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पीएम का जुमला और ‘राजनीतिक फूफा बनाम सामाजिक फूफा’!
Thu, 10 Sep 2026 04:12 PM IST
अजय बोकिल
यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अजय बोकिल
Updated Thu, 10 Sep 2026 04:12 PM IST
सार
भारत में जनता अपने कई प्रिय और प्रभावशाली नेताओे को पारिवारिक रिश्तों से सम्बोधित और परखती आई है। मसलन महात्मा गांधी अगर ‘बाबा’ थे तो जवाहरलाल नेहरू बच्चों के ‘चाचा’ कहलाना पसंद करते थे।
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पीएम नरेंद्र मोदी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भारतीय राजनीति में नेताओें का लोगों से पारिवारिक रिश्ता बनाना और जनता द्वारा उन्हें किसी पसंदीदा नाते के साथ सम्बोधित करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन प्रधानंमत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में ‘नाराज फूफाजी’ के रिश्ते को जिन सियासी रिश्तों के संदर्भ में नए सिरे पारिभाषित किया है, वह सामाजिक रिश्तों की राजनीतिक ब्रांडिंग ज्यादा है।
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यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक रिश्तों और रिवाजों में ‘नाराज फूफा’ को मनाने और यथासंभव उसका मान रखने की जिम्मेदारी भी परिवारजनों की ही होती है, जबकि राजनीतिक फूफा को मनाना तो दूर, उसे गरियाते रहना ही सियासत मानी जाती है। कपड़े फाड़ते रहना ही राजनीतिक फूफा की नियति है।
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बल्कि यूं कहें कि राजनीतिक फूफा का सतत रूठे रहना ही कई बार प्रतिस्पर्धी पाटीँ की सियासी संजीवनी बन जाता है। यह तकरार दरअसल यह सियासी बनाम सामाजिक फूफा की निर्मम और असमाप्त लड़ाई है, जिसमें बेचारी जनता की भूमिका मासूम दर्शक की है और उसका काम इस फूफावाद के मजे लेते रहना है।
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भारत में जनता अपने कई प्रिय और प्रभावशाली नेताओे को पारिवारिक रिश्तों से सम्बोधित और परखती आई है। मसलन महात्मा गांधी अगर ‘बाबा’ थे तो जवाहरलाल नेहरू बच्चों के ‘चाचा’ कहलाना पसंद करते थे। आज के जमाने की बात करें तो शिवराजसिंह चौहान ‘मामा’ हैं तो सुश्री मायावती ‘बहनजी’ या फिर ‘बुआजी’ हैं।
अखिलेश यादव ‘बबुआ’ या भतीजे हैं तो ममता बैनर्जी ‘दीदी’ कहलाना पसंद करती हैं। देवेन्द्र फडणवीस ‘देवा भाऊ’ कहलाते हैं। वैसे भी अधिकांश युवा नेता उनके समर्थकों के लिए ‘भैया’ ही होते हैं, भले उनके चेले-चपाटी चापलूसी की खातिर अपने नेता को चने के झाड़ पर चढ़ाते रहें।
उसमें भी नेता अगर मंत्री वगैरह बन जाए तो उसका प्रमोशन ‘साहब’ के रूप में बिना किसी ऑफिशियल आॅर्डर के हो जाता है। बड़े नेताओे की तो लगभग सभी पत्नियां जगत ‘भाभी’ स्वयमेव बन ही जाती हैं। दरअसल यह भारतीय मानस है, जो राजनीतिक हायरआर्की में भी कोई न कोई सामाजिक रिश्ता खोज लेता है और उसे तब तक खाद-पानी देता रहता है, जब तक कि सम्बन्धित व्यक्ति की राजनीतिक या सामाजिक उपयोगिता शून्य नहीं हो जाती।
