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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   France First Traditional Hindu Temple in Paris Becomes a Symbol of India-France Cultural Harmony

फ्रांस में बना पहला पारंपरिक हिंदू मंदिर: 56 साल पुराना संकल्प साकार, संस्कृति और सह-अस्तित्व का अनूठा संगम

Tue, 25 Aug 2026 12:55 PM IST
शिवम गर्ग डॉ. ज्ञानानंददास स्वामी
डॉ. ज्ञानानंददास स्वामी Published by: शिवम गर्ग Updated Tue, 25 Aug 2026 12:55 PM IST
सार

कला, सौंदर्य और संस्कृति के लिए विश्वविख्यात पेरिस के बुसी-सेंट-जॉर्जेस में बना फ्रांस का पहला परंपरागत हिन्दू मंदिर केवल भारतीय स्थापत्य का अद्भुत नमूना नहीं है; यह भारत और फ्रांस की दो सुंदर सांस्कृतिक धाराओं के मिलन का जीवंत प्रतीक है।

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France First Traditional Hindu Temple in Paris Becomes a Symbol of India-France Cultural Harmony
फ्रांस का पहला पारंपरिक हिंदू मंदिर - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

7 जुलाई, 1970 का वह दिन था। लंदन से मुंबई की ओर जा रहा एक विमान कुछ समय के लिए पेरिस के ओरली एयरपोर्ट पर रुका। यात्रियों के लिए यह शायद यात्रा का एक सामान्य पड़ाव था। परंतु उस समय किसी को क्या पता था कि इसी छोटे-से ठहराव में इतिहास का एक अदृश्य बीज बोया जा रहा है।

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उस विमान में विराजमान थे स्वामी योगीजी महाराज, जो अभी लंदन में हिन्दू मंदिर की प्रतिष्ठा कर भारत जा रहे थे। तभी इस दूरदर्शी गुरु ने अपने दो शिष्यों, प्रमुख स्वामी महाराज और महंत स्वामी महाराज से विमान से नीचे उतरने का आग्रह किया। इस तरह पहली बार दो स्वामिनारायणीय परंपरा के संत हाथों में स्वामिनारायण भगवान की चल मूर्ति लेकर फ्रांस की धरती पर उतरे। दोनों शिष्य गुरु की आज्ञा के अनुसार नीचे गए, ठहरकर प्रार्थना की और वापस विमान में आए।
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अब गुरु योगीजी महाराज ने अपना संकल्प व्यक्त किया, “एक दिन पेरिस में एक सुंदर मंदिर बनेगा।” उस क्षण न कोई मंदिर की भूमि थी, न निर्माण की योजना, न शिल्पकारों का समूह और न ही कोई स्थापत्य का नक्शा। था तो केवल एक संत का दिव्य संकल्प और भगवान पर अटूट विश्वास। समय बीतता गया। वर्ष दशकों में बदल गए। लेकिन आज, वह दिव्य संकल्प काल के आवरण को चीरकर फ्रांस की धरती पर अमिट शिलालेख बनकर तैयार खड़ा है। 

इस  पारंपरिक पाषाण निर्मित मंदिर की विशेषता यह है कि यह उपासना स्थल होने के साथ साथ भारतीय संस्कृति, कला, शिक्षा और संवाद का समग्र केंद्र है। पेरिस के पूर्वी उपनगर बुसी-सेंट-जॉर्जेस में Allée Madame de Montespan, 77600 Bussy-Saint-Georges, France में स्थित लगभग 5,000 वर्गमीटर के फैले इस परिसर में दो प्रमुख आयाम हैं: ऊपरी तल पर पारंपरिक मंदिर और उसके आधार में हवेली के रूप में सांस्कृतिक केंद्र।



5 शिखर, 10 विशाल गुंबद, 20 बारीक कारीगरी से युक्त महाकाय स्तंभ, 120 गवाक्ष, 49 चरित्र शिल्प पैनल, और 4 सुसज्जित छतरियाँ मंदिर की पारंपरिक भारतीय स्थापत्य पहचान को उजागर करते हैं। इसके अतिरिक्त गर्भगृह, प्रार्थना मंडप और सभामंडप इसकी गहरी अध्यात्म दृष्टि को उजागर करते हैं ।

