International Men's Day: इमोशनली स्ट्रॉन्ग समझे जानें वाले पुरुष आखिर क्यों आत्महत्या करने को हैं मजबूर?
पुरुषों में बढ़ते आत्महत्या के आखिर क्या कारण हैं? क्या इसकी एक वजह यह है जिसमें वर्षों से हम मानते चले आ रहे हैं कि 'मर्द को दर्द नहीं होता'? या फिर फेमिनिज्म की मौजूद 'मोडिफाइड अवधारणा' पुरुषों के दमन पर केंद्रित है, जिसमें हमेशा हाशिए पर पुरुष ही होता है? या फिर कुछ और?
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विस्तार
लखनऊ के रमन चौहान (बदला हुआ नाम) लाफ्टर क्लब चलाते हैं, जहां मन को स्वस्थ रखने के लिए 'लाफिंग योग' करने रोजाना बड़ी भीड़ इकट्ठा होती है। 2015 में रमन की शादी हुई, घर की हल्की-फुल्की नोक-झोक धीरे-धीरे मानसिक तनाव का रूप लेने लगी। 2019 में रमन ने रोज-रोज की परेशानियों से तंग आकर आत्महत्या का प्रयास किया, शुक्र है कि उनकी जान बच गई।
इसी तरह से शादीशुदा पुरुषों में आत्महत्या के मामले पिछले एक दशक में काफी तेजी से बढ़े हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें घरेलू हिंसा के शिकार विवाहित पुरुषों में बढ़ते आत्महत्या को रोकने के लिए दिशा-निर्देश बनाने और पुरुषों की आवाज उठाने के लिए 'नेशनल कमीशन फॉर मेन' के गठन की मांग की गई। अधिवक्ता महेश कुमार तिवारी द्वारा दायर याचिका में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि साल 2021 में 1.64 लाख लोगों ने आत्महत्या की, इनमें से 81,063 लोग विवाहित पुरुष, जबकि 28,680 विवाहित महिलाएं थीं।
पुरुषों में बढ़ते आत्महत्या के आखिर क्या कारण हैं? क्या इसकी एक वजह यह है जिसमें वर्षों से हम मानते चले आ रहे हैं कि 'मर्द को दर्द नहीं होता'? या फिर फेमिनिज्म की मौजूद 'मोडिफाइड अवधारणा' पुरुषों के दमन पर केंद्रित है, जिसमें हमेशा हाशिए पर पुरुष ही होता है? या फिर कुछ और?
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देश में आत्महत्या के पिछले एक दशक के आंकड़े उठाकर देखें तो साफ पता चलता है कि इसमें पुरुषों, विशेषकर विवाहित पुरुषों के मामले अधिक रहते हैं। एनसीआरबी के साल 2015 में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के आकलन में विशेषज्ञों ने पाया था कि शादीशुदा महिलाओं की तुलना में विवाहित पुरुषों के आत्महत्या की आशंका अधिक होती है। पुरुषों के कुल आत्महत्या के केस में विवाहितों की संख्या सबसे अधिक 66 फीसदी, अविवाहित 21% जबकि विधुर-तलाकशुदा की संख्या 3% है।
आत्महत्या के कारणों में, पारिवारिक समस्याओं को सबसे ऊपर रखा गया है। पारिवारिक कलह और झगड़ों के चलते जहां साल 2014 में 18 हजार पुरुषों ने जान गंवाई वहीं महिलाओं में यह आंकड़ा 9,900 था।
वैश्विक आंकड़े भी हैरान करने वाले
ऐसा नहीं है कि पुरुषों में आत्महत्या के मामले सिर्फ भारत में अधिक हैं, वैश्विक आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं।
