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मेरी पहली यात्रा: अनुभव के अंतर्जगत् में स्वप्न और संसार के पथिक का रोजनामचा

Tue, 22 Sep 2026 09:57 AM IST
Dhananjay Tiwari धनंजय तिवारी
Updated Tue, 22 Sep 2026 09:57 AM IST
सार

जब मैं अपनी जन्मभूमि से विदा लेकर निकला, तब रास्ते में मुझे मेरे विद्यालय के अध्यापक दिखाई पड़े। उनसे सीधे बातचीत तो नहीं हुई, परंतु मेरे अंदर का शिष्य-भाव जाग उठा और मैंने मन ही मन उन सभी को प्रणाम किया और आगे बढ़ता रहा।
 

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Solo Journey from Lucknow to Jaipur: Unforgettable Travel Story of Life, Struggles and Human Connection
लखनऊ से जयपुर के सफर का अनुभव - फोटो : Ai

विस्तार

दोपहर के करीब 2 बजे थे। मैं पीठ पर आसानी से ले जाने वाली एक बैग में यात्रा से संबंधित कुछ जरूरी कागज, कपड़े और खाने का सामान लेकर, अपने माता–पिता का आशीष, छोटे भाई-बहन का स्नेह और अपनी जन्मभूमि को प्रणाम करके अपने गांव से बड़े ही उत्साह के साथ राजाओं की भूमि कहे जाने वाले राज्य राजस्थान में जयपुर के लिए निकल पड़ा। यह यात्रा मेरे जीवन की पहली यात्रा थी जिसे मुझे अकेले ही सफर करना था। वहां न कोई मुझे जानता था और ना ही मैं, इसीलिए मन में हल्का सा तनाव भी था कि वहां कैसे रहूंगा, क्या करुंगा आदि प्रश्न दिमाग में उथल–पुथल मचाए हुए थे। उधर मेरा अंतर्मन ये कह रहा था कि तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि भले ही तुम भौतिक रूप से अकेले हो। परन्तु तुम्हारे साथ कुल तीन लोग हैं।

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(मन में ही मैं खुद से ही सवाल करता हूं.......)

कौन है ये तीन लोग? 

अंतर्मन उत्तर देता है और कहता है कि तुम्हारे साथ पहले तो तुम खुद हो, दूसरी है ये प्रकृति और तीसरे वो हैं जो अखिल विश्व के रचयिता, पालनकर्ता और प्रलयकर्ता जो सृष्टि के कण–कण में व्याप्त, सर्वत्र विश्व को चलायमान करने वाले, आदि–अनंत, समस्त चराचर जीवों में उपस्थित है, जिनके श्रेष्ठ पुत्रों में से एक तुम भी हो। इसीलिए मैं तुमसे कहता हूं, "तुम किसी भी तरह का तनाव न लेकर प्रसन्नचित होकर यात्रा का आनंद लो और अपना ज्ञानवर्धन करो इसी में तुम्हारा हित है।"
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जब मैं अपने अंतर्मन से उत्पन्न ऐसे विचारों को समझा, मैं गदगद हो गया खुशी के मारे।

कुछ ही पल बीते थे, मुझे एक बात याद आई जिस क्षण मैं अपनी जन्मभूमि से यात्रा के लिए निकल रहा था उसी समय आभास हुआ था कि मैं ऐसी–वैसी जगह नहीं जा रहा हूं बल्कि मैं जीवन के उस कुरुक्षेत्र में उतर रहा हूं जहां आज हर एक मानव पहले से ही युद्ध कर रहा है। इस विचार के आते ही मेरे अन्दर का योद्धा जाग उठा, इसका कारण है कि मैंने महाभारत देखी है उसमें मैने अर्जुन की वीरता देखी है, जब वो कहता है कि जब अर्जुन के बाणों की वर्षा होगी तो अग्नि बरसेगी......
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इसी तरह के विचार आते गए और मैं परेशान होने की जगह अंदर ऊर्जावान होता गया।