इस मायने में विपक्ष को ‘नाराज फूफा’ करार देना थोड़ा अलग इसलिए है क्योंकि भारतीय परिवारों में ‘फूफा’ का रिश्ता करीबी और महत्वपूर्ण होते हुए भी बहुत सम्मान के भाव से नहीं देखा जाता। उत्तर पश्चिमी भारत में फूफा (कहीं फुआ भी) पिता की बहन (बुआ) के पति को कहा जाता है। कुछ राज्यों में बुआ के लिए ‘फूफी’ भी प्रचलन में है।
लिहाजा ‘फूफी ‘ के पति ‘फूफा’ हुए। वैसे ही कि जैसे मामी के पति मामा या चाची के पति चाचा कहलाते हैं। वैसे ‘बुआ’ शब्द का ‘पुरूषीकरण’ न सिर्फ कठिन बल्कि असहज भी होगा। एक शब्द ‘बाउजी’ हो सकता है, लेकिन परंपरागत रूप से यह हमारे यहां पिता के लिए इस्तेमाल होता रहा है, जो अब लगभग चलन से बाहर है। ‘मम्मी-पापा’ संस्कृति ने उसे शब्दकोश से बाहर कर दिया है।
तो फिर ‘फूफा’ शब्द आया कहां से? इसके मूल में जाएं तो जानकारी मिलती है कि इसकी उत्पत्ति प्राकृत भाषा के शब्द ‘फुप्फु’ से हुई है। इसीका स्त्रीलिंगी रूप ‘फुप्फी’ है। हालांकि संस्कृत में इस रिश्ते का नाम ‘पितृस्वसृपति’ है। जो बोलने में काफी कठिन है। संस्कृत में बुआ को ‘पितृस्वसा’ कहा जाता है, ‘बुआ’ शब्द संभवत: इसी का अपभ्रंश है। ‘स्वसा’ का अर्थ बहन या भगिनी है।
हमारे लिए गर्व की बात यह है कि इतने सारे पारिवारिक रिश्ते और उनके अलग-अलग सम्बोधन और पहचान केवल भारतीय परंपरा में ही है। अन्य संस्कृतियों और सभ्यतााओे में सगे रिश्तों को छोड़ दे तो चचेरे-ममेरे या फुफेरे रिश्तों की न तो खास अहमियत है और न ही उनके अलग-अलग नामकरण हैं। वहां बाकी सब ‘इन लॉ’ होते हैं।
लेकिन ‘फूफा’ शब्द से एक करीबी रिश्ता ही प्रतिध्वनित नहीं होता, उसके साथ नाराजी और जबरिया ध्यानाकर्षण के आग्रह का भाव भी स्वत: नत्थी है। इसीलिए कुछ लोग फूफा को ‘रिटायर्ड जीजा’ भी कहते हैं। वो शख्स जो यह हकीकत स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, उसके ‘अच्छे दिन’ ( जैसे कि शादी के समय थे) अब नहीं रहे।
शादी-ब्याह जैसे बड़े पारिवारिक आयोजनो में भी उसका रूतबा पहले की माफिक नहीं रहा। कहा तो यहां तक जाता है कि मांगलिक अवसर पर भी जो मुंह फुलाकर न बैठे, वह फूफा ही क्या? हर बात में कमियां ढूंढना मानो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। फूफाओे के इस मनोविज्ञान और आख्यान को कुछ लोग ‘फूफा पुराण’ भी कहते हैं।
बहरहाल राजनीतिक फूफा की बात करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार नाराज फूफा ( उनकी अपनी पार्टी में भी कुछ नाराज फूफा हैं) का जिक्र वडोदरा में आयोजित ‘नमो फॉर विकसित भारत’ कार्यक्रम में पहली बार किया। इसके पहले वह विपक्ष पर ‘दिमागी नक्सल’ कहकर प्रहार कर चुके थे। लेकिन बाद में शायद उन्हें लगा कि नाराज और आलोचक विपक्ष के लिए कुछ ऐसा शब्द खोजा जाए, जिसका अर्थ और भाव साधारण आदमी भी बिना दिमाग पर जोर डाले समझ सके। क्योंकि दिमागी नक्सल को बूझने में तो फिर भी दिमाग खपाना पड़ता था।
वडोदरा के बाद पीएम ने दिल्ली विवि के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के आयोजन में भी ‘नाराज फूफा’ का खासतौर पर जिक्र किया। उन्होनें विपक्ष, खासकर कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि समाज में ‘कुछ’ लोग ऐसे होते हैं, जो हर नए विकास कार्य या उपलब्धि पर हमेशा असंतुष्ट रहते हैं और बिला वजह उसका विरोध करते हुए पूछते हैं कि इसकी क्या जरूरत थी?