यूके में वैसे तो साल 1981 के बाद से पुरुष आत्महत्या दर में काफी सुधार है, प्रति एक लाख पर करीब 15.5 मौतें, लेकिन आत्महत्या अभी भी 45 वर्ष से कम आयु के पुरुषों में मौत का एक प्रमुख कारण है, महिलाओं में यह आंकड़ा केवल 5 है। महिलाओं की तुलना में, ऑस्ट्रेलिया में पुरुषों की आत्महत्या दर तीन गुना, अमेरिका में 3.5 गुना, रूस-अर्जेंटीना में चार गुना से अधिक है।
अमेरिकन फाउंडेशन फॉर सुसाइड प्रिवेंशन के वाइस प्रेसिडेंट रहे मनोवैज्ञानिक जिल हरकावी-फ्रीडमैन कहते हैं, पुरुषों में अधिक आत्महत्या के मामलों का ट्रेंड लंबे समय से देखा जाता रहा है। इसमें पुरुषों के आत्महत्या के तरीकों पर भी गौर करना जरूरी है। आत्महत्या का प्रयास में पुरुष-महिला दोनों के तरीके को देखें तो पता चलता है कि पुरुष आत्महत्या के तरीके अक्सर अधिक हिंसक होते हैं, जिसमें किसी के हस्तक्षेप करने से पहले मृत्यु की आशंका भी अधिक होती है।
इसका एक कारण आत्महत्या के साधनों तक आसान पहुंच है, दूसरा- अपने दर्द को व्यक्त न कर पाने के कारण पुरुषों की मानसिक स्थिति भी गंभीर देखी जाती रही है।
अपनी भावनाओं को खुलकर न व्यक्त कर पाना, रोकर अपने दुख को न निकाल पाना, लोगों से मदद मांगने में हिचक और सबसे गंभीर बात समाज में पुरुषों को लेकर बनी सोच, जिसमें उन्हें हमेशा 'मजबूत' मानकर चला जाता रहा है, जिसका दबाव हर पुरुष अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में करता है, यह भी विचारणीय है।
लड़कों को बचपन से दी जाती है न रोने की ट्रेनिंग
देश ही नहीं वैश्विक स्तर पर भी पुरुषों में बढ़ रहे आत्महत्या के मामलों के पीछे के कारण और मानसिकता को समझने के लिए हमने वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ सत्यकांत त्रिवेदी से बातचीत की। डॉ सत्यकांत 'Say Yes To Life' कैंपेन के साथ आत्महत्या रोकथाम को लेकर कैंपेन चला रहे हैं और मध्य-प्रदेश सरकार द्वारा आत्महत्या रोकथाम ड्राफ्ट के लिए गठित टीम के सदस्य हैं। डॉ सत्यकांत कहते हैं, पुरुषों, विशेषकर विवाहित पुरुषों में आत्महत्या के लिए सामाजिक अवधारणाएं एक प्रमुख कारण हो सकती हैं, जिसकी शुरुआत जाने-अनजाने बचपन से ही हो जाती है।
यह कहना बहुत सरल है कि महिलाएं अपनी समस्याओं को आसानी से साझा कर लेती हैं और पुरुष उन्हें अपनी शकभर बोतलबंद रखते हैं। इसके पैरेलल यह भी सच है कि सदियों से समाज ने पुरुषों को "मजबूत" होने के लिए प्रोत्साहित किया है और इस अनावश्यक कोशिश में पुरुषों की भावनाओं का हमेशा से दमन होता आ रहा है।
यह अक्सर बचपन में शुरू होता है। "हम लड़कों को बताते हैं कि 'लड़के रोते नहीं हैं', अगर कोई लड़का रोता है तो उसे ताने दिए जाते हैं कि क्या लड़कियों की तरह रो रहा है? बचपन से इस तरह की बातें सुन-सुनकर लड़कों की मानसिकता ऐसी हो जाती है कि आंसू निकलना हमारे जीवन के शब्दकोश का हिस्सा ही नहीं है, लिहाजा वह दर्द में भी रोने से बचते हैं।