अध्यापक से मुलाकात

जब मैं अपनी जन्मभूमि से विदा लेकर निकला, तब रास्ते में मुझे मेरे विद्यालय के अध्यापक दिखाई पड़े। उनसे सीधे बातचीत तो नहीं हुई, परंतु मेरे अंदर का शिष्य-भाव जाग उठा और मैंने मन ही मन उन सभी को प्रणाम किया और आगे बढ़ता रहा, जिस तरह घड़ी का समय बिना किसी का इंतजार किए अपनी गति से चल रहा था, ठीक उसी प्रकार मैं भी समय को ध्यान में रखते हुए अपनी गति से आगे बढ़ रहा था; क्योंकि मुझे समय से ट्रेन पकड़नी थी। अब मैं अपने गांव से निकलकर लखनऊ के चारबाग़ स्टेशन पर पहुंचा, जहां से मुझे शाम 3:55 बजे वाली ट्रेन 'आगरा इंटरसिटी' में सवार होना था।

मैं समय से पहले ही स्टेशन जा पहुंचा और वहां की चहल-पहल का जायज़ा लेने लगा। यात्रियों के बैठने वाली बेंच पर एक जगह खाली दिखी, तो मैं वहां जाकर बैठ गया और ट्रेन के आने का इंतज़ार करने लगा।

कुछ देर बैठने के बाद मुझे प्यास लगी। बैग से बोतल निकालने के लिए मैं जैसे ही मुड़ा, मेरी नजर बैग की खुली हुई चैन पर पड़ी। पलभर के लिए मैं भीतर तक हिल गया, क्योंकि बैग की उसी पिछली ज़िप में मेरे पास ₹5,000 रखे थे, जिन्हें आपातकालीन स्थिति के लिए रखा था। डर के बावजूद मैंने संयम बनाए रखा, बोतल निकाली और थोड़ा पानी पिया। आसपास कई लोग बैठे थे, इसलिए वहां पूरे बैग की तलाशी लेना मुझे ठीक नहीं लगा।

बोतल वापस रखते हुए मैंने चुपके से हाथ पीछे की ज़िप में डाला, पैसे सुरक्षित महसूस हुए। मुझे आभास हुआ कि सब कुछ सामान्य है और रास्ते में शायद किसी खिंचाव या दबाव के कारण चैन यूं ही खुल गई होगी। ऐसा महसूस होते ही मन को शांति मिली और मैंने चैन बंद कर दी, तभी ट्रेन के आने का समय हो गया और वह अपने निर्धारित प्लेटफॉर्म पर आकर खड़ी हो गई। मैं अपनी आरक्षित सीट ढूंढते हुए डिब्बे के भीतर पहुंचा और अपना बैग रखकर पानी की बोतल निकाल ली। सौभाग्य से मुझे खिड़की वाली सीट मिली थी, जहां से बाहर के बदलते नज़ारों का आनंद लिया जा सकता था।

ट्रेन रफ्तार से रोमांच का अनुभव

इधर ट्रेन ने अपनी हुंकार भरी और लोहे वाले पैरों को हल्की सी गति दी। ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। बाहर का मौसम बेहद खुशनुमा था, आकाश में हल्के काले बादल छाए थे और हवा में एक मीठी सी सोंधी सुगंध थी, जो दिमाग की सारी थकान हर ले। खिड़की वाली सीट पर बैठने का अपना ही सुकून होता है; बाहर से आती हवा का स्वच्छंद प्रवाह मन को प्रसन्न कर रहा था। जैसे-जैसे ट्रेन रफ्तार पकड़ रही थी, वैसे-वैसे इस 'जीवन रूपी रणभूमि' का रोमांच मुझे भीतर से ऊर्जावान बना रहा था। अगर एक शब्द में कहूं, तो बिना किसी बाहरी प्रदर्शन या दिखावे के, मैं भीतर से पूरी तरह आनंदित था।

अब ट्रेन अपनी गति पकड़ रही थी और एक समय बाद इसकी गति 100 किलोमीटर प्रति घंटे के आसपास पहुंच गई। मैं लगातार बाहर की ओर ही देख रहा था, क्योंकि बाहर फैली चारों तरफ़ की हरियाली और भीनी-भीनी हो रही बारिश की बूंदें मेरे चेहरे को छू रही थीं। बाहर दिखने वाली सारी चीज़ें मस्तिष्क में ऐसे छप रही थीं मानो मेरा खुद का दिमाग नहीं; कोई स्कैनर हो।

