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इंदौर की झांकी जमी, पर ट्रंप की बिगड़ गई

Mon, 08 Sep 2025 12:32 AM IST
Surendra Joshi सुरेंद्र जोशी
Updated Mon, 08 Sep 2025 12:32 AM IST
सार

विश्व में जो भी झांकीबाज बनना चाहता है वह इंदौर से कनेक्शन जोड़ के रखे। मोदीजी ने भी इंदौर को खूब पसंद किया है और यह शहर उनके जेहन में हमेशा रहता है, इसलिए ट्रंप की झांकी फीकी करने में इंदौर का भी हाथ लगता है।

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Indore's Anant Chaturdashi Jhanki, satire on Trump
अनंत चतुर्दशी पर इंदौर का नजारा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश और दुनिया में अगर झांकी जमाने में कोई शहर मशहूर है तो वो है इंदौर। वैसे यह सिलसिला 100 साल से ज्यादा पुराना है, लेकिन इसके पहले यहां के राजा महाराजा भी झांकी जमाने में होशियार थे, सिर्फ सादगी की प्रतिमूर्ति देवी मां अहिल्या को छोड़कर। दरअसल, इंदौर की कपड़ा मिलें, जो अब विलुप्त हो चुकी हैं, से शुरू हुआ गणेश विसर्जन का यह पर्व धीरे धीरे इंदौरियों के अनंत उत्साह का प्रतीक बन गया। यही झांकियां और झांकीबाजी इंदौरियों की रग रग में समा गई। अनंत चतुर्दशी पर तो मानो ये झांकियां खालिस इंदौरियों के शरीर में आने लगती हैं। वे जब तक इनके साक्षी नहीं बन जाते, इस रात सोते नहीं हैं। उनके लिए यह पर्व गंगा में डुबकी के जितना ही पवित्र है। एमपी गजब है तो इंदौर उसमें और भी गजब है। यहां की जनता, भिया, नेता, दादा और परदादा भी अच्छे-अच्छे खलिफाओं की झांकी जमाने और बिगाड़ने में माहिर थे और हैं। यह सिलसिला अनंतकाल तक जारी रहेगा, ऐसी आशा है।

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इंदौर पता नहीं क्यों अनेक खूबियों वाला शहर है। मालवा के पठार का यह समतल मैदान देश के मध्य भाग में स्थित है और इसलिए यह अनूठे प्रेम और अपनेपन से भरा हुआ है। यह न जाने किन किन चीजों की राजधानी है। जैसे कि स्वाद की राजधानी, सांस्कृतिक राजधानी, नेतागीरी की राजधानी, धार्मिक राजधानी, भोले भाले, निस्पृह, निरीह, लाचार लोगों की राजधानी। यहां लोग हर बात का मजा लेते हैं, सुख हो, दुख हो, संकट हो, हर हाल में वैराग्य भाव से जीते हैं, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, इसलिए गड्ढों के बीच भी बखूबी संतुलन साधते हुए अपने पड़ाव तक पहुंच जाते हैं। उदार इतने हैं कि वे किसी के उकसावे में नहीं आते। समझदार इतने हैं कि वे खुद का और शहर का हानि लाभ सब समझ जाते हैं, पर सिर्फ मौन रहकर अपना विरोध जताते हैं। यह कह लीजिए कि यहां की जनता मौन जागृति के भाव में जीती है। शहर की हर अच्छी और बुरी बात को वह देखती और समझती है, लेकिन सिर्फ साक्षी भाव से, कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। वह 'जिसकी जैसी करनी, वैसी भरनी' के सिद्धांत में गहरा विश्वास करती है, इसलिए प्राकृतिक न्याय का इंतजार करती है। शायद शहर की यही विशेषता शांतिप्रिय शहर और शांतिप्रिय लोगों की ख्याति देती है। 
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इंदौर की झांकीबाजी की बात करें तो ऐसी झांकीबाजी दुनिया के किसी भी हिस्से में नजर नहीं आती। यहां हर काम भव्य, विशाल और उत्साह से होता है। अटूट सहयोग और अपार उत्साह यहां हर काम में दिखाई देता है। कोई भी सांस्कृतिक या धार्मिक या खेल अथवा सामाजिक आयोजन हों, शो हों, मेला हो, पर्व हो या त्योहार, यहां अखंड भंडारे होते हैं। इनमें कोई भेदभाव नहीं होता, सभी धर्मों के लोग इनमें शरीक होते हैं। इंदौर में नगर भोज का तो संभवत: विश्व रिकॉर्ड बन चुका है। पितृ पर्वत पर हनुमानजी की भव्य प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के मौके पर सड़क पर लाखों लोगों को बैठाकर भोजन कराने का कीर्तिमान बन चुका है। हालांकि, इन सफल आयोजनों के पीछे कई अदृश्य शक्तियां होती हैं, जो इन्हें संचालित करती हैं, वर्तमान में प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इनमें अव्वल हैं। उनसे पहले दशकों तक प्रकाशचंद सेठी, महेश जोशी, कृपाशंकर शुक्ला, चंद्रप्रभाष शेखर, अभय छजलानी, विष्णुप्रसाद शुक्ला, लक्ष्मण सिंह गौड़ जैसे दिग्गज ऐसे आयोजनों की अदृश्य शक्तियां हुआ करते थे। 
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राजवाड़ा से रीगल और बड़ा गणपति तक झांकीबाजों का ठिकाना
करीब 400 साल पहले का इतिहास देखें तो यह शहर छोटा सा गांव था। इंदूर से इंदौर बने शहर की होल्कर रियासत के महाराजा चूंकि, महाराष्ट्र से यहां सूबेदार बनकर आए थे तो उनका मुंबई कनेक्शन बहुत गहरा था, उनके जरिए वहां से विकास की सोच इंदौर तक पहुंची। होल्कर महाराजा ने इंदौर के विकास को पंख लगाए तो आजादी के बाद की सरकारों ने उसमें चार चांद लगा दिए, हालांकि, चांद पर भी गड्ढे हैं, मैं फिर उसमें नहीं जाना चाहता। हां, बात कर रहे थे झांकीबाजी की, तो माजरा यह है कि शहर के पूर्वी मध्य क्षेत्र से शुरू हुई कपड़ा मिलों की झांकियों की परंपरा के साक्षी बनते—बनते राजवाड़ा से रीगल और बड़ा गणपति इलाके में रहने वाले हजारों परिवारों की अनेक पीढ़ियां बड़ी हुईं। उनकी रग रग में झांकी और झांकीबाजी है। वे हमेशा यही सोचते हैं कि कैसे भी हो मेरी झांकी हो जाए। चाहे धर्म के नाम पर हो, राजनीति में हो, समाज स्तर पर हो या गली मोहल्ले और चौराहे पर हो, उनकी झांकी जमना चाहिए। झांकीबाजी अब इंदौर में एक मुहावरा बन गया है। यहां के कुछ शब्द बड़े प्रचलित और लोकप्रिय हैं, उनमें से एक झांकीबाजी है तो दूसरा झांझ झपका। असल में ये पर्यायवाची हैं। झांकीबाजी एक पैमाने की तरह है, इससे तय होता है कि आपका किसी खास क्षेत्र, कारोबार या निजी तौर पर कितना रसूख है, आप कितने प्रभावी हैं। आपकी झांकी है या नहीं? इससे आपके प्रभाव का आकलन होता है। 