पीएम मोदी ने वडोदरा में मालगाड़ियों (फ्रेट कॉरिडोर) और डबल-स्टैक कंटेनर के जरिए एक बार में सैकड़ों ट्रकों के बराबर माल ढोने का उदाहरण देते हुए कहा कि अब ये 'नाराज फूफाजी' चिल्लाएंगे कि जब रेल कॉरिडोर बन गया तो रोड पर चलने वाले ट्रक चालकों और मालिकों का क्या होगा? यानी किसी भी फायदे में किसी का नुकसान तो निहित है।
इससे तिलमिलाई कांग्रेस ने पलटवार किया कि मोदी सरकार अपनी नाकामियों और जनविरोधी नीतियों को छिपाने के लिए ऐसे नए-नए शब्दों और विशेषणों (जैसे 'नाराज फूफा', 'दिमागी नक्सल') का इस्तेमाल करती है।
माना यह भी जा रहा है कि प्रधानमंत्री जेन ज़ी से कनेक्ट होने के लिए लिए नए शब्द उपयोग में ला रहे हैं। फूफाओे की आम छवि एक ऐसे रिश्तेदार की है, जो हर बात में टांग अड़ाता है और स्वभाव से चिड़चिड़ा होता है। लेकिन यहां फर्क यह है कि जेन ज़ी के शब्दकोश में फूफा जैसे शब्दों की कोई जगह नहीं है। सगे रिश्तों के अलावा आम तौर पर उसके लिए सभी ‘अंकल’ ही हैं।
लिहाजा भारतीय संस्कृति के पारिवारिक रिश्तों की डिक्शनरी पर ‘अंकल-आंटी’ ही बुरी तरह से हावी हो चुके हैं। ‘अंकल’ शब्द की सुविधा यह है कि उसमें पिता के अलावा कोई भी रिश्ता खोजा या फिट किया जा सकता है। वही हाल हाल ‘आंटी’ का भी है। एकल परिवार संस्कृति का यह सबसे बड़ा नुकसान है।
खैर, प्रधानमंत्री ने अब ‘राजनीतिक फूफा बनाम पारिवारिक फूफा’ का एक नया नरेटिव उछाला है। विपक्षी दल भी खुद को राजनीतिक फूफा की श्रेणी में ही मान रहे हैं। लेकिन इसमें खतरा यह है कि अगर पारिवारिक मामलों में भी फूफा की यही परिभाषा अप्लाई की जाने लगे तो रिश्तों और रिवाजों को कायम रखने में बहुत मुश्किल होगी।
रूठे पारिवारिक फूफा को तो किसी भी तरह से मनाने की गुंजाइश रहती है। लेकिन सियासी दल तो ‘नाराज फूफा’ का किरदार तो अलग अलग समय और परिस्थिति के अनुसार निभाते रहते हैं। जहां भाजपा विपक्ष में है, क्या वो वहां ‘नाराज फूफा’ नहीं है? वैसे इस ‘फूफा समस्या’ का तोड़ यही है कि राजनीतिक रिश्तों में भी सतत संवाद की गुंजाइश बनी रहे। भावनात्मक दृष्टि से फूफाओे का जिंदा रहना लोकतंत्र में अच्छी बात नहीं है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।