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ममता के गढ़ में अमित शाह का मिशन-23, क्या बंगाल में चुनावी जंग बन गई है नाक का सवाल?

Thu, 25 Apr 2019 01:05 PM IST
Nawal Kishor Kumar नवल किशोर कुमार
Updated Thu, 25 Apr 2019 01:05 PM IST
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lok sabha chunav 2019 west bengal election Mamata vs bjp pm modi and amit shah mission 23
भाजपा की बंगाल जीत की राह में क्यों सबसे बड़ी चुनौती बन गईं हैं ममता? - फोटो : अमर उजाला

नंदीग्राम मामले के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में वामपंथियों को शिकस्त देकर सत्ता पर काबिज हुई ममता बनर्जी भाजपा के भारत विजय अभियान में सबसे बड़ी बाधक बनकर खड़ी हुई हैं। इस बार अमित शाह ने मिशन-23 की बात कही है, यानी पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 23 सीटों पर जीत का टारगेट दिया गया है, वहीं ममता बनर्जी की चुनौती इस बार यह है कि उन्हें न केवल अपनी 34 सीटों पर कब्जा बरकरार रखना है बल्कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की बन रही पैठ की सभी संभावनाओं को खत्म करना है।

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उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड फतह के बाद पश्चिम बंगाल ही वह राज्य है जहां भाजपा को अबतक अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। पिछली बार यानी 2014 में मोदी लहर के बावजूद भाजपा केवल 2 सीटों पर जीत सकी। इनमें से एक आसनसोल से बाबुल सुप्रियो और दूसरे दार्जिलिंग सीट से एसएस अहलूवालिया रहे। 

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बंगाल में 2014 में हार के बाद बीजेपी का मनोबल बढ़ा है। - फोटो : अमर उजाला

मोदी-शाह की राह में क्यों चुनौती है ममता?  

पिछली बार जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल में पैर जमाने की कोशिश की तब इसकी दो वजहें रहीं। पहली वजह यह कि ममता के कारण वामपंथी दलों के पैर उखड़ रहे थे और कांग्रेस भी अपना जनाधार खोती जा रही थी। भाजपा की नजर वामपंथी और कांग्रेस के समर्थकों पर थीं। सबकुछ ठीक चल रहा था। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में ताबड़तोड़ 25 चुनावी रैलियां की। लेकिन बीच में आईं ममता बनर्जी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस 39.05 प्रतिशत वोट मिले और वह सबसे बड़ी पार्टी बनी। यही नहीं टीएमसी का वोटिंग प्रतिशत बढ़ा और +8.13 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सीटों की संख्या 2009 में 19 थी जो 2014 में बढ़कर 34 हो गई। दूसरे स्थान पर तब सीपीआई व अन्य वामपंथी पार्टियां रहीं। हालांकि उन्हें 2 सीटें मिलीं,  लेकिन मतों में उनकी हिस्सेदारी 29.71 प्रतिशत थी। इससे पहले 2009 में वामपंथी दलों के पास 15 सीटें थीं।

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ममता का किला भेदना बीजेपी की सबसे बड़ी विजय होगी। - फोटो : अमर उजाला

2014 में हार के बावजूद भाजपा का हौसला बढ़ा
भाजपा को उम्मीद थी कि वह कम से कम दहाई का आंकड़ा जरूर पार करेगी, लेकिन उसे केवल दो सीटें मिलीं। लेकिन भाजपा के लिए यह प्रस्थान बिंदु साबित हुआ। उसने पश्चिम बंगाल की सभी 42 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और कुल मतों में 17.02 प्रतिशत वोट हासिल किए। भाजपा के मनोबल के बढ़ने की एक वजह यह भी रही कि उसने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया। हालांकि कांग्रेस 4 सीटें जीतने में तब कामयाब रही, लेकिन कुल वोटों में उसकी हिस्सेदारी में -3.85% की कमी आई और यह घटकर केवल 9.58 प्रतिशत रह गई।

शाह के मिशन-23 के सामने ममता की चुनौतियां 
2014 में ममता बनर्जी से पहली भिड़ंत में सम्मानजनक पराजय के बाद नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने पश्चिम बंगाल को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाए रखा। फिर चाहे वह चिटफंट घोटाले को लेकर ममता बनर्जी सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति हो या फिर हिंदुत्व के एजेंडे को फैलाने की। बांग्लादेशी मुसलमानों को लेकर भाजपा ने एक के बाद एक ममता बनर्जी पर कई हमले किए। लेकिन ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार से 36 का रिश्ता न सिर्फ बनाया बल्कि पूरी ताकत के साथ उसे निभाया भी है। उन्होंने खुद को नरेंद्र मोदी-अमित शाह के समक्ष सबसे मजबूत नेता के रूप में खुद को साबित किया। 

दूसरी ओर भाजपा की परेशानियां घटने के बजाय कम नहीं हुईं हैं। तृणमूल कांग्रेस से कभी सांसद रहे मुकुल रॉय चिटफंट घोटाले में फंसने के बाद भाजपा में चले गए और इन दिनों पश्चिम बंगाल की कमान अप्रत्यक्ष रूप से उनके हाथों में है। उनकी विश्वसनीयता बंगाल की जनता में संदिग्ध है। भाजपा की दूसरी सबसे बड़ी परेशानी योग्य उम्मीदवारों का अभाव है। यही वजह है कि भाजपा को उम्मीदवार उधार में दूसरे दलों से लेने पड़े हैं। यह नरेटिव भी बंगाल में भाजपा के मिशन-23 में रोड़ा बन सकती है।

भाजपा के प्रहार और टीएमसी 
भाजपा ने ममता बनर्जी को हराने के लिए राष्ट्रवाद को हथियार बनाया है। पार्टी के तमाम नेता इसके साथ नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और एनआरसी का मुद्दा भी उठा रहे हैं। उनकी निगाहें देश के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आकर सीमावर्ती इलाकों में बसने वाले हिंदुओं पर हैं।  

बहरहाल, तमाम कवायदों के बावजूद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने 41प्रतिशत टिकट महिलाओं को देकर देश के सभी राजनीतिक दलों के समक्ष एक नजीर पेश की है। हालांकि पश्चिम बंगाल में भाजपा के बढ़ते प्रभाव से वह नावाकिफ तो बिल्कुल भी नहीं हैं। लिहाजा यह लोकसभा चुनाव उनके लिए खास बन गया है। जीत मिली तो इस बार कब्जा न केवल बंगाल पर बरकरार रहेगा बल्कि दिल्ली की गद्दी पर भी दावेदारी बढ़ेगी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिच९य और फोटो भी संलग्न करें.
 

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