग्नि; अग्नि से, श्वास (प्राण)")। यहां, वायु को महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में समझा जाता है जो सभी जीवित प्राणियों को बनाए रखती है, एक ऐसी शक्ति जो प्राण, जीवन की सांस के साथ विलीन हो जाती है।

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जब हम सांस लेते हैं, तो प्राण हमारे माध्यम से बहता है, जिससे हम ब्रह्मांड से जुड़े रहते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद आत्मा, अंतरतम स्व की अवधारणा को प्राण से खूबसूरती से जोड़ता है, यह सुझाव देते हुए कि आत्मा जीवन की शक्तियों से अलग नहीं है, बल्कि उनके साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है: "तस्मिन्नेवे कर्मणि तिष्ठति यथा प्राणाः..." अर्थात, उस (आत्मा) में, सभी क्रियाएं होती हैं, जैसे शरीर में प्राण होते हैं। परम वास्तविकता, ब्रह्म, वायु और प्राण सहित सभी प्रकार के अस्तित्व के मूल तत्व के रूप में प्रकट होती है। तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है, "ॐ सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म"अर्थात, ओम, सत्य, ज्ञान और अनंत ब्रह्म है - यह दर्शाता है कि सभी तत्व, जिसमें हम जिस हवा में सांस लेते हैं, वह ब्रह्म की विशाल और अनंत चेतना का हिस्सा है। इस प्रकार, वायु, प्राण, आत्मा और ब्रह्म अलग-अलग अवधारणाएं नहीं हैं, बल्कि सभी आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं, प्रत्येक एक ही सार्वभौमिक सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

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वायु ही प्राण है, जो चेतना को प्रकाशमान करता है। यह सत्य की ओर ले जाने वाला तत्व है। क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है जब आपको कोई विचार लंबे समय तक परेशान करता रहा हो? या जब किसी अनिश्चितता की स्थिति में मन स्थिर न रह सका हो? यह मारुत तत्व का असंतुलन है।

अब एक साधारण उदाहरण लीजिए। मान लीजिए, आपको एक कठिन निर्णय लेना है- करियर से जुड़ा कोई बड़ा फैसला, या जीवन के किसी महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा होना। अगर, मन अशांत होगा तो यह निर्णय और कठिन हो जाएगा। लेकिन, अगर आप ध्यान और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से अपने भीतर के विचारों को स्थिर करते हैं, तो समाधान स्पष्ट होने लगेगा। यही है मारुत तत्व को साधने की शक्ति।

मारुत तत्व को संतुलित करने के उपाय क्या हो सकते हैं? 
  • प्राणायाम और श्वास नियंत्रण: श्वास पर नियंत्रण से विचारों की गति को स्थिर किया जा सकता है। धीमी और गहरी सांसें मारुत तत्व को संतुलित करती हैं।
  • ध्यान और आत्मनिरीक्षण: जब मन में विचारों की आंधी चल रही हो, तो कुछ क्षण रुककर आत्मनिरीक्षण करें।
  • संगीत और लय: प्राचीन भारतीय संगीत में 'लय' (Rhythm) पर अत्यधिक जोर दिया गया है, जो मानसिक और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक है। 

मारुत तत्व केवल वायु नहीं है। यह हमारे विचारों की गति है, हमारी ऊर्जा का प्रवाह है। इसे समझना और नियंत्रित करना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। जब हम अपने मन को केंद्रित करते हैं, जब हम अपनी आंतरिक वायु को सही दिशा में प्रवाहित करते हैं, तब जीवन में स्थिरता और शांति आती है। जैसे एक कुशल नाविक समुद्र की लहरों को दिशा देता है, वैसे ही हमें अपने विचारों की आंधी को साधना होगा। क्योंकि, जब मारुत संतुलित होता है, तब ही आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखिका के निजी विचार हैं। वे आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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