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एक दीया उम्मीद के चौराहे पर भी: अपनी ऊर्जा का उपयोग मां लक्ष्मी की प्रसन्नता, परिवार की सदोन्नति के लिए करें

Fri, 01 Nov 2024 07:22 AM IST
ज्योति भास्कर शिव प्रकाश पाराशर, ज्योतिष आचार्य एवं वास्तु मर्मज्ञ
शिव प्रकाश पाराशर, ज्योतिष आचार्य एवं वास्तु मर्मज्ञ Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 01 Nov 2024 07:22 AM IST
सार

दीये की लौ हमेशा अपने साथ उम्मीद लेकर आती है। हमें अंधकार से लड़ने की ताकत देती है और हमारे सपनों को रास्ता दिखाती है। आएं, इस दीपावली ढेर सारे दीप जलाएं और सपने देखें।

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Diwali 2024 lit diya at crossroads of hope Use energy for blessings of Godess Lakshmi and well-being of family
दिवाली में लक्ष्मी पूजन का महत्व - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दीपावली केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। सामाजिक रूप से देखें तो यह त्योहार अच्छाई की बुराई पर, प्रकाश की अंधकार पर और ज्ञान की अज्ञान पर विजय का प्रतीक है। यह हमें भाईचारे, एकता और मेल-मिलाप का संदेश भी देता है। इस दौरान लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, घर को सजाते हैं, एक-दूसरे के घर मिठाइयां और उपहार भेजते हैं और मिलकर खुशियां मनाते हैं। दीपावली समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है। अगर आर्थिक दृष्टिकोण से इसको देखा जाए तो यह वो समय होता है, जब लोग नए वस्त्र, आभूषण और अन्य सामान खरीदते हैं। व्यापारियों के लिए यह वर्ष का सबसे व्यस्त और लाभकारी समय होता है। इस अवसर पर नए व्यापारिक उपक्रम शुरू किए जाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि की बात करें तो दीपावली हमें आत्मनिरीक्षण और आत्मसाक्षात्कार का अवसर देती है। जैसे दीपक अंधकार को मिटाता है, वैसे ही यह त्योहार हमें अपने भीतर के अज्ञान, क्रोध, मोह, शोक, संताप और अहंकार रूपी अंधकार को दूर करने का अवसर देता है। यह त्योहार एकत्र परिवारों से अलग हो रहे एकल परिवारों को फिर से एक साथ मुस्कुराने का अवसर देता है। निश्चित रूप से जो त्योहार आपस में दूर हो रहे परिवारों को पास ला सके, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है।
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तिथि को लेकर भ्रमित न हों
देश के विभिन्न विद्वानों में दीपावली की तिथि को लेकर मतभेद चल रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि अमावस्या केवल 31 अक्तूबर को ही अर्धरात्रि में व्याप्त है, इसलिए 31 अक्तूबर को दीपावली का पर्व मनाना चाहिए। शास्त्र में यह भी उदाहरण मिलता है कि ‘आषाढ़ी श्रावणी वैत्र फाल्गुनी दीपमालिका। नन्दा विद्धा न कर्तव्या कृते धान्यक्षयो भवेत्।।’ यदि अमावस्या नंदा तिथि अर्थात प्रतिपदा से व्याप्त हो तो उसे त्याग देना चाहिए। यदि इस मत को देखा जाए तो 31 अक्तूबर को दीपावली पर्व मनाना चाहिए। मगर कुछ विद्वानों का मानना है कि ‘दिनद्वये सत्त्वाऽसत्त्वे परा’ दो दिन तिथि होने पर दूसरे दिन की तिथि का ही ग्रहण करें। ‘यां तिथिं समनुप्राप्य उदयं याति भास्करः। सा तिथि सकला ज्ञेया पूजाध्ययन कर्मसु।।’ अर्थात जिस तिथि में सूर्योदय होता है, उस तिथि को पूजा, स्नान, व्रत, दान, अध्ययन आदि के लिए पूरे दिन (अहोरात्र) समझना चाहिए।
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अब प्रश्न यह है कि साधारण व्यक्ति किस दिन दीपावली का पूजन करे? ताकि मां लक्ष्मी प्रसन्न हो सकें। हमें इस बात को समझना होगा कि दीपावली आराधना, भक्ति और दिलों को पास लाने का त्योहार है। यदि लोग तिथि को लेकर संशय में ही पड़े रहे तो मन में शांति प्राप्त करके दीपावली कब मनाएंगे? महर्षियों द्वारा शास्त्रों का निर्माण समस्या नहीं, समाधान प्राप्त करने के लिए किया गया है। इसलिए हमें यह समझना जरूरी है कि किसी भी पर्व, खासकर दीपावली का वास्तविक महत्व क्या है। मां लक्ष्मी को दीपों का झिलमिल प्रकाश आकर्षित करता है और तभी भू लोक पर मनुष्यों के घर में उनका आगमन होता है। इसी को ध्यान में रखकर हमें श्रद्धापूर्वक मां लक्ष्मी का पूजन करना चाहिए।
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दो दिन दीपों से जगमग
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- ‘सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।’ अर्थात हे कुंती पुत्र अर्जुन! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए। परंतु यदि विषय मुहूर्त का है तो जो लोग सरलता आैर सहजता से 31 अक्तूबर को पूजन करना चाहते हैं, वे शाम 6:23 से 8:19 बजे तक कर सकते हैं। जो लोग 1 नवंबर को पूजन करना चाहते हैं, वे 5:36 से 6:16 बजे तक पूजन कर सकते हैं। वास्तव में यह भ्रम का नहीं, बल्कि प्रसन्नता का विषय है कि हमें एक नहीं, बल्कि दो दिन माता लक्ष्मी का पूजन करने का अवसर मिल रहा है। जिस धनलक्ष्मी की इच्छा हमें पूरे वर्ष भर रहती है, उस लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिए हमें दो-दो पुण्य अवसर मिल रहे हैं। इस बार देश केवल एक दिन ही नहीं, बल्कि दो दिन दीपों से जगमगाएगा। ऐसे में अपनी ऊर्जा का उपयोग मां लक्ष्मी की प्रसन्नता, घर में सुख, संपत्ति और धन प्राप्त करने के लिए विघ्नविनाशक गणपति के पूजन, विद्या, बुद्धि और अपने परिवार की सदोन्नति करने के लिए करें।


कैसे करें पूजा
दीपावली समरसता और प्रेम का प्रतीक है। यह पर्व हमारे धर्म, पंथ, समाज, संस्कृति, सभी को एक साथ जोड़ता है। पूजा करने के लिए सबसे पहले गणेश जी और लक्ष्मी जी की मूर्तियों को स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें। इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य, फल, मिष्ठान और पुष्प अर्पित करके आरती करनी चाहिए। इसके बाद परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित करना चाहिए। भारत में प्रत्येक त्योहार कोई न कोई सीख जरूर देता है। दीपावली पर्व हमें सिखाता है कि यदि हम सब एकत्रित हैं तो दीये जलाकर अमावस्या की रात को पूर्णिमा की रात से भी अधिक सुंदर बना सकते हैं।
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