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जीवन धारा: सच्चा साधक कभी हार नहीं मानता, कमियों को स्वीकार करना ही सुधार की प्रथम सीढ़ी
Thu, 12 Feb 2026 06:30 AM IST
देवेश त्रिपाठी
जेम्स ऐलन
जेम्स ऐलन
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Thu, 12 Feb 2026 06:30 AM IST
सार
कई बार ऐसा लगता है कि हमारे प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं। कभी अधीरता हमें विचलित कर देती है, तो कभी सब कुछ बिखरता हुआ प्रतीत होता है। पर सच्चा साधक जानता है कि हर विफलता प्रगति की एक मजबूत सीढ़ी होती है।
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जीवन धारा
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
महान कलाकार माइकल एंजेलो के विषय में कहा जाता है कि उन्हें पत्थर की हर अनगढ़ और खुरदरी शिला में भी एक दिव्य प्रतिमा के सजीव दर्शन होते थे। वह मानते थे कि सुंदर स्वरूप पहले से ही पत्थर के भीतर विद्यमान है, कलाकार का कार्य केवल इतना है कि वह अपनी साधना, कुशलता और धैर्य से अनावश्यक अंशों को हटाकर उस छिपी हुई सुंदरता को संसार के सामने प्रकट कर दे। ठीक इसी प्रकार, प्रत्येक मनुष्य के अंतरतम में भी एक अलौकिक मूर्ति विराजमान है। वह पूर्ण है, प्रकाशमय है, किंतु उसे प्रकट करने के लिए अटूट विश्वास, असीम धैर्य और निरंतर आत्मसाधना की आवश्यकता होती है। दोष, दुर्बलता, स्वार्थ-ये सब उसी पत्थर के अनावश्यक टुकड़े हैं, जिन्हें तराशना अनिवार्य है। जब इन्सान के भीतर का प्रेम निष्कलंक, निर्मल तथा निःस्वार्थ हो जाता है, तभी उस दिव्य स्वरूप की झलक मिलती है। मानव हृदय अनेक विकारों, वासनाओं और सांसारिक मोहमाया से घिरा रहता है, परंतु उसमें ईश्वर का अमर प्रेम शाश्वत रूप से निवास करता है। इसका अनुभव करने तथा उसे जीवन में उतारने के लिए मनुष्य को अपने मन व बुद्धि पर नियंत्रण स्थापित करना जरूरी है। हालांकि, यह आसान काम नहीं है। इसके लिए भीतर के अंधकार को पहचानकर उसे पूरी तरह से हटाना पड़ता है। जो साधक इस ईश्वरीय प्रेम को पाने का निश्चय करता है, उसे कठिन परीक्षाओं से गुजरना ही पड़ता है। ये परीक्षाएं बाधा नहीं, बल्कि पात्रता की कसौटी होती हैं। इनके बिना वह धैर्य, परिपक्वता व विवेक विकसित नहीं होता, जो दिव्यता के उदय के लिए जरूरी है।
कई बार हमें ऐसा लगता है कि हमारे प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं। कभी अधीरता हमें विचलित कर देती है, तो कभी लक्ष्य समीप प्रतीत होते ही सब कुछ बिखरता हुआ प्रतीत होने लगता है। लेकिन सच्चा साधक हार नहीं मानता। वह जानता है कि हर विफलता केवल बाहरी रूप से ही होती है, जो वास्तव में प्रगति की एक मजबूत सीढ़ी है। अपनी कमियों को स्वीकार करना ही सुधार की प्रथम सीढ़ी है। आत्मनिरीक्षण के माध्यम से हम पहचान पाते हैं कि किन दोषों को त्यागकर हमें अपने भीतर की दिव्यता के और निकट पहुंचना है। जैसे-जैसे स्वार्थ का अंधकार कम होता है, वैसे-वैसे निःस्वार्थ प्रेम का प्रकाश अपने आप फैलने लगता है। जब आप अनुभव करें कि आपके भीतर धैर्य गहरा हो रहा है, शांति स्थिर हो रही है, चिड़चिड़ापन और कटुता का अंत हो रहा है, तथा पूर्वाग्रह और अनियंत्रित इच्छाएं धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं, तब समझिए कि आपकी साधना एक सही दिशा में अग्रसर है। अंततः यही आत्मसाधना मनुष्य को तुच्छ सीमाओं से उठाकर पूर्णता के शिखर तक पहुंचाती है। तब वह स्वयं उस दिव्य प्रतिमा के समान तेजस्वी, संतुलित और प्रकाशमान हो उठता है, जिसे वह जीवनभर तराशता रहा था।
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कई बार हमें ऐसा लगता है कि हमारे प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं। कभी अधीरता हमें विचलित कर देती है, तो कभी लक्ष्य समीप प्रतीत होते ही सब कुछ बिखरता हुआ प्रतीत होने लगता है। लेकिन सच्चा साधक हार नहीं मानता। वह जानता है कि हर विफलता केवल बाहरी रूप से ही होती है, जो वास्तव में प्रगति की एक मजबूत सीढ़ी है। अपनी कमियों को स्वीकार करना ही सुधार की प्रथम सीढ़ी है। आत्मनिरीक्षण के माध्यम से हम पहचान पाते हैं कि किन दोषों को त्यागकर हमें अपने भीतर की दिव्यता के और निकट पहुंचना है। जैसे-जैसे स्वार्थ का अंधकार कम होता है, वैसे-वैसे निःस्वार्थ प्रेम का प्रकाश अपने आप फैलने लगता है। जब आप अनुभव करें कि आपके भीतर धैर्य गहरा हो रहा है, शांति स्थिर हो रही है, चिड़चिड़ापन और कटुता का अंत हो रहा है, तथा पूर्वाग्रह और अनियंत्रित इच्छाएं धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं, तब समझिए कि आपकी साधना एक सही दिशा में अग्रसर है। अंततः यही आत्मसाधना मनुष्य को तुच्छ सीमाओं से उठाकर पूर्णता के शिखर तक पहुंचाती है। तब वह स्वयं उस दिव्य प्रतिमा के समान तेजस्वी, संतुलित और प्रकाशमान हो उठता है, जिसे वह जीवनभर तराशता रहा था।
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