मेरे चेहरे पर गिरती बारिश की छोटी-छोटी बूंदें मुझे कुछ अजीब सा आभास करा रही थीं। मैंने समझने का प्रयास किया कि ये बूंदें आख़िरकार क्या बताना चाह रही हैं। मैंने दिमाग पर ज़ोर दिया, वो कह रही थीं कि "जिस तरह मैं तुम्हारे चेहरे से टकराकर तुम्हें प्राकृतिक खुशी का अनुभव करा रही हूं वैसे ही किसी व्यक्ति के जीवन के संघर्षों के दिनों में उसकी सहायता करना, या उसकी हृदय से सहायता करना, उस व्यक्ति को प्राकृतिक प्रसन्नता का अनुभव कराती है।”

अगर मैं सच बताऊं तो मैं उस समय रोमांच में इतना ज़्यादा खो रहा था, साथ ही मन ही मन में कामना कर रहा था कि यह ट्रेन अपनी तेज गति से चलती रहे; बस चलती रहे! मैंने यह देखने का प्रयास ही नहीं किया कि मेरे बगल में कौन बैठा है और कौन नहीं? और वैसे भी क्या फर्क पड़ता है कि कौन बगल में बैठा है और कौन नहीं, जब बाहर का प्राकृतिक सौंदर्य इतना सुहावना और मनमोहक हो! सहयात्री तो कुछ समय के लिए एक-दूसरे के मेहमान होते हैं, बातें शेयर करते हैं और गंतव्य स्थान आने पर वे भी साथ छोड़ देते हैं।

गंगा नदी को पार करते हुए मां यमुना तक
अब ट्रेन मां गंगा की धारा को पार कर रही थी, मैंने दोनों हाथ जोड़कर भाव के साथ गंगा मइया को प्रणाम किया। ट्रेन अपनी गति से लगातार आगे बढ़ती ही जा रही थी। गंगा मइया को पार करके ट्रेन कानपुर सेंट्रल स्टेशन होते हुए फफ़ूंद, इटावा, फ़िरोज़ाबाद और टूंडला स्टेशनों को पार करती हुई यमुना मइया के तट तक आ पहुंची; मैंने मां यमुना को अंतर्मन से भावपूर्वक प्रणाम किया। इसी के साथ ट्रेन आगरा के किले का नज़ारा दिखाते हुए अपने गंतव्य स्थान 'आगरा फोर्ट स्टेशन' पर रात 9:46 बजे पहुँचती है, जहां मुझे उतरना था और रातभर के लिए आगरा में शरण लेनी थी। 

मुझे याद आया कि आगरा फोर्ट स्टेशन के पास में ही एक जैन धर्मशाला है, क्योंकि मैं कई साल पहले यहाँ एक बार रुका था। रात का समय था, 9:52 बज रहे थे। मेरा अवचेतन मन कह रहा था कि धर्मशाला तो 10:00 बजे रात में बंद हो जाती है, इसीलिए मैं धर्मशाला की ओर तेज़ी से बढ़ा, क्योंकि धर्मशालाएं अपने नियत समय से ही खुलती और बंद होती हैं। आगरा फोर्ट स्टेशन से धर्मशाला की दूरी महज 1.5 किमी होगी, यही कारण था कि मुझे तेज़ी से चलकर वहाँ पहुँचना था।

रात 10:04 पर मैं धर्मशाला पहुंच गया। वहां मेरी पहली नज़र धर्मशाला की समय-सारणी पर पड़ती है, तब मुझे समझ आता है कि खुलने का समय सुबह 5:30 बजे है और बंद होने का समय रात के 10:30 बजे है। मैंने धर्मशाला के रजिस्टर में अपनी प्रवेश-प्रविष्टि दर्ज करवाई। इसके बाद मुझे अपने रुकने का स्थान मिल गया। रात का समय हो रहा था और भूख भी लगी थी, इसीलिए मैं खाने के उद्देश्य से धर्मशाला के बाहर आया और एक होटल से कुछ खाने का सामान लेकर वापस आ गया। रात का भोजन करके मैं मस्त सो गया।

सुबह मेरी आँख खुली, बगल में रखा फ़ोन उठाया और समय देखा, सुबह का 4:28 हो चुका था। मैं तुरंत उठ गया। प्रातःकालीन शौच-स्नान की क्रियाओं को संपन्न किया, इसके बाद मैंने बैग में रखी मिठाई खाई और पानी पिया। अब समय 5:24 AM हो रहा था। मैं इंतज़ार कर रहा था कि जल्द से जल्द गेट खुले और मैं स्टेशन की ओर चलूँ, क्योंकि आज ही वह दिन था जब मुझे राजाओं की भूमि राजस्थान के जयपुर पहुँचना था।