वहीं दूसरी तरफ पुरुषों-महिलाओं का मस्तिष्क और भावनाएं कुदरत ने एक जैसी ही बनाई हैं। महिलाएं आंसू के जरिए आसानी से अपनी समस्याएं व्यक्त कर लेती हैं, और पुरुष वही आंसू घूंट कर रह जाते हैं। यह घूंटना, दिमाग के कोने में बना रह जाता है जो एक समय गंभीर रूप ले लेता है। यही कारण है कि किसी एक ही भावनात्मक स्थिति में पुरुष-महिला दोनों को रखा जाए तो महिलाएं उसे बेहतर ढंग से डील कर लेती हैं। उदाहरण के लिए ब्रेकअप के तनाव से लड़कियां बहुत जल्द निकल आती हैं, वहीं लड़कों के लिए यह उतना ही कठिन टास्क होता है।
लड़कों में बचपन से स्वस्थ संवाद की कमी
बचपन की परवरिश का भावनात्मक रूप से क्या असर होता है, इस बारे में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के एक अध्ययन प्रकाशित हुआ जिसमें शोधकर्ताओं ने बताया कि लड़कियों की तुलना में लड़कों में बचपन से ही भावनात्मक संवाद का अभाव होता है। इसका असर हमेशा बना रहता है।
मेडिकल परामर्श (उदाहरण के लिए अवसाद के लिए इलाज कराने की दर) को लेकर भी, इस बात का मूल्यांकन किया गया कि मानसिक रोगों के लिए महिलाओं की तुलना में पुरुषों के मनोचिकित्सकों से मिलने की दर भी 8 फीसदी कम थी, क्योंकि पुरुष तो मानता चला आ रहा है कि वह 'स्ट्रांग' है।
इसी विषय को लेकर कनाडा में सेंटर फॉर सुसाइड प्रिवेंशन के कार्यकारी निदेशक मारा ग्रुनौ कहते हैं कि हम अपने बच्चों से कैसे बात करते हैं और उन्हें संवाद करने के लिए कैसे प्रोत्साहित करते हैं, इसका भी भावनाओं पर असर होता है। माताएं अपने लड़कों की तुलना में लड़कियों से ज्यादा बात करती हैं, वे आपस में भावनाओं को साझा कर लेते हैं। हम महिलाओं से भावनात्मक होने की उम्मीद भी करते हैं। वहीं लड़का पिता से बहुत ज्यादा बात नहीं कर पाता है, ऐसे में लड़कों के पास अपने विचारों-भावनाओं को शेयर करने के लिए माता-पिता दोनों का अभाव होता है। बचपन की इस आदत का ताउम्र असर बना रहता है।
निष्कर्ष में डॉ सत्यकांत कहते हैं, इस तरह से बचपन-किशोरावस्था में लड़कों में भावनाओं को दबाने की आदत बनी रह जाती है, जो विवाह के बाद अगर तनाव जैसी स्थिति पैदा होती है, तो उसमें भी देखी जाती है। आत्महत्या के बढ़ते मामलों के लिए यह मजबूत आधार है, जिसमें विशेष सुधार ही आवश्यकता है।
पुरुष क्यों रो नहीं सकता, इसको पुरुषत्व से जोड़कर क्यों देखा जाता रहा है यह सोच के परे हैं।
इसके अलावा समाज में जेंडर बायस्ड सोच, अवधारणाएं भी पुरुषों में आत्महत्या के बढ़ते मामलों का एक कारण मानी जा सकती हैं, जिसपर भी अब चर्चा करना जरूरी है।
फेमिनिज्म का गलत रूपांतरण और महिला कानूनों का दुरुपयोग
इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि महिलाओं के साथ समाज में अन्याय होता आया है, शोषण-बलात्कार से लेकर मानसिक प्रताड़ना तक, अक्सर ऐसे मामले अखबारों की सुर्खियां रहे हैं। महिलाओं को सुरक्षित माहौल और समानता का अधिकार मिल सके, इसके लिए उनके पक्ष में कई कानून भी बने हैं। पर इसके पैरेलल इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि इन कानूनों का रंजिश या बदले के भाव से गलत इस्तेमाल भी होता आ रहा है।
एक दैनिक अखबार में हाल में ही में हरियाणा के पानीपत शहर की रिपोर्ट छपी जिसके मुताबिक-
