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हिमालय दिवस विशेष: इंसानी बोझ तले एवरेस्ट, मूत्र भी पिघला रहा ग्लेशियर
सार
नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में पहली बार एवरेस्ट बेस कैंप के अस्थायी शहर में मानवीय आवाजाही, जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और मानव अपशिष्ट से उत्सर्जित ऊष्मा के खुम्बू ग्लेशियर पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभावों का सूक्ष्म वैज्ञानिक आकलन किया गया है।
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कैसे इंसान के पेशाब से पिघल रहा ग्लेशियर? हर वर्ष हजारों टन बर्फ बन रहा पानी
- फोटो : Amar Ujala AI
विस्तार
‘दुनिया की छत’ कहे जाने वाले एवरेस्ट पर्वत पर पर्वतारोहियों के अनियंत्रित जमावड़े को लेकर खतरे की घंटियां तो बजती ही रही हैं, लेकिन हाल ही में सामने आए एक नए अध्ययन ने इस इंसानी दबाव की चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। जिसमें कहा गया है कि एवरेस्ट बेस कैंप में हर रोज छह हजार लीटर से अधिक मानव मूत्र निकल रहा है।
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वैज्ञानिकों का आकलन है कि केवल इसकी शारीरिक ऊष्मा ही एक पर्वतारोहण सीजन में करीब 154 टन बर्फ पिघलाने जितनी ऊर्जा ग्लेशियर में झोंक देती है। इससे भी बड़ा संकट उस जीवाश्म ईंधन से निकलने वाली गर्मी का है, जो ग्लेशियर पर आबाद हजारों लोगों के अस्थायी शहर को रोशन और गर्म रखने में फूंका जा रहा है।
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पहली बार इंसानी ऊष्मा का वैज्ञानिक आकलन
इस नए अध्ययन ने गत 29 अगस्त को ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित होने के बाद वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि, इसका वैज्ञानिक आधार प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘रीजनल एनवायरनमेंटल चेंज’ के जुलाई अंक में प्रकाशित शोध-पत्र, “ इफेक्ट्स ऑफ ह्यूमन एक्टिविटी ऑन खुम्बू ग्लेशियर, टुवर्ड्स अ सस्टेनेबल एवरेस्ट बेस कैंप” है।
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नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में पहली बार एवरेस्ट बेस कैंप के अस्थायी शहर में मानवीय आवाजाही, जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और मानव अपशिष्ट से उत्सर्जित ऊष्मा के खुम्बू ग्लेशियर पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभावों का सूक्ष्म वैज्ञानिक आकलन किया गया है।
लगभग 5,300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एवरेस्ट बेस कैंप सामान्य शिविर नहीं रह गया है। पर्वतारोहण के मौसम में यहां पर्वतारोहियों, शेरपा गाइडों, रसोइयों और दूसरे सहयोगी कर्मचारियों की विशाल अस्थायी बस्ती खड़ी हो जाती है। अध्ययन के अनुसार 2023 के वसंत में वहां लगभग 1,600 टेंटों को चलाने के लिए 824 एलपीजी सिलेंडर, 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर पेट्रोल इस्तेमाल हुआ।
खाना पकाने से लेकर टेंट गर्म रखने और बिजली पैदा करने तक इस ईंधन से निकली ऊष्मा में करीब 2,338 टन बर्फ पिघलाने की क्षमता थी। यह निष्कर्ष और भी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि गणना में हेलीकॉप्टर संचालन, हजारों मनुष्यों के शरीर से निकलने वाली गर्मी और सामान ढोने वाले याक जैसे पशुओं से उत्पन्न ऊष्मा शामिल नहीं है।
हर दिन छह हजार लीटर से अधिक मूत्र
इस शोध का सबसे असामान्य निष्कर्ष मानव मूत्र को लेकर है। अधिक ऊंचाई पर शरीर में पानी की कमी रोकने के लिए पर्वतारोही काफी मात्रा में तरल पदार्थ लेते हैं। परिणामस्वरूप बेस कैंप में प्रतिदिन छह हजार लीटर से अधिक मूत्र निकलने का अनुमान लगाया गया है।
मल को एकत्र कर नीचे ले जाने की व्यवस्था है, लेकिन मूत्र का बड़ा हिस्सा ग्लेशियर पर ही पहुंचता है। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार मानव मूत्र से ग्लेशियर को मिलने वाली ऊष्मा एक सीजन में लगभग 154 टन बर्फ पिघलाने के बराबर हो सकती है।