अगली ट्रेन का सफर

जैसे ही गेट खुला, मैंने रजिस्टर पर अपने हस्ताक्षर किए और स्टेशन की ओर निकल पड़ा, क्योंकि अगली ट्रेन (अजमेर-इंटरसिटी एक्सप्रेस) सुबह 6:00 बजे थी। मैं समय से स्टेशन पर पहुँच गया। ट्रेन वहाँ पर खड़ी ही हुई थी, मैंने ट्रेन के अन्दर जाकर अपनी आरक्षित सीट पर अपना स्थान ग्रहण कर लिया। जिस समय मैं अपनी सीट पर बैठा था, उस वक्त 5:56 बज रहे थे और मज़े की बात यह थी कि जो मुझे सीट मिली, वह खिड़की वाली थी। इसीलिए मैं बाहर के नज़ारों का आनंद ले सकता था।

कुछ ही पलों बाद ट्रेन मेरे गंतव्य स्थान की ओर बढ़ने लगी। उधर इंद्रदेव भी भीनी-भीनी पानी की बौछारों के साथ बारिश कराने लगे; ऐसा लग रहा था मानो इंद्रदेव मेरा स्वागत कर रहे हों। मैं भी सुबह की इस बारिश का आनंद लेने लगा। ट्रेन आगरा फोर्ट स्टेशन और अछनेरा जंक्शन से होते हुए अगले स्टेशन भरतपुर जंक्शन की ओर बढ़ रही थी। जब से ट्रेन अपने शुरुआती बिंदु से चली थी, तब से लेकर अछनेरा जंक्शन तक मेरा कोई सहयात्री ही नहीं बना था।

Solo Journey from Lucknow to Jaipur: Unforgettable Travel Story of Life, Struggles and Human Connection
लखनऊ से जयपुर के सफर का अनुभव - फोटो : Ai

अब ट्रेन भरतपुर जंक्शन पर आकर रुकी। कुछ समय बाद एक यात्री अपनी सीट खोजते हुए मेरी सीट के बगल में आकर बैठ गया। मैं उसे देख रहा था और उसने मुझे देखा। हम दोनों प्रसन्न थे। मुझे ऐसा कुछ अनुभव नहीं हुआ कि उसे देखकर मुझे अजीब लगे या उसे मुझे देखकर। अब ट्रेन अपने अगले स्टेशन की ओर बढ़ने लगी। तभी मेरा सहयात्री एक प्रश्न पूछता है,

सहयात्री: "कॉलेज जा रहे हो?"
(मेरे दिमाग में यही आया कि उसने ऐसा प्रश्न क्यों किया? क्या मैं वास्तव में एक विद्यार्थी की तरह दिख रहा हूँ, जबकि मैंने एक लोअर और टी-शर्ट पहनी हुई थी।)
बिना एक पल गँवाए जवाब देता हूँ…

मैं: "नहीं, मैं परीक्षा देने जा रहा हूँ।"
सहयात्री: "अच्छा।"

सहयात्री: "कौन-सी परीक्षा है? सेंटर कहाँ गया है?"
मैं: "सर, मेरी RPSC 2nd grade वरिष्ठ अध्यापक की परीक्षा है, इसीलिए मैं जयपुर जा रहा हूँ।"

सहयात्री: "बहुत बढ़िया! वैसे कहाँ से आ रहे हो?"
मैं: "मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश से आ रहा हूँ।"

सहयात्री: "यह ट्रेन तो लखनऊ से नहीं आ रही है।"
मैं: "मैं कल रात को लखनऊ से आगरा आ गया था।"

सहयात्री: "अच्छा, पूरी रात आगरा स्टेशन पर बिताई?"
मैं: "अरे नहीं, स्टेशन के पास में एक जैन धर्मशाला है, मैं वहीं चला गया था। रात भर वहाँ रहा और सुबह होते ही स्टेशन पर आकर ट्रेन पकड़ ली।"

सहयात्री: "हुँ..."
(अब सहयात्री स्वतः ही अपनी बात करने लगता है।)

सहयात्री: "मैं UP में एक कंपोजिट स्कूल में अध्यापक हूँ।"
मैं: "अच्छा।"

