लोकसभा चुनाव परिणाम और भाजपा: राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद चुनाव न कराकर भाजपा ने की गलती.!
वैसे आज की परिस्थितियों को देखकर लगता है कि भाजपा ने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद लोकसभा चुनाव नहीं कराकर बड़ी राजनीतिक भूल की है, क्योंकि उस समय देश में राम मंदिर को लेकर एक लहर दौड़ रही थी।
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4 जून को जैसे-जैसे ईवीएम खुल रही थीं और वोटों की गिनती हो रही थी, वैसे-वैसे भारतीय जनता पार्टी बहुमत के जादुई आंकड़े से पिछड़ती जा रही थी, तब एक विचार भाजपा कार्यकर्ताओं के मन में जरूर आ रहा था, काश! अयोध्या में भागवान राम के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के ठीक बाद फरवरी-मार्च में लोकसभा चुनाव करा लिए जाते तो पार्टी को राम मंदिर की लहर का भरपूर लाभ मिलता। वो बहुमत का आंकड़ा स्वयं अपने बल पर हासिल कर लेती। यह विचार अब इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि पिछले साल नवंबर-दिसंबर में सोशल मीडिया पर यह चर्चा बहुत तेजी से चली थी।
दरअसल, उन चर्चाओं में कहा जा रहा था कि 22 जनवरी को राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा भंग कर नए चुनावों की सिफारिश राष्ट्रपति से करने वाले हैं। इस चर्चा का शुरुआत में सरकार की ओर से कोई खंडन नहीं आया। हालांकि कई दिनों की चर्चा के बाद नरेंद्र मोदी सरकार के कुछ मंत्रियों ने जल्दी चुनाव के इस विचार को खारिज किया। तब यही कहा गया था कि मोदी 2.0 सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी और समय पर चुनाव होंगे।
वैसे आज की परिस्थितियों को देखकर लगता है कि भाजपा ने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद लोकसभा चुनाव नहीं कराकर बड़ी राजनीतिक भूल की है, क्योंकि उस समय देश में राम मंदिर को लेकर एक लहर दौड़ रही थी। हर घर पर भगवा लहरा रहा था। लोग दीपावली मना रहे थे। फिर दिसंबर में भाजपा तीन बड़े राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बहुमत के साथ सरकार में लौटी थी। तीनों राज्यों में भाजपा को अच्छा समर्थन मिला था। हालांकि, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा ने उस समर्थन को सीटों में तब्दील कर लिया है, लेकिन राजस्थान में पार्टी हैट्रिक लगाने से चूक गई।
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दरअसल, राज्य में 25 में से 11 सीटें पार्टी हार गई है। फरवरी में चुनाव कराने का सबसे अधिक लाभ राजस्थान में मिल सकता था, क्योंकि राम मंदिर के लिए सर्वाधिक चंदा यदि किसी राज्य से आया तो वो राजस्थान है। राम मंदिर की लहर में जाति की राजनीति भी पीछे छूट जाती। उस दौरान इंडी गठबंधन केवल बैठकों में जुटा था। गठबंधन में किसी एक मुद्दे पर सहमति नहीं बन पा रही थी।
नरेंद्र मोदी का समय से पहले लोकसभा चुनाव कराने का फैसला इंडी गठबंधन को हैरान कर देता। इंडी गठबंधन को चुनावी तैयारी का खास मौका नहीं मिल पाता। उसका विश्वास डगमगा जाता। दूसरा, कांग्रेस ने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण पत्र ठुकरा दिया था। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव समेत कई अन्य दलों ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह में न जाने का निर्णय लिया था। उस समय इन पार्टियों की छवि हिंदू विरोधी होने का प्रचार भाजपा कर रही थी।
मुद्दे और भाजपा के लिए चुनाव
दरअसल, राम मंदिर भाजपा के उन तीन प्रमख मुद्दों में शामिल रहा है, जिन्हें लेकर पार्टी अपने गठन के साथ संकल्प पत्र में शामिल करती आ रही है। जम्मू- कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का वादा पूरा होने के बाद राम मंदिर पर पार्टी ने पूरा दांव लगाया था। जनता भी इस बात से खुश थी कि 500 साल की लड़ाई के बाद अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनकर तैयार हो रहा है।
अयोध्या में विकास की कई योजनाएं सरकार चला भी रही है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार धार्मिक पर्यटन पर बहुत जोर दे रही है।
यदि फरवरी-मार्च में चुनाव हो जाते हैं तो इसका सकारात्मक प्रभाव वोटरों पर पड़ता। उस समय अयोध्या के साथ मथुरा और काशी की बात तेजी से उठ रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पहुंचे थे। वो पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने जन्मभूमि जाकर भगवान के दर्शन किए। यही वो समय था, जब काशी में ज्ञानव्यापी को लेकर भी कोर्ट में केस गर्माया हुआ था। तीनों मंदिरों को लेकर एक ज्वार देश में आया हुआ था।
फरवरी-मार्च में लोकसभा चुनाव का लाभ सर्वाधिक उत्तर प्रदेश में मिलता, जहां अभी भाजपा की पिछले तीन चुनावों में सबसे बुरी तरह हार हुई है। वो 33 सीटों पर सिमट कर रह गई है। यदि राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के ठीक बाद चुनाव और अब चुनाव का आकलन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि तब भाजपा वर्ष 2014 वाला करिश्मा दोहरा सकती थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोगों के जहन से राम मंदिर का मुद्दा ओझल होता चला गया। इंडी गठबंधन को न केवल तैयारियों के लिए अतिरिक्त समय मिला, बल्कि आरक्षण, संविधान जैसे मुद्दों पर उसने वोटरों का रुख अपनी ओर भी कर लिया।
हालांकि, समय से पूर्व लोकसभा चुनाव न कराने के पीछे नरेंद्र मोदी के आगे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण भी रहा होगा। वर्ष 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी ने दिसंबर 2003 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनावों में जीत से उत्साहित होकर समय से पूर्व लोकसभा चुनाव कराने का जोखिम लिया था। तब पार्टी को शाइनिंग इंडिया कैंपन पर बहुत अधिक भरोसा था। आज की तरह उस समय भी भाजपा अति आत्मविश्वास से लबरेज थी।
तब अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 1999 के चुनाव वाला करिश्मा नहीं दोहरा पाए थे और पार्टी सत्ता से बाहर हो गई थी। फिर अगले एक दशक तक भाजपा सत्ता में लौट नहीं सकी। वर्ष 2004 में तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने समय से पहले लोकसभा चुनाव कराने को पार्टी हित में बताया था। वर्ष 2004 की हार से अटल बिहारी वाजपेयी उभर नहीं सके थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात पर अब मंथन कर रहे होंगे कि यदि लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया फरवरी-मार्च में संपन्न कर ली जाती है तो पार्टी अच्छी स्थिति में रहती और तीसरी बार बहुमत के साथ वो सत्ता में वापसी करते। उन्हें गठबंधन के साथियों पर निर्भर नहीं होना पड़ता। जिन बड़े फैसलों की चर्चा वो चुनाव के दौरान कर रहे थे, उन्हें वो खुलकर लागू करा पाते। अब उन्हें हर फैसले को लेकर सहयोगी दलों पर आश्रित होना पड़ेगा।
समय से पूर्व लोकसभा चुनाव न कराने की गलती भाजपा को बहुत भारी पड़ी है। यहां तक वो अयोध्या की सीट तक हार गई, जिसका मनोवैज्ञानिक दबाव निश्चित रूप से पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर पड़ रहा है।
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