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खुला आकाश: योग, लोक और भाषा के बीच चौरंगीनाथ, हिंदी की जनभाषायी चेतना कैसे आगे बढ़ी?

Sun, 01 Nov 2026 09:52 AM IST
Navin Singh Patel नवीन सिंह पटेल
Updated Sun, 01 Nov 2026 09:52 AM IST
सार

प्राण सांकली उस दौर की स्मृति है, जब भारतीय ज्ञान परंपरा लोकभाषा में उतर रही थी। चौरंगीनाथ इसी यात्रा के उन आरंभिक पड़ावों में दिखाई देते हैं, जहां से हिंदी की जनभाषायी चेतना आगे बढ़ी।

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Haryana Asthal Bohar Math Chauranginath and Yoga Folk Culture Language How Hindi Consciousness Evolve
अस्थल बोहर मठ (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हरियाणा के रोहतक में स्थित अस्थल बोहर मठ की पहचान बाबा मस्तनाथ की तपोभूमि और नाथ परंपरा की स््मृतियों से जुड़ी है। इसकी साहित्यिक पहचान मठ के संस्थापक और आठवीं सदी के सिद्ध योगी चौरंगीनाथ के हिंदी साहित्य के आरंभिक विकास में अवदान से भी है। ‘प्राण सांकली’ उन्हीं की वाणी और योग साधना से जुड़ी महत्वपूर्ण रचना है।

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बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय ने बाबा चौरंगीनाथ को मत्स्येंद्रनाथ का शिष्य और गोरखनाथ का गुरु-भाई बताया है। ‘प्राण सांकली’ के पदों में भी “मछन्द्रनाथ गुरु अम्हारा गोरखनाथ भाई” जैसा उल्लेख मिलता है। इससे चौरंगीनाथ की साहित्यिक और आध्यात्मिक परंपरा से गहरे जुड़ाव की पुष्टि होती है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लोक साहित्य और कथाओं में चौरंगीलाल की पहचान ‘पूरन भगत’ के रूप में भी है। इन पर खूब सांग और रागिनियां भी हैं। सूफी कवि कादिर यार ने भी ‘किस्सा पूरन भगत’ में एक राजकुमार के परम तपस्वी और सिद्ध योगी बनने के सफर को बखूबी बयां किया है।
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राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बती बौद्ध परंपरा के तेंग्युर ग्रंथों का अध्ययन कर लिखी पुस्तक 'हिंदी काव्यधारा' में वज्रयान व सहजयान मत से जुड़े 84 महासिद्धों की प्रामाणिक जीवनियों में चौरंगीनाथ को ‘चौरंगीपा’ (पा यानी पाद-सम्मान में प्रयुक्त) कहा है।
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपनी पुस्तक ‘नाथ संप्रदाय’ में बौद्ध सिद्धों और नवनाथों के अंतर्संबंधों की विवेचना के दौरान चौरंगीनाथ को ‘महासिद्ध’ बताया है। चौरंगीनाथ की रचनाएं दोहों और पदों के रूप में हैं। इनकी सबसे चर्चित रचना ‘प्राण सांकली’ को नाथ सिद्धों की महत्वपूर्ण कृति माना जाता है। इसमें दार्शनिक विचारों को साधना और अनुभव से जुड़े बिंबों के जरिये व्यक्त किया गया है। ‘पिंड में ब्रह्मांड’ की अवधारणा, नाड़ी-चक्र और प्राण की गति जैसे विषय इसके केंद्र में हैं। इसमें शरीर को ही साधना और आत्मबोध का माध्यम बनाया गया है।


सिद्ध और नाथ साहित्य में भाषा को लोकोन्मुख इसलिए बनाया जा सका, क्योंकि नाथ योगियों ने अपने विचारों को ऐसे व्यक्त किया कि उसे साधारण जन भी सुन-समझ सकें। यही लोकाभिमुखता आगे हिंदी की बोलियों के विकास की जमीन तैयार करती है। प्राण सांकली इसी संक्रमणकालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का उदाहरण मानी जा सकती है। इसमें संस्कृतनिष्ठ दार्शनिक अवधारणाओं के साथ ऐसी भाषा मिलती है, जो अपभ्रंश और आरंभिक भाषाओं के निकट जाती है। इस दृष्टि से यह सिर्फ योग साधना का ग्रंथ नहीं, लोकभाषाओं में आध्यात्मिक और दार्शनिक चिंतन की अभिव्यक्ति की अहम कड़ी भी है।

अस्थल बोहर इसीलिए सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि नाथ परंपरा, लोकभाषा और हिंदी के आरंभिक साहित्यिक विकास की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कड़ी भी है।

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