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पीओजेके की पीड़ा: भारत के खोए हुए भूगोल और सांस्कृतिक स्मृतियों को संजोना होगा
सार
पीओजेके केवल जम्मू-कश्मीर का नहीं, संपूर्ण भारत की राष्ट्रीय अस्मिता, अखंडता और सांस्कृतिक विरासत का विषय है। इस संदेश को देशभर में पहुंचाना होगा। आने वाली पीढ़ियों को पीओजेके के इतिहास, पैतृक भूमि और माता शारदा पीठ की विरासत से परिचित कराना होगा।
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यूकेपीएनपी का प्रदर्शन
- फोटो : ANI
विस्तार
जम्मू-कश्मीर रियासत का कुल क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किमी था, जिसकी सीमाएं तिब्बत, अफगानिस्तान और चीन से लगती थीं। आज इसमें से केवल 1,01,437 वर्ग किमी भारत के पास है। शेष क्षेत्र 1947 और 1971 में पाकिस्तान के हमलों के बाद उसके कब्जे में चला गया। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) का क्षेत्रफल 13,297 वर्ग किमी है, जिसमें मुजफ्फराबाद, नीलम, हत्तियां बाला, बाग, पुंछ, सुधनोती, कोटली, मीरपुर, भिम्बर और हवेली जिले आते हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पाकिस्तान अधिक्रांत ट्रांस लद्दाख 64,817 वर्ग किमी और अक्साई चिन व शक्सगाम सहित चीन अधिक्रांत ट्रांस लद्दाख 42,735 वर्ग किमी में फैला है।
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धरोहर, जो छूट गईं
इस क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थल हैं मंगलामाई मंदिर, बाबा बालाजी मंदिर, कीर्तनगढ़ गुरुद्वारा, दमदमा साहिब गुरुद्वारा, पुराना शिव मंदिर, बाणगंगा मंदिर और सनातन धर्म मंदिर। मुजफ्फराबाद क्षेत्र में गुरु हरगोबिंद जी के आगमन का उल्लेख मिलता है, और गोजरा का गुरुद्वारा छठी पातशाही उन्हीं के नाम से जुड़ा है। भिम्बर, मंगला और रामकोट के किले तथा पुराना मीरपुर शहर भी ऐतिहासिक धरोहर हैं।
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प्रमुख व्यक्तित्व, जिन्होंने किया संघर्ष
मीरपुर के सिख नेता और किसान आंदोलन के समर्थक सरदार बुध सिंह जम्मू-कश्मीर की प्रारंभिक प्रतिनिधिक राजनीति के प्रमुख चेहरे और स्वतंत्रता आंदोलन के सहभागी रहे। राजौरी के राजा पृथ्वीपाल, मीरपुरी मोहयाल ब्राह्मण योद्धा राजा महान सिंह, 1947 में मीरपुर के विधायक रघुनाथ चौधरी, मीरपुर के संपन्न सिख नेता सरदार जगत सिंह तथा संघ के स्वयंसेवक धर्मवीर खन्ना और रामप्रकाश चड्ढा ने कठिन संघर्ष किया।
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जमीन के साथ पहचान भी छूटी
1947 के युद्ध और कब्जे के बाद बड़ी संख्या में परिवारों को पैतृक घर, भूमि और संपत्ति छोड़नी पड़ी। भारत सरकार के अनुसार, 31,619 विस्थापित परिवार पंजीकृत हुए, जिनमें 26,319 जम्मू-कश्मीर में बसे और कुछ देश के अन्य हिस्सों में चले गए। जम्मू-कश्मीर लौटकर बसे 5,300 परिवारों को बाद में पुनर्वास योजना में शामिल किया गया। इन परिवारों ने शिक्षा, कृषि, व्यापार और सरकारी सेवाओं में जीवन फिर खड़ा किया और मुख्यधारा में योगदान दिया। उनकी स्मृतियों और मौखिक परंपराओं में पैतृक भूमि और सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवित है। यह विस्थापन केवल भौगोलिक नहीं था, बल्कि भूमि, संपत्ति, पहचान और स्मृति से जुड़े दीर्घकालिक प्रश्न की ऐतिहासिक घटना थी।
पीओजेके में फैल रही है असंतोष की आंच
पीओजेके आज गहरे मानवाधिकार और शासन संकट से गुजर रहा है। जून 2026 में रावलाकोट (पुंछ डिवीजन) में बिजली बिल, सब्सिडी वाले गेहूं और बेरोजगारी को लेकर जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेतृत्व में शुरू हुआ विरोध पूरे क्षेत्र में फैल गया। पाकिस्तान सरकार ने संगठन को प्रतिबंधित घोषित किया, और कार्यकर्ता शाहजेब हबीब की हत्या हुई। मीडिया रिपोर्टों में जून से अब तक 100 से अधिक मौतों और सैकड़ों घायलों की बात आई है, हालांकि आधिकारिक अनुमान कहीं कम हैं और पाकिस्तानी अधिकारी दावों को असत्यापित बताते हैं। कुछ गुटों ने प्रदर्शनों में तिरंगा लहराकर भारत से मानवीय सहायता की अपील की और नियंत्रण रेखा खोलने की मांग की। यह बेचैनी बताती है कि जनता की मांगें अब आर्थिक मुद्दों से आगे बढ़ चुकी हैं।
इस क्षेत्र का है गहरा रणनीतिक महत्व
गिलगित-बाल्टिस्तान की सीमा चीन के शिनजियांग और अफगानिस्तान के वाखान गलियारे से लगती है। यह क्षेत्र चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का अहम रास्ता है, जो ग्वादर बंदरगाह को चीन से जोड़ता है। झेलम और उसकी सहायक नदियां पीओजेके से गुजरती हैं और सिंधु का बड़ा हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान में बहता है। ये नदियां पाकिस्तान की ऊर्जा और कृषि व्यवस्था के लिए अहम हैं।
अपनी स्मृतियों को संजोना होगा
पीओजेके केवल जम्मू-कश्मीर का नहीं, संपूर्ण भारत की राष्ट्रीय अस्मिता, अखंडता और सांस्कृतिक विरासत का विषय है। इस संदेश को देशभर में पहुंचाना होगा। आने वाली पीढ़ियों को पीओजेके के इतिहास, पैतृक भूमि और माता शारदा पीठ की विरासत से परिचित कराना होगा। प्रतिवर्ष एक दिन विस्थापित परिवारों के इतिहास, संघर्ष और विरासत की स्मृति को समर्पित करना होगा। शारदा पीठ के इतिहास और धार्मिक महत्त्व के प्रचार-प्रसार और संरक्षण के प्रयास करने होंगे। अपनी जड़ों, पैतृक भूमि और सांस्कृतिक पहचान को कभी न भूलना और पुनः जुड़ाव की आशा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखना ही संकल्प है। जो धरती पूर्वजों से छूट गई, उसे स्मृतियों में जीवित रखेंगे और पीओजेके वापस लेकर रहेंगे।