नॉर्थ ईस्ट डायरी: मणिपुर में राष्ट्रपति शासन से बदलेगी तस्वीर?
अब राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने तमाम लोगों से सात दिनो के भीतर ऐसे हथियार जमा करने का निर्देश दिया है। उसके बाद राज्य में और बड़े पैमाने पर उग्रवाद-विरोधी अभियान चलाया जा सकता है।
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बीते करीब 21 महीनों से जातीय हिंसा की आग में जलने वाले पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की तस्वीर क्या बदलेगी क्या इस हिंसा के बाद राज्य के दोनों प्रमुख समुदाय-मैतेई और कुकी के बीच लगातार चौड़ी होती खाई को पाटना संभव होगा। राज्य में भाजपा के विधायकों के बढ़ते दबाव और बगावत के बाद आखिर मुख्यमंत्री एन। बीरेन सिंह ने हाल में इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उनकी जगह किसी नाम पर सहमति नहीं होने की वजह से सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। उसके बाद राज्य की जमीनी स्थिति में थोड़ा ही सही, लेकिन बदलाव नजर आ रहा है। अब यह कहना मुश्किल है कि यह बदलाव कितना स्थायी और प्रभावी होगा।
राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद उग्रवादियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर शुरू हुए अभियान का ही नतीजा है कि अब तक करीब सौ लोगों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से भारी मात्रा में उन हथियारों को बरामद किया गया है जो सरकारी शस्त्रागार से लूटे गए थे।
अब राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने तमाम लोगों से सात दिनो के भीतर ऐसे हथियार जमा करने का निर्देश दिया है। उसके बाद राज्य में और बड़े पैमाने पर उग्रवाद-विरोधी अभियान चलाया जा सकता है। राज्यपाल ने कहा है कि तय समय के भीतर ऐसे हथियार लौटाने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। लेकिन उसके बाद उनको गंभीर नतीजे भुगतने होंगे।
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि तीन मई, 2023 को हिंसा की शुरुआत के बाद राज्य के विभिन्न इलाकों में थानों और दूसरी जगहों से बड़ी मात्रा में सरकारी हथियार लूट लिए गए थे। शुरुआती दौर के बाद इस हिंसा की कमान मैतेई और कुकी उग्रवादी संगठनों ने थाम ली थी।
लंबे अरसे तक उग्रवाद की चपेट में रहने वाले इस राज्य में बीते कुछ वर्षों से धीरे-धीरे शांति लौट रही थी। लेकिन मई, 2023 की हिंसा ने यहां रहने वाले मैतेई और कुकी समुदाय के बीच की दरार को अचानक और चौड़ा कर दिया है। इस हिंसा की आड़ में कम से कम दो दर्जन कुकी उग्रवादी संगठन राज्य में सक्रिय हो गए। दूसरी ओर, पड़ोसी म्यांमार में ठिकाना बनाने वाले कई मैतेई संगठन भी हिंसा की इस आग में कूद पड़े।
केंद्र और राज्य सरकार की चुप्पी ने परिस्थिति और बिगाड़ दी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस हिंसा में अब तक ढाई सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 50 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित होकर राहत शिविरों में दिन काट रहे हैं। राज्य में 60 हजार से ज्यादा सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद अक्सर हिंसा भड़क उठती थी। लेकिन उग्रवादी संगठनों के खिलाफ कभी किसी बड़े अभियान की जरूरत तक नहीं समझी गई। अब राष्ट्रपति शासन के बाद शुरू हुए अभियान के बाद सवाल उठने लगा है कि आखिर पहले ऐसा क्यों नही किया गया और मुख्यमंत्री के इस्तीफे के साथ राष्ट्रपति शासन का फैसला क्यों किया गया?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा विधायकों की बगावत ही इसकी सबसे बड़ी वजह है। विपक्ष ने बजट अधिवेशन के दौरान बीरेन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का फैसला किया था। करीब डेढ़ दर्जन भाजपा विधायक भी इसका समर्थन करने का मन बना चुके थे। यानी शक्ति परीक्षण की स्थिति में सरकार का गिरना तय था।
पहले तो बागी विधायकों को मनाने का भरसक प्रयास किया गया। लेकिन जब बात नहीं बनी तो बीरेन सिंह को इस्तीफा देने के लिए कहा गया। विश्लेषकों की राय में अगर पार्टी में बीरेन सिंह के खिलाफ बगावत नहीं होती तो अब भी उनका इस्तीफा नहीं मांगा जाता। सदन में बहुमत पाने में बीरेन सिंह सरकार के नाकाम रहने की स्थिति में केंद्र और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की भद पिटती और दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत का उल्लास फीका पड़ जाता। तमाम पहलुओं पर विचार करने के बाद ही मुख्यमंत्री से इस्तीफा देने को कहा गया था।
मुख्यमंत्री ने नौ फरवरी को इस्तीफा दिया था, लेकिन अगले चार दिनों तक जब उनके उत्तराधिकारी पर फैसला नहीं हो सका तो छह महीने के भीतर सदन की बैठक बुलाने की सवैंधानिक मजबूरी के कारण ही 13 फरवरी की शाम को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अगले कुछ दिनों या महीनों में राज्य में नया मुख्यमंत्री चुना जाएगा या फिर विधानसभा भंग कर नए सिरे से चुनाव कराए जाएंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विधानसभा भंग करने की संभावना बेहद क्षीण है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल अगले मुख्यमंत्री के लिए किसी नाम पर आम राय बनाने का प्रयास कर रहा है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री की कुर्सी के संभावित दावेदारों में से एक मंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने पार्टी के तमाम विधायकों के साथ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ए। शारदा देवी से मुलाकात के बाद कहा कि अगला सीएम पार्टी अध्यक्ष ही तय करेंगी।
विश्लेषकों का कहना है कि राज्य की राजनीति में अगले कुछ दिन बेहद अहम साबित हो सकते हैं। सामान्य स्थिति की बहाली के लिए पुलिस और प्रशासन में बड़े पैमाने पर फेरबदल जरूरी है। इसके साथ ही केंद्र और नए मुख्यमंत्री को सकारात्मक और ठोस पहल करनी होगी। लेकिन ऐसे कई सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य़ के गर्भ में ही हैं।
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