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मानव-वन्यजीव संघर्ष: बिगड़ रहा है प्राकृतिक सन्तुलन, बढ़ रही हैं चुनौतियां

Wed, 28 Feb 2024 12:18 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 28 Feb 2024 12:18 PM IST
सार

देश में बाघों और तेंदुओं जैसे मांसाहारी जीवों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। कूनो पार्क में विदेश से लाए गए चीतों की वंश वृद्धि की सूचना है। देश में बाघों की संख्या 3683 तक पहुंच गई। लेकिन दूसरी तरफ केरल में वायनाड, कन्नूर, पलक्कड़ और इडुक्की जिलों की मानव वन्यजीव संघर्ष...

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human and wildlife conflict and nature conservation and environment
Wildlife - फोटो : Pixabay

विस्तार

धरती पर प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखने और मानव जीवन के लिए सुख-समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए जितना जरूरी आदमी है, उतने ही जरूरी अन्य जीव जन्तु और पादप भी हैं।

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इसी तरह हमारे जीवन में बहुत काम आने वाले पालतू पशु जितने जरूरी हैं, उतने ही जरूरी वन्य जीव जन्तु भी हैं। इनमें से भी अगर केवल वनस्पतियों पर निर्भर जीव जन्तु ही धरती पर रहेंगे तो यह धरती वनस्पति विहीन हो जाएगी, इसलिए दूसरे जीवों को खाने वाले मांसाहारी जीवों का सही अनुपात में सलामत रहना बहुत जरूरी है। लेकिन दुर्भाग्य से यह प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ गया है। इस असन्तुलन के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष चिन्ताजनक स्थिति जक पहुंच गया है।

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मांसाहारी जीवों की संख्या बढ़ने के साथ खतरा भी बढ़ा

सुनने में तो बहुत अच्छा लग रहा है कि देश में बाघों और तेंदुओं जैसे मांसाहारी जीवों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। कूनो पार्क में विदेश से लाए गए चीतों की वंश वृद्धि की सूचना है। देश में बाघों की संख्या 3683 तक पहुंच गई। लेकिन दूसरी तरफ केरल में वायनाड, कन्नूर, पलक्कड़ और इडुक्की जिलों की मानव वन्यजीव संघर्ष की इस सरकारी रिपोर्ट के आकड़े भी देखिए जिनमें कहा गया है कि 2022-23 में इन जिलों में 8,873 जंगली जानवरों के हमले दर्ज किए गए, जिनमें से 4193 जंगली हाथियों द्वारा, 1524 जंगली सूअरों द्वारा, 193 बाघों द्वारा, 244 तेंदुओं द्वारा और 32 बाइसन द्वारा किए गए थे।

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उत्तराखण्ड की राजधानी के कुछ इलाकों में लोगों को रात को घरों से न निकलने की सलाह प्रशासन द्वारा दी गई है। मुख्यमंत्री ने राज्य में गुलदारों के बढ़ते हमलों को देखते हुए वन विभाग के कर्मचारियों की छुट्टियों पर रोक लगा रखी है।

श्रीनगर गढ़वाल में तो मानों गुलदारों को रात का पहरा देने की ड्यूटी लगी हो। देहरादून महानगर के आसपास जनवरी और फरवरी में मानवभक्षी तेंदुए तीन लोगों को निवाला बना चुके हैं।

देशभर में वन्यजीवों के हमले बढ़े

वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री अश्वनि कुमार चैबे द्वारा जुलाई 2022 में लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी गई लिखित जानकारी के अनुसार हाथियों ने 2019 से लेकर 2022 तक देश में 1,579 मनुष्यों को मार डाला। इनमें से सबसे अधिक 322 मौतें ओडिशा में हुईं, इसके बाद झारखंड में 291, पश्चिम बंगाल में 240, असम में 229, छत्तीसगढ़ में 183 और तमिलनाडु में 152 मौतें हुईं।

सन् 2019 और 2021 के बीच बाघों ने अभयारण्यों में 125 मनुष्यों को मार डाला। इनमें से लगभग आधी मौतें महाराष्ट्र में हुईं। उत्तराखंड में हर साल मानव पशु संघर्ष बढ़ रहा है। राज्य गठन के वर्ष 2000 से लेकर 2022 तक, कुल 1,054 लोग वन्यजीवों के हमलों का शिकार हुए, 5,112 व्यक्ति ऐसे हमलों में घायल हुए। उत्तराखण्ड में गुलदारों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है औेर मानजीवन के लिए सर्वाधिक खतरा ये गुलदार ही बने हुए हैं।

क्यों बढ़ रहा है मानव-वन्यजीव संघर्ष?