पिछले तीन साल के भीतर झूठे मामले दर्ज कराने वाली लड़कियों-महिलाओं के खिलाफ 50 से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं। स्थानीय पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत कार्रवाई कर रही है, जिसमें झूठा आरोप लगाने वाले को 6 माह तक की सजा का प्रावधान है। साल 2021 में जहां महिलाओं द्वारा 220 केस दर्ज किए गए जिसमें से 87 को झूठा पाकर कैंसिल कर दिया गया है। वहीं 2022 में 178 मामले दर्ज हुए जिसमें से 67 को रद्द किया गया है।
इस बारे में समझने के लिए हमने देश की एक्टिविस्ट और पुरुष आयोग की प्रेसिडेंट बरखा त्रेहन से बातचीत की, बरखा 'पुरुष आयोग बनाने की मांग' को लेकर कैंपेन चलाती रही हैं। बरखा कहती हैं, न तो हर पुरुष रावण होता है, न हर महिला सीता, तो हमें अब तक की चली आ रही अवधारणा कि 'विक्टिम सिर्फ महिला होती है' इसे बदलने की जरूरत है।
ऐसे कई मामले हैं जिसमें महिलाओं ने, पति-ब्वायफ्रेंड पर स्वार्थ, रंजिश या बदले के भाव से गलत आरोप लगाए हैं। कई मामले तो वर्षों तक चलते हैं, इसमें पुरुष जेल में होता है और वर्षों बाद जब उसपर आरोप सिद्ध नहीं हो पाते तो कोर्ट को छोड़ना पड़ता है। पर इस दौरान वह पुरुष जिन भावनाओं से गुजरता है, सामाजिक प्रतिष्ठा में जो क्षति होती है, क्या हम उसकी भरपाई कर सकते हैं? इसे विवाहित पुरुषों में आत्महत्या बढ़ने के कारण के तौर पर जरूर देखा जाना चाहिए। महिला कानूनों के दुरुपयोग के चलते हुई बेइज्जती के लिए अक्सर ऐसे पुरुष अवसाद के शिकार हो जाते हैं, इसकी भरपाई कौन करेगा?
दूसरा- फेमिनिज्म की अवधारणा में महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने की सोच थी, पर इसका भी वर्षों से अपनी सहानुभूति के अनुसार गलत इस्तेमाल होता आ रहा है। फेमिनिज्म को 'माई बॉडी माई च्वाइस' का मुद्दा बना दिया गया है। इसके गलत रूपांतरण ही परिवारों में बिखराव का प्रमुख कारण है। मां-पत्नी की लड़ाई की चक्की में पिसता पुरुष रहता है, पर न तो कभी उससे उसका हाल पूछा जाता है, न ही इसपर बात होती है, क्योंकि हमारा समाज तो मानता ही आ रहा है पुरुष मजबूती का प्रतीक है। इस दिखावे की मजबूती का जामा ओढ़े पुरुष अंदर से टूटे हुए मिलेंगे पर सहानुभूति वाले पलड़े का झुकाव इस तरफ कभी होता ही नहीं है।
बरखा त्रेहान कहती हैं, यही कारण है कि देश को न सिर्फ 'पुरुष आयोग' की आवश्यकता है साथ ही महिला कानूनों के हो रहे दुरुपयोग पर रोक लगाने और गलत आरोप लगाने वालों पर भी कठिन कार्रवाई की जाने की आवश्यकता है।
हमें अपनी सोच भी बदलनी होगी, यह स्वीकारना होगा कि पुरुष भी विक्टिम हो सकते हैं, शायद ऐसा करके हम पुरुषों को ऐसा माहौल दे सकें जिसमें वह भी अपनी भावनाओं-दर्द और आंसू को खुलकर बहा सकें। विवाहित पुरुषों की आत्महत्या रोकथाम के लिए यह आवश्यक है। पुरुष आयोग का गठन आज की जरूरत है।
रो लो पुरुषों, क्योंकि यह प्राकृतिक है और जरूरी भी
क्या वास्तव में हमारा समाज, कानून व्यवस्था और सामाजिक अवधारणाएं इतनी जटिल हैं कि सदियों से अब तक हम यह ही नहीं स्वीकार कर पाए कि मर्द को भी दर्द हो सकता है, उसी तरह जैसे महिला को होता है?