नए शहर में नहीं चलती झांकीबाजी
इंदौर अब मेट्रो या महानगर बनता जा रहा है। यहां मेट्रो की झांकी निकल चुकी है, जल्द यह पूरी स्पीड से फर्राटा भरेगी। अभी झांकी का सालाना आयोजन हुआ है, फिर नित्य दर्शन  होंगे। इंदौर की झांकीबाजी सिर्फ पुराने शहर या पश्चिमी क्षेत्र तक ही सीमित है। शहर में झांकीबाजों का उदय भी यहीं से हुआ है, क्योंकि इसी इलाके में झांकीबाजे के सारे पर्व और आयोजन होते हैं। इस मामले में पूर्वी क्षेत्र या नया शहर फिसड्डी है। वहां के लोगों या नेताओं को भी झांकी जमाने का चस्का अगर चढ़े या हो तो उन्हें भी इधरइच आना पड़ेगा। पश्चिमी क्षेत्र में झांकी जमाए बगैर शहर में झांकी जमना मुश्किल है। इसलिए पश्चिम से निकलकर पूर्वी शहरवासी हो चुके अनेक नेता भी पुराने शहर में ही अपनी जड़ें तलाशते हैं और फिर पूरे शहर में छा जाते हैं। 

मोदी जी ने फीकी कर दी ट्रंप की झांकी
व्यापक रूप से देखें तो झांकीबाजी यानी अपना प्रभाव दिखाने का रोग पूरी दुनिया में है। अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तो यह सिर पर सवार हो गया था। इसलिए दूसरी पारी में उनका यह शौक या रोग सिर चढ़कर बोल रहा था। अपने पिटारे से टैरिफ का जिन्न निकालकर उन्होंने दुनिया के शीर्ष झांकीबाजों रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झांकी बिगाड़ने की कोशिश की, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री, स्वयं भी इस अदा में पीछे नहीं हैं, ट्रंप की ऐसी झांकी बिगाड़ी की उनकी तबीयत मस्त हो गई। इसलिए कहना चाहता हूं कि विश्व में जो भी झांकीबाज बनना चाहता है वह इंदौर से कनेक्शन जोड़ के रखे। मोदीजी ने भी इंदौर को खूब पसंद किया है और यह शहर उनके जेहन में हमेशा रहता है, इसलिए ट्रंप की झांकी फीकी करने में इंदौर का भी हाथ लगता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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