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151वीं जयंती पर विशेष: यदि सरदार पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते तो...
सार
वर्ष 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का प्रसंग इस चर्चा का आधार है। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष का पद केवल संगठन का नेतृत्व नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता के बाद देश की सत्ता संभालने की दिशा भी तय कर रहा था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने सरदार पटेल के नाम का समर्थन किया था।
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सरदार वल्लभभाई पटेल
- फोटो : culture.gov
विस्तार
इतिहास में कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनका जवाब कभी नहीं मिल सकता, लेकिन उन पर विचार करना अपने समय को समझने का अवसर जरूर देता है। सरदार वल्लभभाई पटेल यदि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते और वर्ष 1950 में निधन के बजाय दस वर्ष और जीवित रहते तो आज भारत कैसा होता?
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क्या कश्मीर का इतिहास अलग होता? क्या चीन के प्रति हमारी नीति अधिक सतर्क होती? क्या देश का प्रशासन और आर्थिक विकास किसी दूसरी दिशा में आगे बढ़ता? 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर ये सवाल प्रासंगिक हो उठते हैं। यह सच है कि इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन इतिहास में दर्ज घटनाओं, नेताओं के विचारों और उनके फैसलों के आधार पर यह समझने की कोशिश जरूर की जा सकती है कि कुछ परिस्थितियां अलग होतीं तो देश की दिशा क्या हो सकती थी।
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यह एक परिकल्पना है, लेकिन पूरी तरह कल्पना पर आधारित नहीं। इसके पीछे पटेल का व्यक्तित्व, उनकी कार्यशैली और स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में लिए गए उनके फैसले हैं।
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वर्ष 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का प्रसंग इस चर्चा का आधार है। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष का पद केवल संगठन का नेतृत्व नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता के बाद देश की सत्ता संभालने की दिशा भी तय कर रहा था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने सरदार पटेल के नाम का समर्थन किया था।
जवाहरलाल नेहरू के नाम का किसी प्रांतीय समिति ने प्रस्ताव नहीं किया था, लेकिन महात्मा गांधी की इच्छा नेहरू को नेतृत्व सौंपने की थी। गांधीजी के आग्रह पर पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया और नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने। आगे चलकर वही स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। यह भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था।
पटेल और नेहरू, दोनों स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े नेता थे, लेकिन उनकी कार्यशैली और कई मुद्दों पर सोच अलग थी। पटेल व्यवहारिक फैसलों, प्रशासनिक दृढ़ता और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देते थे। यदि वे प्रधानमंत्री होते तो सरकार की प्राथमिकताओं और काम करने के तरीके में कुछ अंतर दिखाई दे सकता था।
आज सरदार पटेल को याद करते ही सबसे पहले रियासतों के एकीकरण का प्रसंग सामने आता है। स्वतंत्रता के समय देश में 560 से अधिक रियासतें थीं। उनके भारत में विलय का प्रश्न देश की एकता और अखंडता के लिए बड़ी चुनौती था। पटेल ने तत्कालीन गृह सचिव वी.पी. मेनन के साथ मिलकर संवाद, कूटनीति और दृढ़ फैसलों के माध्यम से इस चुनौती का सामना किया।
जूनागढ़ और हैदराबाद जैसे कठिन मामलों में उनकी भूमिका निर्णायक रही। जरा कल्पना कीजिए कि जिस नेता ने प्रधानमंत्री न रहते हुए इतनी बड़ी चुनौती का समाधान किया, वही देश का प्रधानमंत्री होता तो राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक समन्वय को कितनी प्राथमिकता देता।
संभव है कि राज्यों के बीच तालमेल, सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास और देश की आंतरिक सुरक्षा पर शुरुआती वर्षों में और अधिक ध्यान दिया जाता। केंद्र और राज्यों के संबंधों में भी उनकी प्रशासनिक सोच की छाप दिखाई देती।