यहां एक तथ्य साफ रहना चाहिए कि मानव शरीर से निकलते समय मूत्र का तापमान आसपास की हिमनदीय सतह से काफी अधिक होता है और वही ऊष्मा बर्फ को हस्तांतरित होती है। इसलिए 154 टन का आंकड़ा मापकर निकाली गई वास्तविक बर्फ की मात्रा नहीं, बल्कि ऊष्मा के आधार पर निकाली गई वैज्ञानिक गणना है।
बेस कैंप का तापमान तेजी से बढ़ा
वैज्ञानिकों ने केवल एक सीजन का नहीं बल्कि 1991 से 2023 तक के लैंडसैट उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन के अनुसार एवरेस्ट बेस कैंप की सतह का तापमान औसतन 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा, जो बेस कैंप से सटे खुम्बू ग्लेशियर की सतह पर दर्ज वृद्धि की करीब दोगुनी दर है।
इस अंतर के पीछे मानवीय गतिविधियों की भूमिका पर अध्ययन ने गंभीर सवाल खड़ा किया है। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि एवरेस्ट के ग्लेशियरों को पर्वतारोहियों का मूत्र ही पिघला रहा है। हिमालय में ग्लेशियरों के दीर्घकालीन क्षरण का सबसे बड़ा कारक तो वैश्विक जलवायु परिवर्तन ही है।
नया अध्ययन इस बड़े संकट के ऊपर पड़ रहे स्थानीय इंसानी तापीय दबाव की पहचान करता है। अर्थात पहले से गर्म होते हिमालय पर मनुष्य अपनी गतिविधियों से अतिरिक्त गर्मी जोड़ रहा है।
एवरेस्ट पर अब ‘ट्रैफिक जाम’
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार नेपाल ने इस वर्ष एवरेस्ट के लिए रिकॉर्ड 494 विदेशी पर्वतारोहियों को परमिट जारी किए। पर्वतारोहियों के साथ लगभग इतनी ही संख्या में शेरपा गाइड और फिर विशाल सहयोगी तंत्र जुड़ता है। पर्वतारोहण सीजन में एवरेस्ट पर रहने वालों की संख्या करीब तीन हजार तक पहुंच गई।
गत 20 मई को नेपाल की ओर से रिकॉर्ड 274 पर्वतारोही एक ही दिन एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे। संकरे रास्तों और फिक्स्ड रोप पर कतारों ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर बाकायदा ‘ट्रैफिक जाम’ जैसी स्थिति पैदा कर दी। 8,000 मीटर से ऊपर का क्षेत्र ‘डेथ जोन’ कहलाता है, जहां प्राकृतिक ऑक्सीजन मानव जीवन के लिए अत्यंत कम है। वहां कतार में बिताया गया अतिरिक्त समय जीवन और मृत्यु का अंतर बन सकता है।
90 टन से अधिक कचरे का पहाड़
मानवीय दबाव का दूसरा भयावह चेहरा कचरा है। सगरमाथा प्रदूषण नियंत्रण समिति के अनुसार 2026 के वसंत अभियान में एवरेस्ट क्षेत्र से 90,329 किलोग्राम कचरा हटाया गया। इसमें अकेले बेस कैंप क्षेत्र से 80,579 किलो कचरा निकला, जिसमें 34,239 किलो मानव अपशिष्ट, 21,603 किलो रसोई कचरा, 19,238 किलो मिश्रित और 5,499 किलो पुनर्चक्रण योग्य कचरा था।
बेस कैंप से ऊपर से भी 9,750 किलो कचरा तथा 1,769 मल बैग नीचे लाए गए। एवरेस्ट बेस कैंप में शौचालय से निकलने वाले मानव अपशिष्ट को प्लास्टिक बैरल में एकत्र करना अनिवार्य है और बेस कैंप से ऊपर जाने वाले प्रत्येक पर्वतारोही को कम से कम आठ किलो कचरा वापस लाना होता है।
सवाल चढ़ाई का नहीं, एवरेस्ट की सहन क्षमता का
हिमालय कोई राजनीतिक सीमा देखकर व्यवहार नहीं करता। नेपाल का खुम्बू हो या भारत के गंगोत्री-गोमुख, केदारनाथ और दूसरे ऊंचे हिमालयी क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे नाजुक भूभाग पर बढ़ती मानवीय आवाजाही, ऊर्जा खपत, कचरा और अपशिष्ट अतिरिक्त दबाव ही डालते हैं।
इस नए अध्ययन के वैज्ञानिकों ने वर्तमान एवरेस्ट बेस कैंप को लंबे समय तक ग्लेशियर के ऊपर बनाए रखने की स्थिरता पर सवाल उठाते हुए आसपास स्थिर भूमि पर दो वैकल्पिक स्थान भी चिह्नित किए हैं। अब केवल सवाल यह नहीं है कि एवरेस्ट पर कितने पर्वतारोही चढ़ सकते हैं। असली सवाल यह है कि एवरेस्ट कितने पर्वतारोहियों का बोझ सह सकता है?
हिमालय को जीतने की होड़ में उसे हार न जाएं
पर्यटन और पर्वतारोहण हिमालयी अर्थव्यवस्था तथा स्थानीय रोजगार के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन हिमालय की क्षमता अनंत नहीं है। दुनिया की सबसे दुर्गम चोटी पर जब ट्रैफिक जाम लगने लगे, एक सीजन में 90 टन से अधिक कचरा नीचे उतारना पड़े और वैज्ञानिकों को मनुष्य के मूत्र तक से ग्लेशियर को मिलने वाली ऊष्मा की गणना करनी पड़े, तो चेतावनी बिल्कुल साफ है कि हिमालय को जीतने की होड़ में कहीं हम हिमालय को ही न हार जांए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।