(मेरे मन में विचार आया कि आज कितना बढ़िया अवसर मिला है! अभी तक सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर जितने भी प्रश्न मेरे दिमाग में थे, क्यों न सहयात्री से पूछ लूँ? क्योंकि मैंने सरकारी विद्यालयों में कक्षा 1-5 और 11-12 तक अध्ययन किया है और बहुत ही करीब से सरकारी स्कूल की व्यवस्था को देखा है। मुझे ऐसा लगता था कि सरकारी स्कूल की शिक्षा व्यवस्था खराब होने की असली जड़ ये सरकारी शिक्षक ही हैं। अब मैं ही बात को आगे बढ़ाता हूँ... और अपने बोलने के ढंग में थोड़ा-सा परिवर्तन कर देता हूँ।)

मैं: "सर, आप कौन-कौन सी कक्षाओं में पढ़ाते हैं?"
सहयात्री: "मैं 6 से लेकर 8 तक की कक्षाओं को देखता हूँ।"

(मैंने गर्दन हिलाकर हुँकारी भरी।)

मैं: "सर, आप तो विद्यालय में आराम करते होंगे, बच्चे पढ़ते नहीं होंगे, है न?"
सहयात्री: "बताओ क्या करेंगे? बच्चे स्कूल तो आते हैं, पर उनके पास न पढ़ने के लिए किताबें हैं, न कॉपियां हैं; यहां तक कि बच्चे पेन-पेंसिल लाना तक भूल जाते हैं। जब तक बच्चों के पास न्यूनतम शिक्षा प्राप्ति के लिए न्यूनतम साधन नहीं होंगे, तब तक मैं अपना बेहतर शिक्षण कार्य कैसे कर सकता हूं?"

मैं: "सर, बच्चों के पास ऐसी समस्या क्यों है?"
सहयात्री: "ऐसी समस्याओं का कारण उनके माता-पिता ही हैं। हाँ, कुछ गिने-चुने अभिभावक हैं जिनके बच्चे थोड़ा लिखना-पढ़ना जानते हैं, परंतु ज्यादातर बच्चों के अभिभावक उन पर ध्यान ही नहीं देते।"

(सहयात्री आगे कहता है...)

सहयात्री: "सरकार बच्चों को साप्ताहिक भोजन, पढ़ने के लिए किताबें और यहाँ तक कि 1,200 रुपये की छात्रवृत्ति उपलब्ध करवाती है। यह छात्रवृत्ति इसीलिए मुहैय्या करवाई जाती है ताकि अभिभावक अपने बच्चों की आवश्यकताओं जैसे, पेन-पेंसिल, रबर-कटर आदि चीजें उपलब्ध करा सकें। परंतु अभिभावक इसके विपरीत छात्रवृत्ति अपने कार्यों के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं।"
मैं: "हुँ।"

मैं: "सर, आप इस मुद्दे पर कुछ नया (Innovation) क्यों नहीं करते, ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके?"
सहयात्री: "ऐसा नहीं है कि मैंने कोशिश नहीं की। मैंने बच्चों को लिखने के लिए पेन और कॉपियाँ दीं, परंतु बच्चे 1-2 दिन में ही वह कॉपी और पेन गायब कर देते, फाड़ देते या फिर उन्हें कबाड़ी के हाथों बेचकर कुछ खा लेते हैं।"

(सहयात्री आगे कहता है...)

सहयात्री: "एक दिन ऐसा हुआ, मैं कक्षा में पढ़ाने गया। मेरे पास एक पैकेट नीले पेन थे, मैंने पांच बच्चों को पेन दे दिए। उस दिन एक और बच्चे को पेन की आवश्यकता थी, परंतु मेरे पास अनुपलब्धता थी। पता है अगले दिन क्या होता है? उस बच्चे का पिता मेरे पास आकर कहता है कि 'सर, आपने यह ठीक नहीं किया; आपने दूसरे बच्चों को पेन दिए, परंतु मेरे बच्चे को पेन नहीं दिया।' अब बताओ, मैं क्या करूँ?"

(सहयात्री की बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। अब मेरे पास कोई प्रश्न ही नहीं बचा था।)
(सहयात्री खुद से बात को आगे बढ़ाता है...)

सहयात्री: "मेरी उम्र अभी 49 साल की है, और मैं तुमसे एक बात साझा (share) करना चाहता हूँ।"
मैं: "जी, बताइए!"

