कोरोना काल में चुनाव: एक ओर सामाजिक दूरी दूसरी ओर चुनावी सभाएं? आखिर क्यों जनता की जिंदगी को खतरे में डाला जा रहा है?
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भारत की जनता ने मार्च से जुलाई तक जो संयम, सावधानी बरती, काम-धंधों को तिलांजलि दी, नौकरियां गंवाईं, रोजमर्रा की चीजों की मोहताजी झेली, शासन-प्रशासन की नसीहतों का पालन किया, दुनिया के हालात से खौफ खाकर घरबंदी मंजूर की, वे सारे लोग अब दूसरों के किए गुनाह की सजा पाने को सज-धजकर तैयार हैं। कभी कलश यात्रा में, कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा नेताओं की सभा की भीड़ बनकर बलि के बकरे की तरह हार-फुल गले में डाले मुस्तैद हैं।
मध्य प्रदेश में उप चुनाव की आहट के बीच, जिस तरह की राजनीतिक गतिविधियां प्रारंभ हुई हैं, वे भले ही आप-हमारी जान सांसत में डाल रही हो, नेता-नगरी तो कसाई की तरह फरसे लिए घूम रही हैं। इन्हें रोकने के दो ही रास्ते बचे हैं। एक, चुनाव आयोग चुनाव टाल दे। दूसरा, न्याय पालिका स्वयं इन पर रोक लगा दे।
पहली संभावना तो तभी खत्म हो गई थी, जब 24 सितंबर को चुनाव आयोग ने बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा की। वहां ये चुनाव अक्टूबर-नवंबर में होने हैं। कमोबेश मप्र में भी 28 विधानसभा सीटों के लिए उप चुनाव तभी संभावित है।
किसी भी समय कार्यक्रम घोषित किया जा सकता है। न्याय पालिका हमेशा उम्मीद जगाती और बनाए रखती रही है, तो देखें कोई पहल हो जाए। तब तक हमें दहशत में रहना होगा।
मुख्य सवाल यह है कि क्या इस वर्ष ये उप चुनाव बेहद अनिवार्य हैं? क्या इन्हें नहीं कराने पर लोकतंत्र की आत्मा आहत हो जाएगी? क्या संविधान का ऐसा उल्लंघन हो जाएगा, जिससे कानून के राज पर अंगुली उठने लगेगी?
इन विधानसभाओं में विकास कार्य नहीं किए जाएंगे? क्या इनके मतदाता या निवासी धरने-प्रदर्शन कर सरकार और चुनाव आयोग को विवश कर रहे हैं कि वे अनचाही मौतों की कीमत पर भी चुनाव जरूर कराएं? क्या छह माह बाद चुनाव कराए गए तो जनता विद्रोह कर देगी?
सारे सवालों के आसान से जवाब हैं, लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि वे अपनी सरकार को पसंद आते हैं या नहीं? किसी को भी इन चुनावों से कतई परेशानी नहीं होती यदि हालात सामान्य होते। तब संविधान के तकाजे, नीति-नियम सबका पालन लाजिमी था।
इस समय जब पूरी दुनिया सारे नियम-कायदे तोड़कर संचालित हो रही है तब केवल चुनाव को अपरिहार्य मान लेना बेहद नादानीपूर्ण, स्वार्थीपन और जनता की जान की कीमत दो कौड़ी आंकना ही माना जाएगा।
कुछ बातें तो नेत्रहीन भी देख पा रहा और बधिर भी सुन पा रहा है कि कोरोना महामारी को नियंत्रित करना है, तो एक-दूसरे से दूर रहो, ना भीड़ जुटाओ, ना उसका हिस्सा बनो, कारोबार संयमित तरीके से करो, स्कूल-कॉलेज, टॉकीज, कोचिंग क्लासेस, मॉल्स बंद रखो, यात्री परिवहन, विमान-रेल सेवा न्यूनतम रखो तब मध्य प्रदेश या बिहार में ऐसी कौन-सी आफत आने वाली है कि चुनाव नहीं होंगे तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी, संविधान की आत्मा कचोटेगी, मतदान के मौलिक नागरिक अधिकार का हनन हो जाएगा, मानवाधिकार पर चोट हो जाएगी?
एक तरफ भीड़ भरे बाजार माने जाने वाले स्थानों पर नगर निगम की पीली गैंग रात-दिन मास्क नहीं लगाने वाले, 5-7 लोगों की भीड़ का चालान बना रही है। प्रशासन व्यापारियों को बुलाकर समझाइश भरी चेतावनी दे रहा है कि वे रविवार को तो कारोबार बंद रखे ही, संभव हो तो शनिवार को भी संस्थान न खोलें।
दूसरी तरफ सांवेर, बदनावर सहित प्रदेश में जहां उप चुनाव होने हैं, वहां कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा की सभा में हजारों लोगों की भीड़ जुटाने में बसों की व्यवस्था प्रशासन करता है, करने देता है, क्योंकि आड़ सरकारी कार्यक्रम की है। कैसा दोहरा और आंख से काजल चुराने जैसा कृत्य है यह?
हमने देख लिया कि कारोबार में ही अतिरिक्त छूट देने भर से कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है। हालांकि, यह संतोष की बात है कि मौतों की दर कम है, लेकिन केवल इस एक तथ्य की वजह से लापरवाह हो जाने की तुक तो नहीं है। अभी-भी रह-रहकर बात उठती है कि कोरोना की श्रृंखला तोड़ने के लिए जरूरी हो तो कुछ दिन के लिए तालाबंदी फिर से लागू कर दी जाए।
अभी भी अनेक कारोबारी दम साधे अपने संस्थान पूरी क्षमता से चलाने की राह देख रहे हैं। कारखाने कम क्षमता से चलाए जा रहे हैं। यात्री बसों के पहिए तकरीबन थमे हुए ही हैं। रेलगाडिय़ां पूरी क्षमता से प्रत्येक लाइन पर नहीं चलाई जा रही। विमान सेवा नाममात्र को ही चल रही है। तब ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि मप्र, बिहार या कहीं पर भी होने वाले चुनाव नहीं टाले जा रहे?
क्या हो यदि ये अगले साल मार्च के आसपास हो। जब साल-छह महीने राष्ट्रपति शासन चल सकता है, तो चुनाव टालने में हर्ज ही क्या है? जिन चौदह मंत्रियों का पद सलामत रखने के लिए चुनाव का मैदान सजाया जा रहा है, उन्हें तो वैसे भी एक दिन के अंतर से ही दोबारा मंत्री बनाया जा सकता है, तब उन लोगों को बलि के लिए कसाईखाने की ओर क्यों धकेला जा रहा है, जिन्हें इन चुनावों के नहीं होने से कुछ फर्क नहीं पडऩे वाला? लोकतंत्र में चुनाव यदि एक जरूरी प्रक्रिया है, तो कोरोना काल में जन की जान की हिफाजत भी तो जरूरी है।
अभी तो आप सभाएं ही कर रहे हैं, जब चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाएगा तब तो घर-घर जनसंपर्क, रैलियां, नुक्कड़ सभाएं और स्टार प्रचारकों की विशाल सभाएं भी होंगी, जहां हजारों लोगों को बस, ट्रक, ट्रैक्टरों में जानवरों की तरह भरकर लाया जाएगा, उनसे फैलने वाले संक्रमण का दोषी किसे माना जाएगा? उस गुनाह के लिए सजा भुगतने का साहस किसी राजनीतिक दल के नेता में यदि नहीं है, तो उसे यह हक किसने दिया कि वे अपनी महत्वाकांक्षा व सत्ता प्राप्ति के लिए सामूहिक नरबलि का जलसा करें?
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