पटेल मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था के महत्व को समझते थे। स्वतंत्रता के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के भविष्य पर सवाल उठ रहे थे। उस समय उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं को बनाए रखने का समर्थन किया। 21 अप्रैल 1947 को सिविल सेवा के अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने प्रशासन को देश का 'स्टील फ्रेम' बताया था।
उनका मानना था कि अधिकारी राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करें। यदि वे प्रधानमंत्री होते और वर्ष 1960 तक जीवित रहते तो प्रशासनिक अनुशासन, अधिकारियों की जवाबदेही और केंद्र-राज्य समन्वय पर उनका प्रभाव और अधिक दिखाई दे सकता था। सरकारी योजनाओं को समय पर लागू करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर विशेष जोर होता।
आज भी प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप, फैसलों में देरी और जवाबदेही की कमी जैसे सवाल उठते हैं। पटेल की सोच इन समस्याओं पर विचार करने का अवसर देती है।
पटेल के प्रधानमंत्री बनने की कल्पना में कश्मीर का सवाल सबसे अधिक उठता है। पटेल का मानना था कि कश्मीर का भारत में विलय हो चुका है। पाकिस्तान के कबायली हमले के बाद सैन्य कार्रवाई के जरिए स्थिति का समाधान किया जाना चाहिए। वे इस विवाद के अंतरराष्ट्रीयकरण के बजाय भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के पक्षधर थे।
चीन और तिब्बत के मामले में पटेल की चिंता कहीं अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है। 7 नवंबर 1950 को उन्होंने नेहरू को पत्र लिखकर तिब्बत में चीन की कार्रवाई और भारत की उत्तरी सीमाओं पर उसके संभावित प्रभावों को लेकर आगाह किया था। उन्होंने चीन की नीतियों को केवल पड़ोसी देश की गतिविधि नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न माना था।
यदि पटेल प्रधानमंत्री होते तो संभव है कि चीन के प्रति भारत का रुख अधिक सतर्क होता। हिमालयी सीमाओं पर सड़क, संचार और सैन्य सुविधाओं के विकास को पहले ही प्राथमिकता मिलती। तिब्बत के घटनाक्रम को भी अधिक गंभीरता से लिया जाता।
नेहरू के नेतृत्व में भारत ने बड़े बांधों, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों, वैज्ञानिक संस्थानों और पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए आधुनिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी। पटेल की सोच में कृषि, उद्योग, निजी उद्यम और प्रशासनिक व्यावहारिकता का महत्व दिखाई देता था। यदि वे प्रधानमंत्री होते तो संभव है कि कृषि उत्पादन बढ़ाने, निजी निवेश को प्रोत्साहित करने और उद्योगों के विकास में सरकारी तथा निजी क्षेत्र के बीच संतुलन बनाने पर अधिक जोर देते।
हालांकि, पटेल को सरकारी योजनाओं या बड़े उद्योगों का विरोधी मानना सही नहीं होगा। वे जानते थे कि स्वतंत्रता के बाद भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए उद्योग, कृषि और बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है। अंतर संभवतः विकास की प्राथमिकताओं और उन्हें लागू करने के तरीके में होता।
सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। 15 दिसंबर 1950 को उनका निधन हुआ। वे स्वतंत्र भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे। 31 अक्टूबर 2026 को उनकी 151वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए यह सवाल करना स्वाभाविक है कि यदि वे प्रधानमंत्री होते और दस वर्ष और जीवित रहते तो क्या भारत की तस्वीर अलग होती?
संभव है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासनिक अनुशासन, राज्यों के बीच समन्वय और राष्ट्रीय एकता के सवालों पर उनकी छाप अधिक गहरी होती। हालांकि, पटेल की महानता इस बात में नहीं है कि वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाए, बल्कि इस बात में है कि प्रधानमंत्री न होते हुए भी उन्होंने भारत की बुनियाद मजबूत करने में ऐसी भूमिका निभाई, जिसका महत्व आज भी बना हुआ है।
उन्होंने रियासतों को जोड़कर देश की राजनीतिक एकता सुनिश्चित की और प्रशासनिक संस्थाओं को मजबूत बनाने की दिशा दिखाई। उनका जीवन यह जरूर सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी राष्ट्रहित को प्राथमिकता देकर बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। उनकी जयंती पर यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है।
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