फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   National Sports Day 2019 Mobile games replacing field games

राष्ट्रीय खेल दिवस 2019 : भारत में है खेल स्कूलों का अभाव फिर कैसे आएगी खेल क्रांति?

Thu, 29 Aug 2019 02:45 PM IST
Devendra Suthar देवेंद्र सुथार
Updated Thu, 29 Aug 2019 02:45 PM IST
विज्ञापन
National Sports Day 2019 Mobile games replacing field games
Major Dhyanchand

देश में प्रतिवर्ष 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल हॉकी के महान जादूगर मेजर ध्यानचंद की स्मृति में 'राष्ट्रीय खेल दिवस' मनाया जाता है। मेजर ध्यानचंद के बारे में कहा जाता है कि उनकी स्टीक पर आई गेंद, गोल करके ही लौटती थी। उन्हीं के नेतृत्व में भारतीय हॉकी टीम लगातार तीन बार ओलंपिक विजेता बनी थी। जब उनके खेल से प्रभावित जर्मनी शासक हिटलर ने उन्हें अपने देश के लिए खेलने और ऊंचा ओहदा देने का प्रस्ताव दिया तो मेजर ध्यानचंद ने यह कहकर ठुकरा दिया कि, मैं अपनी मातृभूमि से जुड़कर उसकी सेवा करना चाहता हूं।

विज्ञापन


वे एक अकेले भारतीय थे जिन्होंने आजादी से पहले भारत में ही नहीं जर्मनी में भी भारतीय झंडे को फहराया। उस समय हम अंग्रेजों के गुलाम हुआ करते थे, भारतीय ध्वज पर प्रतिबंद था। इसलिए उन्होंने ध्वज को अपनी नाईट ड्रेस में छुपाया और उसे जर्मनी ले गए। इस पर अंग्रेजी शासन के अनुसार उन्हें कारावास हो सकती थी लेकिन हिटलर ने ऐसा नहीं किया।
विज्ञापन


ऐसे महान देशभक्त खिलाड़ी का देश आज खेलों में फिसड्डी है तो यह हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए। आजादी के सात दशक के बाद भी देश में खिलाड़ी आर्थिक तंगहाली से जूझने को विवश है। इसका उदाहरण है कॉमनवेल्थ खेलों में वेटलिफ्टिंग में देश को स्वर्ण पदक दिलाने वाली पूनम यादव। पूनम यादव के खेल के लिए उनके पिता को अपनी भैंस बेचनी पड़ी। और तो और जब राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीती तो उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वे अपनी खुशी बांटने के लिए मिठाई खरीद सकें।
विज्ञापन
विज्ञापन


 

National Sports Day 2019 Mobile games replacing field games
मेजर ध्यानचंद

क्या इस तरह देश में खेल क्रांति आयेगी? खेलों में महाशक्ति अमेरिका में सभी 3.60 करोड़ विद्यार्थियों के लिए खेल अनिवार्य है। हर साल वहां कोई 4 से 5 करोड़ युवा खिलाड़ियों के टैलेंट पूल यानी प्रतिभा से मेधावी खिलाड़ी चुने जाते हैं और उन्हें अलग-अलग सेन्टर्स में निखारा जाता है। चीन में खेल स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। इसके अतिरिक्त चीन में 5 लाख से ज्यादा स्पोर्ट्स स्कूल है जहां हर गांव, हर गली से छांटकर मेधावी खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए अडवांस प्रशिक्षण दिया जाता है। जबकि भारत में खेल स्कूलों का अभाव तो है ही, दूसरा स्कूलों में खेल अनिवार्य नहीं होने के कारण खिलाड़ियों की प्रतिभा निखरने की बजाय दबी ही रह जाती है।

दरअसल, आज देश में खेल खेलने वालों से ज्यादा खेल की बात करने वाले लोग हैं, और उससे भी ज्यादा खेलों को और खिलाड़ियों को गरियाने वाले लोग है। हमारी शारीरिक क्षमता और कुशलता किसी से कम नहीं है। फिर भी हम खेलों में फिसड्डी रहते हैं तो इसलिए कि खेलों के प्रति हमारा रवैया बीमार और विकलांग है। एक जमाना था जब मां बेटे से कहती थी कि बेटा, खेलकर घर वापस कब आओगे? और एक आज का जमाना है जब मां बेटे से कहती है कि बेटा, खेलने के लिए घर से कब जाओगे? निश्चित ही बदलते तकनीकी दौर में आज की पीढ़ी का मैदान के खेलों के प्रति उत्पन्न होती अरुचि और मोहभंग चिंता का विषय है।

गौर करें तो इस स्थिति के पीछे के कई कारण सामने आते हैं। पहला तो यह है कि इलोक्ट्रॉनिक उपकरण (स्मार्ट फोन, मोबाइल, लेपटॉप) इत्यादि के उपयोग में तीव्रगामी परिवर्तन आना। छोटी उम्र में बच्चों के हाथों में मोबाइल आने के बाद वे अपना सारा समय इसमें ही गंवा देते हैं। उनका खेलना, खाना-पीना सबकुछ ऑनलाइन होता जाता है। वहीं अधिक समय तक अधिक चमक वाले उपकरण पर दिमाग खपाने से उनकी आंखों की रोशनी पर विपरीत प्रभाव पड़ता जाता है। वस्तुतः उम्र से पहले ही आंखों पर चश्मा आना इसी का परिणाम है। यह भी प्रायः देखा गया है कि मोबाइल के खेल खेलने से अक्सर बच्चें चिड़चिड़ेपन से ग्रस्त हो जाते हैं और अकेलापन महसूस करते हैं। बात-बात पर आक्रोश की मुद्रा धारण करना और नकारात्मक हो जाना इसी का दुष्परिणाम है। मैदान के खेलों का क्रेज खत्म होने का दूसरा कारण मैदानों की निरंतर कमी होना है।

