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इन चुनौतियों से जूझ रहे हैं कमलनाथ, इसलिए मंडरा रहा है सरकार गिरने का खतरा?

Thu, 30 May 2019 03:22 PM IST
Ajay Khemariya अजय खेमरिया
Updated Thu, 30 May 2019 03:22 PM IST
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madhya pradesh election result congress bjp is kamalnath government stable, jyotiraditya sindhiya
मप्र की कांग्रेस राजनीति में आपसी संघर्ष की नई पटकथा चल रही है। - फोटो : PTI

गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने मप्र की कांग्रेस राजनीति में आपसी संघर्ष की नई पटकथा लिख दी है। नकुलनाथ को छोड़कर मप्र के सभी कांग्रेसी सूरमा बुरी तरह से हारे हैं। सरकार के तीन चौथाई मंत्रियों के इलाकों से कांग्रेस  बुरी तरह हारी है। मुख्यमंत्री ने 22 प्लस का नारा दिया था, लेकिन 29 में से 28 सीटों पर कांग्रेस बुरी तरह हारी है।

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भोपाल में दिग्विजयसिंह, गुना में सिंधिया, सीधी में अजय सिंह,जबलपुर में विवेक तन्खा जैसे दिग्गज नेता बुरी तरह परास्त हुए हैं। मप्र की इस हार ने एक बार फिर कांग्रेस दिग्गजों को एक दूसरे के आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है।
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क्यों उठ रहे हैं मप्र के दिग्गज कांग्रेसियों पर सवाल? 
पूर्व मंत्री और 6 बार से विधायक केपी सिंह ने यह कहकर मामले की गंभीरता को सामने ला दिया कि अब राजा महाराजा को चाहिए कि मुख्यमंत्री कमलनाथ को फ्री हैंड छोड़कर राजा (दिग्गिराजा),महाराजा( सिंधिया) दिल्ली में आराम करें। इधर बाल विकास मंत्री इमरती देवी, पशुपालन पालन मंत्री लाखन सिंह यादव ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिए हैं।
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एक टीवी शो में कांग्रेस की हार पर पक्ष रखते हुए मुकेश नायक ने भी कमलनाथ की कार्यशैली पर उनके अंतर्मुखी व्यक्तित्व को लेकर कुछ इसी तरह से सवाल खड़ा किया है। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सबसे ज्यादा घबराहट मप्र की कमलनाथ सरकार में देखी और सुनी जा रही है।
 

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राज्य कांग्रेस में दिग्गज नेताओं में ही गुटबाजी और मनमुटाव सामने आ रहा है। - फोटो : Twitter Congress @INCIndia

क्या वाकई मप्र में कमलनाथ सरकार को कोई खतरा है?
हाल की विधायक दल की बैठक के बाद से लगता तो नहीं है जिसमें 121 का आंकड़ा परेड के लिए तैयार था। लेकिन बावजूद इसके खतरा घर में खड़ा है। बहुमत से 2 विधायक कम रहने के कारण कमलनाथ  मंत्रिमंडल  गठन में सीनियरिटी, क्षेत्रीय सन्तुलन का ध्यान नहीं रख पाए। 6 बार तक के लगातार विधायक मंत्री नहीं बनाए गए और दूसरी बार विधायक बने कई लोग मंत्री बनने में सफल रहे।

दरअसल, यह स्थिति कमलनाथ के लिए मजबूरी में निर्मित हुए क्योंकि सिंधिया, दिग्गिराजा के दबाव में उनके कोटे पूरे करने पड़े। इस बीच वरिष्ठता, कैडर को पीछे रखना पड़ा और यहीं से इस सरकार  की स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे। खुद कांग्रेस विधायकों के बयानों ने इस हवा को बनाने का काम किया।

मंत्रिमंडल में आने से वंचित रहे सीनियर विधायकों ने एक दूसरे के सरदारों पर खुलेआम निशाना साधना शुरूकर दिया। एडल सिंह कंषाना, जयवर्द्धन सिंह दत्ती गांव, बिसाहूलाल सिंह, नातीराजा,केपी सिंह,लक्ष्मण सिंह, जैसे 20 से अधिक विधायक मंत्री पद की महत्वाकांक्षा लिए हुए हैं। सपा, बसपा,औऱ  सभी 4 निर्दलीय विधायक भी मंत्री रुतबा चाहते हैं।

कमलनाथ की बुनियादी दिक्कत यही है कि उनके पास दावेदारों को समायोजित करने के लिए विकल्प बहुत सीमित हैं। बुरहानपुर औऱ सुसनेर के निर्दलीय विधायक भी आंखे तरेर रहे हैं। भिंड के बसपा विधायक मूलतः भाजपाई ही हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस में अंदरूनी चुनौतीयां कम नहीं है।

