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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: साहित्य और फिल्म में आग का प्रयोग

Wed, 16 Sep 2026 07:54 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Wed, 16 Sep 2026 07:54 PM IST
सार

सत्यजित राय अपनी फिल्म ‘घरे-बाइरे’ में बार-बार आग दिखाते हैं, तरह-तरह से आग का प्रयोग करते हैं। इस फिल्म में हर बार यह एक नए अर्थ केलिए उपयोग की जाती है। फिल्म ‘घरे-बाहरे’ का प्रारंभ आग की लपटों से होता है। सत्यजित राय ने इसका उपयोग एक मोटिफ़ के रूप में किया है।

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history of world cinema ghare baire and movies based on fire
सिनेमा की दुनिया - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

साहित्य में आग कई बातों का संकेत देती है। फिल्म में भी आग का प्रयोग कई प्रतीक दिखाने के लिए किया जाता है। कभी यह गुस्सा बन कर जलती है, कभी दुश्मनाई में जलती जलती है। आग हानि का प्रतीक है तो यह मशाल बन कर आंदोलन एवं विद्रोह को दर्शाती है। आग परिवर्तन लाती है। जमीन्दार-माफिया अपना वर्चस्व, अपनी शक्ति दिखाने केलिए झोपड़ियां जलाता है, पूरा-का पूरा परिवार जला देता है।

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किसान-मजदूर मशाल जुलूस निकाल कर शांतिपूर्ण ढ़ंग से अपना विरोध प्रकट करते हैं। फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ में पृष्ठभूमि में आंदोलनकारी ब्रिटिश सरकार के विरोध में मशाल जलूस निकालते दीखते हैं। कुछ फिल्मों के नाम आग से जुड़े हुए हैं, ‘इन्फ़र्नो टावर’, ‘बर्निंग ट्रेन’ ऐसी ही फिल्में हैं।
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कभी-कभी आतिशदान में अथवा जंगल में मंगल के समय जलती आग, कैंडल लाइट पैशन, निजी पलों को चित्रित करती है, तो लौ को बुझा देना अलग अर्थ देती है। आग अतीत के समाप्त होने और एक नई शुरुआत का प्रतीक हो सकती है। कभी यह राख से फ़ीनिक्स की भाति फिर से उठ खड़े होने को दिखाती है। लाल रंग आग, पैशन का प्रतीक है।
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सत्यजित राय की फिल्में

सत्यजित राय ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास ‘घरे-बाइरे’ पर इसी नाम से फिल्म बनाई है। सत्यजित राय अपनी फिल्म ‘घरे-बाइरे’ में बार-बार आग दिखाते हैं, तरह-तरह से आग का प्रयोग करते हैं। इस फिल्म में हर बार यह एक नए अर्थ केलिए उपयोग की जाती है। फिल्म ‘घरे-बाहरे’ का प्रारंभ आग की लपटों से होता है। सत्यजित राय ने इसका उपयोग एक मोटिफ़ के रूप में किया है। प्रारंभ की दिखती आग वास्तव में चिता की आग है।

फिल्म में मात्र तीन चरित्र हैं, निखिल, बिमला और संदीप। शुरुआत में जलती आग निखिल की चिता की आग है। आग की लपटों पर ही क्रेडिट चलता है। साथ में पार्श्व संगीत चल रहा है, जो क्रेडिट समाप्त होते-होते ‘वंदे मातरम्’ के नारों में परिवर्तित हो जाता है। आग की लपटों का रंग और बाद में ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाने वालों के कपड़ों का रंग भी पीला-केसरिया है।

पीला-केसरिया रंग और आग आंदोलन का भी प्रतीक है। इसी समय बिमला की आवाज सुनाई देती है, वह आग को एक अन्य अर्थ देती है। उसके शब्द हैं: ‘मैं अग्निपरीक्षा से गुजरी हूं। मुझमें जो अशुद्ध था, वह राख हो गया है। जो था, उसे तुम्हें निवेदन कर दिया है, जिसने घायल हृदय से मेरे सारे अपराधों को स्वीकारा। आज पता चला कि उसके जैसा कोई और नहीं है।’ फिल्म का ये शुरुआती वाक्य टैगोर के उपन्यास के अंतिम शब्द हैं।

संदीप का किरदार

फिल्म का एक अन्य पर महत्वपूर्ण पात्र संदीप (सौमित्र चटर्जी) लोगों के कंधों पर सवार हो कर आता है। लोग ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगा रहे हैं। वह खुद भी गेरुआ दोशाला लिए हुए है और सभा के लोग भी गेरुआ वस्त्रों में हैं। कंधों से उतर कर वह मंच पर जाता है और बड़ा जोशीला, आग उगलता भाषण देता है।

संदीप अपने भाषण में बताता है कि लॉर्ड कर्जन ने बंग-भंग करके हिन्दु-मुस्लिम के भाईचारे, एकता और दोस्ती भंग कर दिया है। हमें इसके विरुद्ध आंदोलन करना होगा। यह सारा कार्य-व्यापार बिमला (स्वातिलेखा चटर्जी) सहित निखिल (विक्टर बैनर्जी) के घर की स्त्रियां जालीदार छज्जे से देखती-सुनती हैं।

फिल्म संदीप को लगातार विदेशी सिगरेट पीता दिखाती है। कुछ आगे बढ़ने पर निखिल संदीप की छोड़ी जलती हुई सिगरेट देखता है, संदीप निखिल-बिमला के वैवाहिक जीवन में ऐसी आग लगाता है, जिसमें सब जल कर स्वाहा हो जाता है।

इस फिल्म में संदीप एवं निखिल दो भिन्न विचारों को प्रकट करते हैं। एक शांतिपूर्ण परिवर्तन में विश्वास करता है तो संदीप उग्र देशभक्त का प्रतीक है। वह देश-समाज से अधिक स्वार्थ में रूचि रखता है। लोगों को उकसा कर अपना लाभ सिद्ध करना चाहता है। कुछ समय बाद संदीप स्वदेशी आंदोलन के तहत दूसरों से विदेशी वस्तुओं की होली जलवाता है। संदीप गरीब व्यापारियों का विदेशी सामान बलपूर्वक जलवाता है।

स्वदेशी अंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में जब मुसलमान मंदिर जलाते हैं। निखिल अपने बरामदे से जलता हुआ गांव देखता है। वह बहुत दु:खी है। यहां कुछ आग प्रच्छन्न है, बिमला पश्चाताप की आग में जलती है। निखिल के मन में संघर्ष की धीमी आग जल रही है। संदीप अपने जोशीले भाषण में आग उगलता है।

संदीप में उत्तेजना, राष्ट्रवाद की धधकती आग है, जिसमें वह सब भस्म कर डालता है, लेकिन स्वयं सुरक्षित बच निकलता है। सत्यजित राय ने इस फिल्म में आग को विभिन्न प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया है।

इस तरह राय अग्नि के विविध अर्थी चित्रण अपनी सिने-कला में करते हैं। कहीं यह विद्रोह है, अत्याचार है। कही भावनाओं के शुद्धिकरण का प्रतीक है। कहीं चिता की अग्नि है, कहीं दंगा है, तो कभी यह देशप्रेम है। इस फिल्म में सत्यजित राय आग को बड़ी कुशलता से सिनेमैटिक संकेत के रूप में प्रस्तुत करते हैं।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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