 

National Sports Day 2019 Mobile games replacing field games
mobile game

भौतिकवादी सुविधाओं के मोह में मैदानों की जगह दस-बारह मंजिल की अट्टालिका का निर्माण किया जाने लगा है। गांव में तो आज भी खुली जगह बच्चों को खेलने के लिए आमंत्रण देती है लेकिन शहर की घुटन भरी जिंदगी में निकटवर्ती कोई मैदान बच्चों के खेलने के लिए सुरक्षित नहीं रहा है। जिसके कारण बच्चे खाली समय में बोरियत कम करने के लिए अनायास ही मोबाइल और कम्प्यूटर के खेलों के शिकार हो जाते हैं।

तीसरा कारण यह भी है कि हमारे समाज में अक्सर बड़े-बुजुर्गों के मुंह से कहावत सुनने को मिलती है कि 'खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब और पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब' बच्चों को केवल किताबों तक ही संकुचित करती हैं। पढ़ाई के साथ खेल भी बहुत ही जरूरी है। मानव मस्तिष्क एक हद तक पढ़ाई कर सकता है। अतः मन को हरा-भरा रखने और शरीर को तरोताजा करने के लिए खेलों को खेलना भी अतिआवश्यक है। चौथा कारण है अभिभावक के पास समय का अभाव होना। रोजमर्रा की जिंदगी में धनार्जन करने की प्रवृत्ति ने हर किसी को व्यस्त कर दिया है। दूसरों के लिए तो छोड़िए, स्वयं और परिवार के लिए भी समय निकालना व्यक्ति के लिए दूभर होता जा रहा है।

ऐसे में आज के मासूमों को कौन बचपन के खेल (डिब्बा स्पाइस, सतोलिया, लुका छिपी, लगंड़ी, कबड्डी, खो-खो) इत्यादि के बारे में बताएगा? जिससे मासूम मन में इन खेलों के प्रति खेलने की जिज्ञासा उत्पन्न हो सके। बेशक, कुछ गलतियां तो अभिभावकों की भी हैं, जिन्हें समय रहते सुधारा जा सकता है। अगर समय रहते हम बालमन के मनोवैज्ञानिकता को लेकर सचेत नहीं हुए तो 'ब्लू व्हेल' नामक खूनी खेल हमारे देश के नौनिहालों की जान के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे।

 

National Sports Day 2019 Mobile games replacing field games
दीपा कर्माकर

आज हमें ऐसी नीतियों का निर्माण करने की जरूरत है, जिससे खेलों को सम्मानित मुकाम हासिल हो सके। खेल केवल मनोरंजन तक ही सीमित न हो, बल्कि यह एक कैरियर के तौर पर भी अपनाया जाए। अगर हम चाहते हैं कि खेल की दुनिया में देश की अमिट पहचान बने तो इसके लिए हमें खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। और उसके विकास के लिए लगातार प्रयास करने होंगे। इसके लिए सरकार को निजी, गैर सरकारी, सामुदायिक संगठनों के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। निजी संस्थाओं द्वारा शोध और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए छात्रवृत्ति एवं वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, ठीक उसी प्रकार क्या हम भी खिलाड़ियों को आर्थिक मदद और प्रोत्साहन उपलब्ध नहीं करा सकते? यदि हम इंग्लैण्ड से प्रेरणा लें तो आज भी वहां सरकारी अनुदान उतना अधिक नहीं है जितना निजी क्षेत्रों द्वारा खेलों को प्रोत्साहन दिया जाता है।

आज जरूरत है कि मैदान के खेलों के प्रति बाल और युवा पीढ़ी का ध्यान आकर्षित किया जायें। उन्हें बताया जायें कि मोबाइल और कम्प्यूटर पर क्रिकेट खेलने से कई अधिक मजा मैदान में जाकर क्रिकेट खेलने से है। भारत सदैव से ही खेल परंपरा का संवाहक रहा है। यहां पी वी सिंधु, साइना नेहवाल, झूलन गोस्वामी, दीपिका कुमारी, दीपा कर्माकर, साक्षी मलिक, पी.टी. उषा, मिल्खा सिंह, महेंद्र सिंह धोनी, बाईचुंग भूटिया, पंकज आडवाणी, अभिनव बिंद्रा, सुशील कुमार, सचिन तेंदुलकर जैसे कई महान खिलाड़ियों ने दमखम के साथ विश्वपटल पर तिरंगे का नाम ऊंचा किया है। आज इन्हीं सब से प्रेरणा लेकर बच्चों में खेलों के प्रति उत्साह और आशा का माहौल बनाने की जरूरत है। क्योंकि देश की एकता को बरकरार रखने के लिए भाईचारे, प्रेम और मैत्री की भावना इन्हीं खेलों से विकसित की जा सकती है। इसलिए खेल संस्कृति को एक बार फिर से जीवित करने की जरूरत है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed