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इमरान को नजर आने लगे दिन में तारे 

Thu, 18 Oct 2018 03:04 PM IST
Updated Thu, 18 Oct 2018 03:04 PM IST
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pakistan prime minister Imran khan Discouraged after bypoll election defeat
इमरान खान - फोटो : pti

पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान खान से अवाम का मोहभंग होने लगा है। हाल ही में हुए उपचुनावों के नतीजे तो कम से कम यही कहते हैं। नेशनल असेंबली के ग्यारह और प्रांतीय विधानसभाओं के 24 स्थानों पर चुनाव परिणामों में इमरान की पाकिस्तान तहरीक़े इंसाफ़ पार्टी को झटका लगा है। यहां तक कि दो सीटें वे भी इस पार्टी के हाथ से निकल गईं ,जिन पर ख़ुद इमरान खान जीते थे।

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आपको याद होगा कि इमरान कुल पांच सीटों से चुनाव मैदान में उतरे थे और सभी पर जीते थे। उनकी पार्टी नवाज़ शरीफ़ की पी एम एल - एन के सामने दमदार प्रदर्शन नहीं कर पाई। नवाज़ की पार्टी ग्यारह में से चार सीटें जीतकर इमरान की पार्टी के बराबर खड़ी है। तीन सीटें अन्य दलों ने जीत लीं।
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इस तरह नेशनल असेंबली में प्रतिपक्ष की ताक़त में पांच सीटों का इज़ाफ़ा हुआ है। इन नतीज़ों का तनिक बारीक़ विश्लेषण करें तो कुछ और खुलासे होते हैं। मसलन नवाज़ को अपने गढ़ पंजाब में एक बार फिर अपनी ज़मीन मज़बूत करने का मौक़ा मिला है। चौबीस में से विपक्ष के खाते में 13 और इमरान की पार्टी को 11 सीटों से संतोष करना पड़ा है। इनमें नवाज़ की पार्टी ने छह सीटें पंजाब से और एक ख़ैबर पख्तूख्वा से जीती।
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यह इमरान ख़ान के दल का मज़बूत क़िला माना जाता है।ख़ास बात यह है कि सारे मुक़ाबलों में नवाज़ के उम्मीदवारों ने इमरान के प्रत्याशियों को धूल चटाई है। इन परिणामों से ख़ुद इमरान सकते में हैं।अवाम खुलकर कहने लगी है कि जो प्रधानमंत्री दो महीने में ही अपनी सीटों से हार जाए,तो साफ़ है कि मुल्क़ की मुश्किलों का इलाज़ उसके पास नहीं है।

सवाल यह है कि इमरान ने इन दो महीनों में क्या किया है ? अपने प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने दिवालिएपन की क़गार पर खड़े पाकिस्तान की हालत सुधारने का जो सब्ज़बाग़ दिखाया वो जीतने के बाद सूख गया। प्रधानमंत्री बनने से पहले वे आर्थिक मदद के लिए किसी दूसरे देश के सामने हाथ फैलाने में अपनी तौहीन समझते थे। पद पर बैठते ही झोली फैलाए सऊदी अरब चले गए। वहाँ से कुछ नहीं मिला। अब ले देकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का आसरा है।

मुद्रा कोष में अमेरिका की वोट हिस्सेदारी सबसे अधिक है और पाकिस्तान के वित्त मंत्री असद उमर ने अपनी अकड़ में ऐलान कर दिया कि अमेरिका की शर्त नहीं मानी जाएगी ,जो पाकिस्तान के हितों के ख़िलाफ़ होगी।अमेरिका ने पाकिस्तान को चीन से मिले सारे क़र्ज़ की जानकारी मांगी है। पाकिस्तान इसे देने से कतरा रहा है। अगर उसने ऐसा किया तो चीन खफा हो जाएगा। कुल मिलाकर इमरान की स्थिति सांप - छछूंदर जैसी हो गई है। पहली बार पाकिस्तान इतने बुरे वक़्त में है। उसके पास बमुश्किल महीने भर के आयात का विदेशी मुद्रा भण्डार बचा है। उसे तत्काल बारह अरब डॉलर की सहायता चाहिए।

यह न मिली तो पाकिस्तान इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकट का सामना करेगा। सात नवंबर को मुद्रा कोष का दल पाकिस्तान का दौरा करेगा। इमरान को उम्मीद है कि इसके बाद कभी मुद्रा कोष का दरवाज़ा नहीं खटखटाना पड़ेगा। पाकिस्तान इससे अगर उबर सका तो यह एक चमत्कार से कम नहीं होगा। 

इससे पहले पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव के आगे अड़ियल रवैय्या अख़्तियार किया था। उससे कहा गया था कि चीन से मिले अब तक के सारे ऋण -अनुबंधों को मुद्रा कोष के सामने पेश करे। चीन ने अपनी आर्थिक गलियारा योजना में जिन देशों को शामिल किया है ,उनको दिए गए क़र्ज़ की शर्तें बेहद गोपनीय रखी गईं हैं। अब पाकिस्तान इन शर्तों को साझा करने पर सहमत हो गया है।

इससे चीन के कूटनीतिक हलकों में नाराज़गी है। माना जाता है कि चीन ने  ऋण देने में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य सिद्धांतों का पालन नहीं किया है। इसलिए अगर पाकिस्तान ने क़र्ज़ की शर्तें उजागर कर दीं तो चीन मुश्किल में पड़ जाएगा। चीन भी अब  पाकिस्तान को लगातार सहायता देने की स्थिति में नहीं है। इसी कारण बीते दिनों जब इमरान ख़ान ने कहा कि पाकिस्तान चीन की आर्थिक गलियारा परियोजना की आर्थिक समीक्षा करेगा तो चीन की भृकुटि तन गई थी।    

पाकिस्तान के आर्थिक विशेषज्ञ अब इमरान ख़ान को प्रधानमंत्री के तौर पर अपने देश का ग़लत फ़ैसला मानने लगे हैं। मीडिया में  धारणा बनती जा रही है कि इमरान खान के पास वास्तव में देश को आगे ले जाने वाला कोई सोच था ही नहीं।अब जब मुल्क़ बदहाली के कगार पर है तो इमरान खान चुप्पी साधे  बैठे हैं।अपने आवास से भैंसों और कारों की नीलामी करके भी वो कुछ बचा नहीं पा रहे हैं।

वित्तीय जानकार कहते है कि इससे बेहतर नवाज़ शरीफ का कार्यकाल था ,जब मुल्क़ की आर्थिक रफ़्तार पिछले तरह साल में सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ रही थी और पूंजी निवेश भी हो रहा था। चुनाव के बाद न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक अस्थिरता का अंदेशा भी होने लगा है।भारत के एक रूपए के बदले पाकिस्तान में  दो रूपए मिलते हैं। पहले यह क़ीमत डेढ़ रूपए थी।


विशेषज्ञों की चेतावनी यह है कि अगले वित्तीय वर्ष में मंहगाई की दर चौदह फीसदी बढ़ सकती है। कुल मिलाकर इमरान के लिए अब बुरा दौर शुरू होने वाला है। लोक लुभावन चुनावी वादे गले की फांस बन गए हैं। इमरान की बंधी मुठ्ठी  खुलती देख फौज भी भौचक्का है। उसे अंदाज़ नहीं था कि पोल इतनी जल्द खुलने लगेगी। अब फौज भी कोई विकल्प की तलाश करने लग जाए तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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