जनता का कर्फ्यू: यूरोप में डॉक्टर, नर्स और हेल्थ वर्कर्स के लिए रोज़ रात में बजती है ताली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते दिनों राष्ट्र को संबोधित करते हुए दूसरों की सेवा कर रहे लोगों का करतल ध्वनि के साथ आभार प्रकट करने का जो आग्रह किया है वह संकट की इस घड़ी में निश्चिय ही लोगों का उत्साहवर्धन करेगी।
कोरोनावायरस की चपेट में आए यूरोपीय देशों में इस तरह आभार करने के तरीक़े की शुरूआत हो चुकी है। लोग अपने-अपने तरीक़ों से डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों जुड़े लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के हौसला अफ़जाई के लिए रोज एक तय समय पर ताली, हॉर्न या फिर गाना बजाते हैं।
बीते कुछ दिनों में इटली, स्पेन, फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड , स्वीडन, टर्की में लोगों ने इस तरह से आभार प्रकट करने का ज़रिया तलाशा है। यहांं रात के अंधेरे में तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा इलाक़ा गूंज उठता है। उनकी यह तालियां डॉक्टरों व नर्सो को समर्पित होती है। इसके वीडियो सोशल साइट्स पर तेज़ी से वायरल भी हो रहे हैं।
स्पेन में रात आठ बजे लोग अपनी खिड़की या बालकनी के पास ताली बजाते हैं। कुछ गाना गाते तो कुछ नाचते हुए डॉक्टरों व सेवा देने वालों का हौंसला अफजाई करते। इस तरह के प्रयास लोगों का अकेलापन दूर करने और अपने साथ दूसरों के खड़े होने का आभास भी कराती है।
इसी तरह इटली और फ़्रांस में भी अपने घरों में आइसोलेशन में रह रहे लोग आभार व्यक्त कर रहे हैं। आवासीय इलाक़ा हो या फिर अस्पताल या दफ़्तर सभी जगहों पर ताली बजाकर लोग डॉक्टरों का अभिनंदन कर रहे हैं।
जनता के इस प्रयास से रात आठ -नौ के बीच शहर की वीरानगी थोड़ी दूर हो जाती है। फ़्रांस के हालात इतने बदतर हो चुके है कि वहांं एक दिन में ही सैकड़ों लोग कोरोनावायरस की भेंट चढ़ गए हैं। जबकि स्पेन और इटली पहले ही पूरी तरह इसकी गिरफ़्त में है। फ़्रांस में तो बेवजह घर से बाहर निकलने वालों पर जुर्माना लगाना शुरू कर दिया है। आलम यह है कि पेरिस के विश्वविख्यात एफिल टावर के पास गिनती के इक्का दुक्का लोग भी नज़र नहीं आते।
ठीक इसी तरह स्वीडन में उत्साहवर्धन के लिए रात आठ बजे घर की खिड़की या बालकनी से आभार जताने वाली ताली बजती है। इस दौरान सड़क पर गाड़ी चला रहे लोग हॉर्न बजाकर अपना सम्मान जता रहे हैं। लोगों का यह प्रयास काफ़ी सकारात्मक और प्रशंसनीय है।
इस तरह के अभियान से डॉक्टर, नर्स व स्वास्थ्य क्षेत्रों जुड़े लोगों का मनोबल बढ़ रहा है। तो दूसरी तरफ़ डॉक्टरों की राय है कि घर में बंद लोगों की मानसिक सेहत के लिए भी इस तरह के अभियान सकारात्मक होते हैं। जो लोग कोरोनावायरस से बचाव के लिए खुद को अलग-थलग कर चुके हैं, उनके बीच इस तरह के क्रियाकलाप मनोवैज्ञानिक तौर पर एक दूसरे को क़रीब लाते हैं।
इस तरह सभी एक दूसरे का हाल भी जान पाते हैं
इस समय इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ज़रिए लोग एक दूसरे से ज़्यादा से ज़्यादा जुड़ रहे हैं। लोगों के अकेलापन दूर करने, कोरोना से जुड़ी जानकारी और बचाव अभियान के लिए यह प्रमुख मंच बन चुका है।
इनके ज़रिए पड़ोसी के हाल चाल जानने से लेकर ऑनलाइन पढाई, ख़रीदारी, नौकरी के इंटरव्यू तक हो रहे हैं। घर से दफ़्तर के काम करने वाले (वर्क फ्रॉम होम) कर्मचारियों की संख्या भी काफ़ी ज़्यादा है। लोग खुद को आइसोलेट करने के बाद इसतरह घर से ही अपने सभी ज़रूरी कामकाज निपटा रहे हैं।
वहीं अस्पताल और स्वास्थ्य कर्मी रात-दिन मरीज़ों की देखभाल करने, टेलीफोन पर लोगों को जानकारी देने और जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। कई ऐसे डॉक्टर व नर्स भी है जो कई दिनों से अपने घर नहीं गए और लगातार मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं। वहीं मरीज़ों का इलाज करते हुए कुछ डॉक्टर कोरोनावायरस से ग्रस्त भी हो चुके हैं।कुछ की जान भी गई। ऐसे बेमिसाल प्रयासों के लिए इनका अभिनंदन तो लाज़मी है।
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