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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मैमी- एक साहित्यिक एवं फिल्मी मिथक
सार
फिल्म ‘गॉन विथ द विन्ड’ देखी है, तो सहायक अभिनेत्री मैमी (हेट्टी मैक्डैनियल) को भूल नहीं सकते हैं। यह पहली अश्वेत अभिनेत्री है, जिसे सर्वोत्तम सहायक अभिनेत्री का ऑस्कर पुरस्कार मिला।
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सिनेमा की दुनिया
- फोटो : Freepik.com
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विस्तार
जिन्हें कमतर मानते हैं, उनकी संवेदना के प्रति हम भोथरे होते हैं। उन्हें भी दु:ख-दर्द व्यापता है, यह हमारे दिमाग में कदाचित आता है। एक समय था, श्वेत सोचते थे, अश्वेत की आत्मा नहीं होती है, अत: ये मनुष्य नहीं होते हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार करने में कोई हानि नहीं है। उन्हें कोई तकलीफ, कोई अनुभूति नहीं होती है।
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आपने प्रसिद्ध फिल्म ‘गॉन विथ द विन्ड’ देखी है, तो सहायक अभिनेत्री मैमी (हेट्टी मैक्डैनियल) को भूल नहीं सकते हैं। यह पहली अश्वेत अभिनेत्री है, जिसे सर्वोत्तम सहायक अभिनेत्री का ऑस्कर पुरस्कार मिला। मगर हेट्टी की खूब आलोचना भी हुई थी, कुछ लोगों का विचार था, उसे यह भूमिका नहीं करनी चाहिए थी और उसे इस भूमिका का प्रतिरोध करना चाहिए था।
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जब उसे पुरस्कार मिला, तब भी कुछ लोगों ने कहा, उसे यह पुरस्कार स्वीकार नहीं करना चाहिए था। कहा जाता है, इन आक्षेपों के उत्तर में हेट्टी मैक्डैनियल ने कहा, वह क्यों न करे ऐसी भूमिका? वह क्यों कोई शिकायत करे, जब उसे इस काम के लिए प्रति सप्ताह 7,000 डॉलर मिल रहे थे।
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असल जीवन में उसे घरेलू नौकरानी का काम करते हुए 7 डॉलर प्रति सप्ताह से अधिक नहीं मिलता। यहां उसे अपनी अभिनय प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा था, तो क्यों न वह यह काम करती। यह है, एक जमीनी हकीकत। एक दास को फिल्म में काम करने के अधिक पैसे मिलते हैं, बनिस्बत घरेलू कार्य के।
फिल्म ‘गॉन विथ द विन्ड’
इस फिल्म और मार्गरेट मिशल के उपन्यास (जिस पर यह फिल्म आधारित है) में दास स्वतंत्रता के बाद भी स्वामीभक्त हैं, वे मालिकों को छोड़ कर जाने की बात नहीं सोचते हैं। अमेरिकन दास स्वामीभक्त होते थे, इसका उदाहरण है, मैमी। मैमी स्कारलेट की चिंता करती है, अपनी या अपने लोगों की चिंता नहीं करती है। वह कभी तारा (ओ’हारा इस्टेट) छोड़ कर स्वतंत्र रहने की बात नहीं सोचती है।
वह स्वप्न में भी तारा से दूर अपने जीवन की कल्पना नहीं करती है। ओ’हारा की पारिवारिक नौकरानी होने के अलावा उसका कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं है। दास स्वतंत्रता से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। इसके साथ ही पूरी किताब या फिल्म में उसका कोई नाम नहीं है, बस वह मात्र ‘मैमी’ है।
अमेरिकी समाज में मैमी का खास स्थान था। अमेरिका में अश्वेत लोगों का समाज में दो स्तर था। फील्ड वर्कर तथा हाउस वर्कर। फील्ड वर्कर का स्तर हाउस वर्कर से नीचा था। मैमी हाउस वर्कर हुआ करती थी, परिवार का हिस्सा, उस पर फील्ड वर्कर जैसा अत्याचार नहीं होता था, उसे फील्ड वर्कर के मुकाबले अच्छा खाना-कपड़ा मिलता था, रहने को अच्छा स्थान मिलता था।
‘गॉन विद द विन्ड’ की मैमी नायिका स्कारलेट को डांट-फटकार सकती थी। पूरी फिल्म में कदाचित वह सबसे समझदार और संवेदनशील व्यक्ति है। लोग भूल जाते हैं, यह एक ऐतिहासिक फिल्म है। जिस काल को दिखा रही है, उस काल में ऐसा ही था, हालांकि कानूनन इस दास प्रथा पर रोक लग चुकी थी। ऐतिहासिक सच्चाइयों को बदला नहीं जा सकता है।
दक्षिण अमेरिका के अधिकांश श्वेत दास प्रथा के साथ ही जी रहे थे, उन्हें इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती थी। भला अपनी करअनी में बुराई कैसे नजर आए?