उल्लेखनीय है कि ग्रीस, भारत, इटली और वियतनाम से प्राप्त विभिन्न प्रकार के संगमरमर तथा भारत के ग्वालियर के बलुआ पत्थर का उपयोग इस निर्माण को एक वैश्विक सहयोग का स्वरूप देता है। भारत में कुशल शिल्पकारों ने अपने हाथों से इन पाषाण खण्डों को तराशकर उसमें हिन्दू शास्त्रीय शिल्पों का टंकण किया है। और ये तराशे गए पत्थर हमारी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति को फ्रांस में लेकर आए जिन्हें आधुनिक फ्रांसीसी इंजीनियरिंग के साथ संयोजित किया गया। 

प्राचीन मारू गुर्जर शैली में बनी विशाल हवेली में सभागृह, कक्षाएँ, प्रदर्शनी स्थल, खेलकक्ष, कार्यालय और बहुउद्देशीय सुविधाएँ हैं। इस प्रकार यह पूरा परिसर एक साथ  देवदर्शन, ज्ञान का केंद्र, संस्कृति का संग्रहालय और मानव-मिलन का स्थल बना है।

वस्तुत: यह परिसर Esplanade des Religions et des Cultures क्षेत्र में है, जहाँ विभिन्न धार्मिक परंपराओं के उपासना-स्थलों का साथ-साथ होना स्वयं परस्पर सम्मान और सह-अस्तित्व का सुंदर संदेश देता है।  आगामी 2 से 14 सितंबर तक आयोजित होने वाला ‘फेस्टिवल ऑफ़ कल्चर’ इसी व्यापक दृष्टि का उत्सव होगा। वैदिक महायज्ञ, पालखी यात्रा, सीन नदी पर जल यात्रा, पेरिस के प्रसिद्ध सीमाचिह्नों के निकट से गुजरने वाली नगरयात्रा और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम, ये सभी केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृतियों के मिलन के अवसर होंगे। 6 सितंबर को महंत स्वामी महाराज द्वारा मूर्तिप्रतिष्ठा और लोकार्पण विधि इस ऐतिहासिक यात्रा का एक चरम क्षण बनेगी, जिसमें विश्व के विभिन्न महाद्वीपों से श्रद्धालुओं की उपस्थिति इस मंदिर के वैश्विक स्वरूप को और सशक्त करेगी।




आज जब दुनिया अनेक प्रकार की सीमाओं, संघर्षों और सांस्कृतिक असहिष्णुताओं से जूझ रही है, फ्रांस की धरती पर एक ऐसा सांस्कृतिक सीमाचिह्न आकार ले चुका है, जो दो महान सभ्यताओं; भारत और फ्रांस, के एकता का सजीव प्रतीक बनेगा। इस नवनिर्मित मंदिर के उत्तुंग शिखर से निकलता  “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का शाश्वत संदेश का और फ्रांस के एफिल टावर से निकलता Fraternité (बंधुता) का संदेश, मानों आज एक होकर मंगलमय विश्व की प्रेरणा दे रहे  हैं।  

इस मंदिर के निर्माता महंत स्वामी महाराज भी कहते हैं, “यह मंदिर किसी एक समुदाय की पहचान को स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि विविध पहचान के लोगों को परस्पर निकट लाने के लिए बना है। इस मंदिर का निर्माण अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण संदेश है: हमारे अलग-अलग मार्ग हो सकते हैं, लेकिन सम्मान और सह-अस्तित्व की भूमि एक हो सकती है।” इस मंदिर के निर्माण में संतों और स्वयंसेवकों का समर्पण अविस्मरणीय है।



जी हाँ, किसी ने पत्थर तराशे, किसी ने व्यवस्था सँभाली, किसी ने भोजन बनाया, पर सबने मिलकर अपने हृदय का एक अंश इस मंदिर में रख दिया। पेरिस में बना यह मंदिर केवल भारत की पहचान नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है कि जब संस्कृतियाँ एक-दूसरे का सम्मान करती हैं, तब सीमाएँ मिटती हैं और मानवता का एक नया मंदिर निर्मित होता है।

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