सिंधिया की नाराजगी और परिणामों से बढ़ी असंतोष की आग 
लोकसभा चुनावों के परिणामों ने इस अंदरुनी क्लेश को औऱ भी गहरा कर दिया है। सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र वाले मध्यांचल में पार्टी बुरी तरह हारी है। सिंधिया से जुड़े एक बड़े नेता के अनुसार इस स्थिति के लिए मुख्यमंत्री और दिग्विजयसिंह जिम्मेदार हैं क्योंकि टिकट वितरण में सिंधिया की पसन्द को दरकिनार किया गया। भिंड में सिंधिया नहीं चाहते थे कि देवाशीष जरारिया को टिकट दी जाए क्योंकि उनकी इमेज कट्टर दलित एक्टिविस्ट की है और 2 अप्रैल के सवर्ण वर्सेज दलित झगड़े में उनकी भूमिका आपत्तिजनक थी इसके बाद भी सीएम औऱ दिग्गिराजा की सिफारिश पर भिंड से देवाशीष को टिकट दी गई। परिणाम 2 लाख से कांग्रेस हार गई और इसका असर अंचल के आसपास भी पड़ा।

ग्वालियर की सीट पर भी सिंधिया नहीं चाहते थे कि अशोक सिंह को कांग्रेस की टिकट मिले। अशोक 3 चुनाव यहां से हार चुके थे। दो बार तो उन्होंने महल के उम्मीदवार सिंधिया की बुआ श्रीमती यशोधरा राजे को कड़ी टक्कर दी थी। सिंधिया यहां से किसी अन्य समर्थक को टिकट दिलाने के लिए प्रयासरत थे लेकिन कमलनाथ औऱ दिग्गिराजा के दबाव में अशोक सिंह टिकट पाने में सफल रहे।

हालांकि मुरैना में जरूर उनकी सिफारिश पर रामनिवास रावत को टिकट मिली। सिंधिया भिंड औऱ ग्वालियर के टिकट वितरण से इतने नाराज थे कि जब इनके समर्थन में राहुल गांधी सभा करने आए तो सिंधिया शिवपुरी में रहते हुए भी इन सभाओं में नहीं गए। ग्वालियर औऱ भिंड में एक एक सभा लेने वे गए जरूर पर सभा मंच से ही स्पष्ट कर दिया कि दोनो राहुल गांधी के खड़े किए प्रत्याशी हैं उनका इशारा आसानी से समझा जा सकता था।
 

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चुनाव के बीच यह अंदरुनी खींचतान साफ दिखाई दी। - फोटो : फाइल फोटो

सिंधिया के खिलाफ काम कर रहे थे 
इस बीच कट्टर महल विरोधी दलित नेता फूल सिंह बरैया, साहब सिंह गुर्जर को कमलनाथ ने सीधे कांग्रेस ज्वाइन करा दी।  इससे सिंधिया नाराज हो गए। उन्होंने भी जवाबी हमला करते हुए ठाकुर लॉबी के दुश्मन चौधरी राकेश को अपने मंच से ही कांग्रेस में शामिल कर दिया। मुरैना से 2014 में डॉ गोविन्द सिंह  की हार सुनिश्चित करने वाले व्रन्दावन सिंह को भी सिंधिया ने इसी होड़ में बसपा से कांग्रेस में शामिल कराया।

सिंधिया कोटे से मंत्री प्रधुम्न सिंह,इमरती देवी,गोविंद राजपूत, प्रभुराम चौधरी,तुलसी सिलावट, लाखन सिंह पूरे समय अपने अपने जिले छोड़कर गुना में जुटे रहे। यह स्थिति कांग्रेस के अन्दर के असली हालातों को बयां करने के लिए पर्याप्त है।

भिंड,ग्वालियर के टिकट को लेकर सिंधिया की नाराजगी का स्तर इस बात से ही समझा जा सकता है की वे 12 मई को वोटिंग के बाद सिर्फ एक सभा के लिए धार गए। इसके बाद वे विदेश रवाना हो गए। जबकि 19 मई को जिन 9 सीटों पर मप्र में मतदान था वे सभी सिंधिया स्टेट के प्रभाव क्षेत्र वाली थीं। इंदौर, उज्जैन में तो प्रियंका गांधी तक प्रचार करने आई पर सिंधिया नहीं गए। इसी तरह सिंधिया के चुनाव में दिग्विजय सिंह के समर्थक भी उदासभाव के साथ सिंधिया की पराजय की कामना करते रहे। उन्हें 2002 के बाद से वैसे ही पूछा नहीं जा रहा है और यह अलग बात है कि सिंधिया विरोधी समझे जाने वाले पिछोर के विधायक केपी सिंह के यहां से सिंधिया 16 हजार से जीतने में सफल रहे शेष सभी असेंबली सेग्मेंट में सिंधिया हार गए।

बहुत मुश्किल दौर से गुजर रही है कांग्रेस 
आने वाले समय कांग्रेस के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने है क्योंकि सरकार की स्थिरता पर सदैव सवाल बना रहेगा औऱ खेमेबाजी तेजी से बढ़ने वाली है। इधर कार्यकर्ताओं के लिए संगठन जनसेवा के लिए प्रेरित कर पाएगा इसकी संभावना क्षीण इसलिए है क्योंकि एक तो सत्ता 15 साल बाद मिली है, दूसरा कांग्रेस यहां बहुसंस्करणीय है।  दिग्विजय सिंह की कांग्रेस, महाराजा की कांग्रेस और कमलनाथ की कांग्रेस। इनमें इतना ज्यादा आपसी इन्टॉलरेंस है कि आप कांग्रेस खोज नहीं सकते हैं। राहुल गांधी और उनके वामी सलाहकार पहले ही मप्र कांग्रेस के आपसी इन्टॉलरेंस को ही खत्म कर दें तो यह बड़ी बात होगी उनके नेतृत्व में।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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