सामाजिक अवधारणा और कानून के बारे में समझने के लिए हमने मध्यप्रदेश राज्य पुलिस सेवा की अधिकारी और कवियत्री पल्लवी त्रिवेदी (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ में ए.आई.जी.) से बातचीत की। वह कहती हैं, इससे बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता है कि कई सारे मामलों में महिलाओं के हक के लिए बनाए गए कानून का गलत उपयोग करते हुए रंजिश या बदले के भाव से मामले रिपोर्ट कर दिए जाते हैं। पर इसमें अब पुलिस काफी गंभीरता बरत रही है, किसी भी मामले में हम दोनों पक्षों को ठीक से समझे बिना केस नहीं दर्ज कर रहे हैं।
यह बिल्कुल सही है कि हमारा समाज अब तक यह स्वीकार ही नहीं कर पाया है कि पुरुष भी कभी अंदर से टूट सकते हैं, उन्हें भी अपने दुख बांटने के लिए आंसू बहाने के लिए कंधे की जरूरत होती है। वर्षों से चली आ रही इस रूढ़िवादी सोच का नतीजा ये रहा है कि पुरुषों का आंसू पी जाना, उनमें मानसिक रोग के खतरे को बढ़ा रहा है, जिसकी वजह से अवसाद और आत्महत्या के मामले बढ़ गए हैं। पुरुषों को भी परिस्थितिगत बिल्कुल रोना चाहिए, यह प्राकृतिक है, आंसू को छिपाना क्यों?
पुरुषों की इसी पीड़ा का शब्दों में पिरोते हुए पल्लवी त्रिवेदी की यह कविता पढ़िए-
बड़ा कमज़ोर होता है,बुक्का फाड़कर रोता हुआ आदमी
मज़बूत आदमी बड़ी ईर्ष्या रखते हैं इस कमजोर आदमी से।
सुनो लड़कियों, किसी पुरुष को बेहद चाहती हो?
तो एक काम जरूर करना, उसे अपने सामने फूट-फूट कर रो सकने की सहजता देना
दुनिया वालों ,दो लोगों को कभी मत टोकना
एक, दुनिया के सामने दोहरी होकर हंसती हुई स्त्री को
दूसरा बिलख-बिलख कर रोते हुए आदमी को
ये उस सहजता के दुर्लभ दृश्य हैं जिसका दम घोंट दिया गया है।
ओ मेरे पुरुष मित्र, याद है जब जन्म के बाद नहीं रोये थे
तब नर्स ने जबरन रुलाया था यह कहते हुए कि
"रोना बहुत ज़रूरी है इसके जीने के लिए
बड़े होकर ये बात भूल कैसे गए दोस्त ?
रो लो पुरुषों , जी भर के रो लो
ताकि तुम जान सको कि छाती पर से पत्थर का हटना क्या होता है?
ओ मेरे प्रेम, आखिर में अगर कुछ याद रह जाएगा तो
वह तुम्हारी बाहों में मचलती पेशियों की मछलियां नहीं होंगी
वो तुम्हारी आंख में छलछलाया एक कतरा समन्दर होगा
ओ पुरुष, स्त्री जब बिखरे तो उसे फूलों-सा सहेज लेना
ओ स्त्री, पुरुष को टूटकर बिखरने के लिए थोड़ी-सी ज़मीन देना।।
सोचिए-विचारिए, आकलन करिए कि हम किस समाज में जी रहे हैं, जहां महिला का इमोशनल होना उसका सहज रूप माना जाता है और पुरुष का इसी इमोशन को दबाना। जबकि मनोविज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि पुरुष-महिला दोनों के मस्तिष्क और भावनाएं ईश्वर ने एक ही जैसे बनाए हैं।
अंत में आईएएस कोचिंग के मशहूर शिक्षक डॉ विकास दिव्यकीर्ति की उस लाइन के साथ आपको छोड़ जाते हैं, जिसमें वह कहते हैं, लड़कियों को शादी के लिए लड़के को चुनते समय यह जरूर पूछना चाहिए कि आखिरी बार कब रोए थे? अगर जवाब है कि मैं तो रोता ही नहीं तो उससे शादी मत करना क्योंकि जो रोता ही नहीं वह असल में भावनाशून्य है, वह आपकी भावनाओं को क्या समझेगा?
शादी का चुनाव करते समय तो आंसू बहाने को पैरामीटर माना जा सकता है, तो शादी के बाद इसे पुरुष की कमजोरी क्यों माना जाता है? विचार कीजिएगा और हां, कभी रोना आए तो किसी खास के कंधे पर सिर रखकर रोने में संकोच मत करिएगा, आप तो भावनाशून्य नहीं हो सकते।
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