मौसम के रस-रंगः जेठ की तपती दोपहरियां
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जेठ मास गर्मी लेकर आता है। भारतीय ऋतु चक्र के हिसाब से जेठ से आषाढ़ यानी कि अप्रैल से जून का मौसम ग्रीष्म ऋतु का होता है। जेठ आते ही गर्मी अपने उरूज पर होती है। जेठ की दोपहरिया बहुत ज्यादा तपती है। ऐसा लगता है, जैसे सब कुछ झुलस जाएगा। हवा कुछ इस कदर गर्म हो जाती है कि सड़क पर दूर तक देखें तो मृग मरीचिका का एहसास होता है। यानी ऐसा लगता है जैसे आगे सड़क पर पानी बह रहा हो।
इस साल छह मई से जेठ मास शुरू हो गया है। ये मास चार जून तक चलेगा। इस माह के बाद अषाढ़ का महीना आएगा। जेठ मास को ज्येष्ठ भी कहते हैं। दरअसल इस भारतीय मास में सूरज की तपिश अपने चरम पर होती है। सूर्य की ज्येष्ठता के कारण ही इस महीने को ज्येष्ठ कहा जाता है। ज्येष्ठ का देशज शब्द जेठ है। वैसे जेठ का मतलब भी बड़ा ही होता है।
जेठ की दोपहरियां बड़ी ही गर्म होती हैं। इस वजह से लोग घरों से कम निकलते हैं। कवि घाघ भी जेठ की दोपहरिया में घूमने-फिरने से मना करते हैं,
चौते गुड़, वैशाखे तेल,
जेठ के पंथ, अषाढ़े बेल।
यानी जेठ माह में दोपहर में ज्यादा चलना-फिरना नहीं चाहिए। इस महीन दोपहरियां बहुत गर्म रहती हैं। इस वजह से घूमना-फिरना स्वास्थ्य के लिए नुकसादेह हो सकता है। दोपहर को विश्राम करना चाहिए। अषाढ़ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए।
जेठ के दिन और गांवों की रौनक
जेठ के दिन फुरसत भरे लगते हैं। किसान अपनी फसल काट चुके होते हैं। इन दिनों जेठ की दोपहरिया में अमराई गुलजार रहती है और शाम को चौपाल। गांवों में लोग पेड़ों की छांव में बंसखटिया डाले बैठे मिल जाएंगे। पेड़ की छांव में कोई सन से रस्सी ‘बर’ रहा है तो कोई चारपाई। सरसराती हवा भली लगती है। पपीहे सुबह और शाम को ‘पी कहां’ सा पूछता लगता है तो कोयलें दोपरियां में खूब कूकती हैं।
गौरैया भी घरों में खूब शोर करती हैं। यूं लगता है जैसे सभी बड़ी ही फुरसत में हैं। गांवों में घरों की छतें आपस में मिली रहती हैं। सांझ की बेला में सभी घरों की लड़कियां और महिलाएं टोली बनाकर गप्पें मारती हैं।
पुराने दिनों में शहरों में भी जेठ की गर्म दोपहरी में सब कुछ रुक सा जाता था। मोहल्ले सूने हो जाते। दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता था। कमरा बंद करके मैग्ज़ीन या उपन्यास पढ़ना बड़ा ही सुखद लगता था। घर के तकरीबन सभी इसी उपक्रम में व्यस्त रहते। टीवी का दौर आने के बाद पूरा परिवार फिल्में देखकर दोपहर गुजारता। इस दौरान पूरा मोहल्ला और कॉलोनी सन्नाटे में डूब जाती। घर से बस वही निकलता है, जिसे कोई मजबूरी हो। उन दिनों खिड़की और दरवाजों पर ‘खस की टटी’ लगाई जाती। खस एक खास तरह की घास होती है और इस घास का पर्दा बनाया जाता था। इस पर पानी छिड़का जाता। पानी से होकर आती हवा में खास तरह की शीतलता और खुश्बू होती है।
हालांकि घाघ कहते हैं कि जेठ की दोपहरियों में बस आराम करना चाहिए। ज्यादा सोना नहीं चाहिए। जो लोग जेठ मास की दोपहरियों में ज्यादा सोते हैं, वह असाढ़ मास में जाकर बीमार पड़ जाते हैं।
ज्येष्ठ मास जो दिन में सोए,
ओकर जर असाढ़ में रोए
शास्त्र कहते हैं कि जेठ मास में पानी बचाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि इसके अगले मास में और ज्यादा गर्मी पड़ने वाली है। तब पानी की कमी न हो, इसलिए संरक्षण की शुरुआत मास भर पहले से ही होनी चाहिए। इस मास में जल के दान को पुण्य माना गया है। जेठ में पानी को लेकर दो पर्व मनाए जाते हैं। गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी। मान्यता है कि इसी मास गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। यही वजह है कि जेठ मास में गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है।