साथ ही किताब-फिल्म रिकंस्ट्रक्शन काल में भी अश्वेतों को कम बुद्धि वाला दिखाती है। स्वतंत्रता मिलने पर भी उनका व्यवहार संयत नहीं है। नस्लवाद की बात करें, तो स्कारलेट से एक यांकी औरत पूछती है, अपने बच्चे केलिए वह किसको नर्स रखे? स्कारलेट अश्वेत नैनी रखने की सलाह देती है, जो उस स्त्री को पसंद नहीं आती है, वह श्वेत स्त्री को नर्स रखना चाहती है, स्कारलेट का अपना अनुभव है।
असल में यहां मार्गरेट मिशेल का अपना अनुभव, अपना विचार बोल रहा है। वे अफ्रो-अमेरिकन और आइरिश-अमेरिकन को एक तुला पर रखती हैं। दास शारीरिक तथा आध्यात्मिक रूप से सबल हैं। उस समय की यह भी एक सच्चाई थी, दास अपने जातीय अनुभव के कारण जरूरत पड़ने पर झूठ बोलने में तनिक भी झिझकते नहीं थे। उनके बच्चे जिंदा रहने का यह पैंतरा जानते थे।
फिल्म में इसे छोटी बच्ची प्रिस्सी (बटरफ्लाई मैक्क्वीन) बखूबी अभिनीत करती है। पहले वह बड़े विश्वास के साथ कहती है, उसे प्रसव कराना आता है, बाद में मुकर जाती है और कहती है, मुझे बच्चा पैदा करने के बारे में कुछ नहीं मालूम है (आई डोन्ट नो नथिंग अबाउट बर्थिंग बेबीज)।
स्कारलेट ओ’हारा परिवार दासों का मालिक था, लेकिन किताब-फिल्म दासप्रथा को महिमामयी दृष्टि से प्रस्तुत करती है, दास प्रथा को कहीं भी गलत नहीं बताती है। न ही कहीं इसमें अश्वेतों पर होने वाले किसी अत्याचार का चित्रण हुआ है।
मैमी का मतलब था मध्य वय की अश्वेत, मजबूत, मेहनती, स्वामीभक्त स्त्री। मगर एक सच्चाई और है। यह हमें दास नरेटिव में देखने को मिलती है। यहां हमें दास प्रथा के भयंकर अत्याचारपूर्ण रूप के दर्शन होते हैं। सच्चाई जानने केलिए हैरिएट जैकब का ‘इंसिडेंट्स इन द लाइफ ऑफ ए स्लेव गर्ल’ पढ़ा जा सकता है। या फिर ‘नरेटिव ऑफ द लाइफ ऑफ फ्रेडरिक डगलस’ को देख सकते हैं। इन्हें पढ़ने से स्त्री नौकरानी पर होने वाले यौन शोषण को जाना जा सकता है।
देखिए, इस कारण ये दास स्त्रियां किस कदर दहशत में रहती थीं। हैरिएट जैकब के यहां दास स्त्री अपनी जान जोखिम में डाल कर भी इस अपमानजनक, आतंकित स्थिति से निकल भागना चाहती है।
ऐतिहासिक साक्ष्य, खासकर साहित्यिक साक्ष्य दिखाते हैं, दास जीवन बड़ा सुखी था। बड़े-से मेन्सन में रहना-खाना, जिसके चारो ओर कई एकड़ की भूमि है, घर में दर्जनों एफ्रो-अमेरिकन नौक-चाकर। मैमी का मुख्य काम घर की मालकिन एवं बच्चों की देखभाल करना है। उनके छोटे-बड़े काम करना है। लेकिन यह वास्तविकता नहीं थी असलियत में अधिकांश श्वेत दास मालिक के पास एकाध दास थे, जो खेती का काम करते थे, कोड़े खाते थे, उनका वही नाम होता जो मालिक रख देता। उनके बच्चे उनके नहीं होते थे। उन्हें हीनतबोध कराने वाली संज्ञा से पुकारा जाता था।
मैमी बस कथा-कहानियों में ही शोभा पाती है, जिसकी अपनी कोई इच्छा, आशा नहीं होती है, अस्मिता नहीं होती है। हां, मैमी को अक्सर एसैक्सुअल माना जाता था। कई बार उसे ऑन्ट कहा जाता था, जैसे ‘अंकल टॉम’स केबिन में उसे ‘परिवार’ माना गया है।
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