लिफ्ट में दर्ज है शोषण की ये कहानियां, कहीं आपकी बिल्डिंग में तो नहीं हो रहा ऐसा
क्या अखबार बांटने वाले, दूधवाला, घर में झाड़ू-पोंछा लगाने और बर्तन मांजने वाली महिलाएं समाज का हिस्से नहीं हैं? यदि ये आपके रोजमर्रा के काम में मदद करते हैं तो फिर इन्हें ऊंची इमारतों में बनी लिफ्ट का उपयोग करने से क्यों रोका जाता है? छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों को अपने जैसी सहूलियतों का इस्तेमाल न करने देने की मानसिकता हिंदुस्तान के मध्यवर्ग की नई पहचान है। शहर की बहुमंजिला इमारतों में लिफ्ट के दरवाजे पर आमतौर पर यह पाबंदी दीवार पर लिखी रहती है। यह चेतावनी इमारत की सोसाइटी जारी करती है।
क्या होता है बिल्डिंगों में सोसायटी के नाम पर
इमारत में रहने वाले फ्लैट मालिक सोसाइटी बना लेते हैं और रहवासियों के लिए कायदे-कानून तय करते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इस तरह की पाबंदियां लगाकर वे लोगों के मौलिक अधिकार को बाधित करते हैं। फ्लैट्स में रहने वाले ये लोग उच्च शिक्षित हैं, बड़े-बड़े ओहदों पर सरकारी और प्राइवेट नौकरियां करते हैं, लेकिन मशीन और तकनीक को सर्व समाज के लिए उपयोग करने नहीं देना चाहते। ये लोग दुनिया के बहुत बड़े हिस्से को तकनीकी तरक्की और मशीनों से होने वाले फायदे को नहीं बांटना चाहते और इस तरह से ये लोग दुनिया में गैर बराबरी कायम रखने वाली फौज का हिस्सा बन जाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि मशीन का अविष्कार करने वालों ने कभी यह नहीं कहा कि उनकी मशीन का इस्तेमाल कोई खास व्यक्ति करे और अमुक व्यक्ति न करे। यदि भाप के इंजन का अविष्कार करने वाले जेम्स वाट अपनी वसीयत में यह कह गए होते कि भाप की ताकत से बनने वाली मशीनों का उपयोग मैं और मेरा परिवार ही करेगा तो आज दुनिया भर में उद्योग धंधे भी पनप नहीं पाते और मनुष्य आदिम सभ्यता में ही जी रहा होता।
किसका अधिकार और किसकी दुनिया
इसी तरह से बिजली, वाहन, रेल और हवाई-जहाज बनाने वाले इसके उपयोग को लेकर कोई पाबंदी लगा गए होते तो आज साइंस ने इतनी तरक्की ही नहीं की होती। छोटे-मोटे काम करने वालों को लिफ्ट में सवार होने से रोकने के हिमायती तकनीकी युग के नवसामंत हैं जो सिर्फ अपने लिए सुविधा-सहूलियत चाहते हैं। यह ऊंची जाति वाले लोगों की उसी मानसिकता का विस्तार है जिसमें गांवों में दलित वर्ग के लोगों को नए कपड़े पहन कर या नए वाहन पर सवार होकर अपने सामने से गुजरने नहीं देता। इस नवसामंतवादी वर्ग को यह डर बना रहता है कि उनके साधन, उनकी संपन्नता इस तरह अऩ्य लोगों के साथ बंट न जाए, इसलिए वे छोटे-मोटे काम करने वालों पर इस तरह की पाबंदिया आयद करते हैं और उसकी स्वीकार्यता बनाकर उसे चलन में ला देते हैं।
आरक्षण का लाभ दलित-आदिवासियों को न लेने देने की मानसिकता भी यही वर्ग रखता है। यही वर्ग है जो दलित-आदिवासियों को उत्पीड़न से बचाने के लिए बने कानून को कमजोर करना चाहता है। लेकिन अब छोटे-मोटे काम करने वालो, दलितों और आदिवासियों में यह चेतना घर करने लगी है कि उन्हें उनके अधिकारों से महरूम नहीं किया जा सकता।
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