जेठ मास के मौसम के बारे में घाघ की भविष्यवाणी भी बड़ी महत्वपूर्ण हैं। पुराने समय में जब मौसम विज्ञान जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती थी, तब गांव-देस में घाघ ही सबसे बड़े मौसम विज्ञानी हुआ करते थे। उनकी कहावतें और दोहे आज भी बड़े ही सटीक मालूम होते हैं। घाघ कहते हैं-
माघ क ऊखम जेठ का जाड़।
पहिलै बरखा भरिगा ताल॥
कहैं घाघ हम होब बियोगी।
कुँआ के पानी धोइहैं धोबी॥
अर्थात, अगर माघ महीने में गर्मी पड़ने लगे और जेठ मास के दिन सर्द हों और फिर पहली ही बारिश से तालाब भर जाएं तो आने वाले दिनों में ऐसा सूखा पड़ेगा कि हमें कमाई के लिए परदेस जाना पड़ेगा। तालाब में पानी नहीं बचेगा और धोबी कुंए के पानी से कपड़ा धोएंगे।
कवि घाघ ने कहा है कि जेठ मास में जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी उतनी ही अच्छी बारिश होने की संभावना रहती है। इस बारे में उनका एक दोहा है-
जेठ मास जो तपे निरासा
तो जानो बरखा की आसा
‘बारहमासा’ में भी जेठ मास पर काफी कुछ लिखा गया है। बारहमासा में बारह महीनों का जिक्र करते हुए विरह-वेदना से लेकर प्रकृति और लोक जीवन का चित्रण मिलता है। कई कवियों ने ‘बारहमासा’ लिखा है। सबसे ज्यादा लोकप्रिय मलिक मोहम्मद जायसी का ‘बारहमासा’ है। बारहमासा में किसी प्रेयसी का पति परदेस चला जाता है। वह दुखी मन से सखी से कहती है कि बिन पति हर मौसम व्यर्थ है। मलिक मोहम्मद जायसी के 'बारहमासा' के मुताबिक रानी नागमती चित्तौड़ के राजा रतनसेन की विवाहिता पत्नी थीं। राजा रतनसेन लंका चले जाते हैं। विरह में कई माह गुज़रते हुए जेठ मास आ जाता है। रानी नागमती चाहती हैं कि पति लंका से तुरंत वापस लौट आएं। वह सखी से कहती हैं-
जेठ जरै जग, चलै लुबारा
उठहिं बवंडर परहिं अंगारा
विरह गाजी हनुमंत होई जागा
लंकादाह करै तन लागा
मतलब है कि जेठ मास में तेज लू चल रही है। भीषण गर्मी पड़ रही है। एक तो अंगार बरस रहे हैं और ऊपर से प्रेयसी अलग विरह की आग में जल रही है। वह तड़प कर कहती है, काश! हनुमान जी एक बार पुनः इन गर्म अंगारों को लेकर लंका जाते और उस नगरी को जला डालते, जिससे मेरे पति तुरंत वहां से वापस आ जाते।
मैथिल कवि कोकिल विद्यापति ठाकुर ने भी बारहमासा की रचना की है। कोकिल जायसी से पहले के हैं। जेठ मास पर वह कहते हैं,
चैतक गुड़ ने वैसावह तेल।
जेठक चलव ने अषाढ़क बेल।।
यानी जेठ मास में ज्यादा चलना नहीं चाहिए। अषाढ़ मास में बेल का फल नहीं खाना चाहिए।
नरपति नाल्ह ने भी ‘बारहमासा’ रचा है। वह अजमेर के राजा विग्रहराज चतुर्थ के राजकवि थे। वह ‘बारहमासा’ में जेठ मास के बारे में लिखते हैं-
देषि जेठाणी हिव लागउ छइ जेठ।
मुह कुमलाणा नइ सूक गया होठ।
मास दिहाडउ दारुण तवइ।
धण कउ हे धरणि न लागए पाउ।
अनल जलइ धण परजलइ।
हंस सरोवर मेल्हिउ ठांह॥
अर्थ है, जेठानी देखो जरा, जेठ मास लग गया है। मुंह मुरझा गया है और होंठ सूख से गए हैं। यूं लगता है जैसे हर तरफ आग बरस रही है। मैं जमीन पर पैर भी नहीं रख पा रही हूं। लगता जैसे मैं जल जाऊंगी। हंस भी सरोवर छोड़कर उड़ गए हैं।
भारतीय संस्कृति के हर मास और मौसम की विशेषता है। अहम है कि इसे जी भरकर जीना चाहिए।
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