इस संकट के लिए बेजुबान वन्यजीवों को अकेले दोषी ठहराना न तो न्यायसंगत् है और ना ही इससे कोई हल निकल सकता है। देखा जाए तो मनुष्य ही इस संघर्ष के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। मानव आबादी बढ़ते जाने से उसका वन्यजीव आवासों में विस्तार होता जा रहा है जिससे वन्यजीवों के आवास की हानि और विखंडन हो रहा है। यह स्थिति वन्यजीवों को मानव बहुल क्षेत्रों में भोजन और आश्रय खोजने के लिए मजबूर करती है, जिससे संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है।

वनों की कटाई, कृषि और शहरीकरण जैसे भूमि उपयोग परिवर्तन वन्यजीव आवास और प्रवास पैटर्न को बदल देते हैं, जिससे जानवर मानव बस्तियों के निकट संपर्क में आ जाते हैं। जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिक तंत्र को बदल रहा है और वन्यजीवों के व्यवहार, वितरण और भोजन की उपलब्धता को प्रभावित कर रहा है। इससे जानवरों की गतिविधियों और सीमाओं में परिवर्तन हो सकता है।

अवैध शिकार और वन्यजीव व्यापार जैसी अवैध गतिविधियां पारिस्थितिक तंत्र को बाधित करती हैं और वन्यजीव आबादी को कम कर सकती हैं, जिससे संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और मनुष्यों के साथ संघर्ष हो सकता है।

मानवीय गतिविधियां बढ़ने से प्राकृतिक शिकार की आबादी को खत्म कर देती हैं। इससे मांसाहरी जीव घरेलू जानवरों को निशाना बनाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। सड़कें, बाड़ और अन्य मानव निर्मित संरचनाएं वन्यजीव गलियारों और प्रवास मार्गों को बाधित करती हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है, जो समुदाय अपनी आजीविका के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं, उन्हें वन्यजीवों के साथ संघर्ष का सामना करना पड़ता है।

इधर, कुछ मामलों में, वन्यजीव व्यवहार के बारे में जागरूकता की कमी और अपर्याप्त शमन उपाय संघर्षों में योगदान कर सकते हैं। संघर्षों को कम करने के लिए शिक्षा और सामुदायिक सहभागिता आवश्यक है।


संघर्ष के असली कारण

वन्यजीव  प्रायः लोगों की सुरक्षा, आजीविका और सुख सुविधाओं के लिए सीधा खतरा पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए जब हाथी फसलों को खा जाते हैं, गुलदार और बाघ पालतू पशुओं को मार देते हैं, तो लोग अपनी आजीविका खो सकते हैं।

हिसंक जीव मानव संहार भी करते हैं तो मानव द्वारा इन प्रजातियों के खिलाफ अक्सर प्रतिशोध होता रहता है। यह प्रतिशोध किसी प्रजाति के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है और पिछली संरक्षण प्रगति को उलट सकता है।

मानव जनसंख्या वृद्धि, कृषि विस्तार, बुनियादी ढांचे के विकास, जलवायु परिवर्तन और निवास स्थान के नुकसान के अन्य कारकों के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष अधिक लगातार, गंभीर और व्यापक होते जा रहे हैं।

मानव-वन्यजीव संघर्ष वहां भी हो सकता है जहां वन्यजीव और मानव आबादी ओवरलैप होती है, इसलिए कोई भी कारक जो वन्यजीव और लोगों को निकट संपर्क में आने के लिए मजबूर करता है, संघर्ष की संभावना को और अधिक बढ़ा देता है।

अब तक किए गए अधिकांश कार्यों में लोगों पर प्रभाव को कम करने के लिए हस्तक्षेप और वन्यजीवों के खिलाफ प्रतिशोध जैसे बाधाएं पैदा करना, निवारक तैनात करना या वन्यजीवों को स्थानांतरित करना शामिल है। हितधारकों के साथ परामर्शात्मक, सहयोगात्मक प्रक्रियाओं के अभाव में, इन उपायों को अक्सर सीमित सफलता मिलती है।

ऐसे रोका जा सकता है हिंसक संघर्ष

मानव-वन्यजीव संघर्ष को संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी के 2020 के बाद के वैश्विक जैव विविधता ढांचे में एक वैश्विक चिंता के रूप में मान्यता दी गई है। विशेज्ञों द्वारा ऐसे कई दृष्टिकोण और उपाय सुझाये गये हैं जिनसे क्षति या प्रभाव को कम करने, तनाव कम करने, आय और गरीबी के जोखिमों को दूर करने और स्थायी समाधान विकसित करने के लिए अपनाए जा सकते हैं। इन सुझावों में वन्यजीवों को बस्तियों में आने से रोकने के लिये बाधाएं (बाड़, जाल, खाइयाँ), रखवाली और पूर्व-चेतावनी प्रणालियां, निवारक और विकर्षक (सायरन, रोशनी, मधुमक्खी के छत्ते), स्थानान्तरण (वन्यजीवों को स्थानांतरित करना), मुआवजा या बीमा, जोखिम कम करने वाले विकल्प प्रदान करना, साथ ही प्रबंधन भी शामिल हैं।

ऐसे उपायों की प्रभावी योजना और कार्यान्वयन के लिए प्रभावित समुदायों के सहयोग से समुदाय के नेतृत्व वाले संरक्षण में अच्छे सिद्धांतों पर विचार करने की आवश्यकता होती है। स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और लोगों को प्रदान की जाने वाली महत्वपूर्ण सेवाएँ वन्य जीवन पर निर्भर करती हैं। इसलिए मानव-वन्यजीव संघर्षों का प्रबंधन संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता विजन 2050 को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है जिसमें ‘‘मानवता प्रकृति के साथ सद्भाव में रहती है और जिसमें वन्यजीव और अन्य जीवित प्रजातियां संरक्षित हैं’’।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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