सहयात्री: "जितने भी व्यक्ति 50 साल के आसपास के होते हैं, उनके अंदर कोई अभिप्रेरणा (Motivation) नहीं होती। मान लो कोई 50 साल वाला व्यक्ति व्यापार में लग जाए, तो वह व्यापार नहीं कर पाएगा; क्योंकि इस उम्र में वह अभिप्रेरणा नहीं रहती जो 25-30 की उम्र में होती है। 50 की उम्र में तो बुद्धि भी मंद पड़ने लगती है। उस व्यक्ति को लगता है कि मैंने तो पूरा जीवन जी लिया है।”

मैं: "हाँ..." (बिना बोले हुँकारी भरी)
मैं: "नहीं सर, ऐसा नहीं है। मैं मानता हूँ कि 50 की उम्र में अभिप्रेरणा (Motivation) नहीं रहती, यह बिल्कुल सही बात है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि जिस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है, वह यह सोचता है कि भगवान का दिया बहुत कुछ है, मुझे अब काम करने की ज़रूरत नहीं। परंतु जिस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती, वह यह सोचता है कि जब अब तक 50 की उम्र में इतना नहीं कमा पाया, तो जीवन के अंतिम 10-15 वर्षों में कितना ही कमा पाऊँगा! इसीलिए ऐसे व्यक्ति अपने पुत्र-पुत्री पर निर्भर हो जाते हैं। यही कारण है कि उनके जीवन में कुछ नया करने की अभिप्रेरणा नहीं होती।"

(सहयात्री मेरी बात सुन रहा था और सहमति प्रकट करने के लिए गर्दन हिलाकर 'हाँ' कहा।)
(अब मैं ही बात को आगे बढ़ाने लगा और कहता हूँ...)

मैं: "सर, मेरी सबसे बड़ी समस्या यही है कि मैं बहुत ज़्यादा सोचता हूँ (Overthinking करता हूँ), जिसके कारण मेरा ध्यान एक जगह केंद्रित नहीं हो पाता।"
सहयात्री: "Overthinking को दूर करने के लिए तुम्हें सुडोकू या चेस खेलना चाहिए, लेकिन तब जब तुम्हारा दिमाग ज़्यादा विचार करे। इससे तुम्हारा दिमाग एक जगह पर आ जाएगा और तुम सामने वाले की अगली 10-15 चालों के बारे में सोच पाओगे।"

("तुम सामने वाले की अगली 10-15 चालों के बारे में सोच पाओगे।"यह महज एक वाक्य नहीं, यह एक ऐसी सोच है जिसे खुद से नियंत्रित किया जाए, तो आप अपने आसपास की चीज़ों को नियंत्रित कर सकते हैं। अर्थात आप खुद नियंत्रक को नियंत्रित कर पाएँगे।)

(सहयात्री आगे कहता है...)

सहयात्री: "यह जो 21-30 वाली उम्र है, इसमें दिमाग को जितना ट्रेन करोगे, उतना ही अच्छा होगा।"
मैं: "बिल्कुल सर, मैं ज़रूर प्रयास करूँगा।"

गंतव्य आने वाला था

इसके बाद हम दोनों काफी देर तक शांत रहे। मैं बाहर के नज़ारों को देखता रहा और आनंदित होता रहा। ट्रेन एक के बाद एक स्टेशन को पार करके आगे बढ़ रही थी। कुछ समय बाद हम दोनों का गंतव्य 'जयपुर' आने वाला था। तभी मेरी सीट वाली पंक्ति के बगल में एक किन्नर आती है और मुझसे कहती है……

किन्नर: "बेटा, जल्द ही तुम्हारी मनपसंद नौकरी मिले।"
(उसका सीधा-सा मतलब था कि मैं उसे कुछ रुपये दे दूँ। मैंने दोनों हाथ जोड़कर किन्नर से कहा...)

मैं: "जब मेरी जॉब लग जाएगी, तब मैं आपको रुपये दूँगा।"
(मेरी बात सुनकर किन्नर आगे बढ़ जाती है।)

सहयात्री: "देखो, अब तो तुम्हें किन्नर का आशीष भी मिल गया।"
(मैं तो मुस्कुरा रहा था।)

सहयात्री: "आओ, चलो आगे चलते हैं।"
मैं: "सर, अभी ट्रेन जयपुर में 10 मिनट रुकेगी, आराम से उतर जाएँगे।"

परंतु सहयात्री उतरने के लिए अपनी सीट छोड़कर आगे चला गया। भीड़ काफी थी, इसीलिए वह भीड़ में शामिल हो गया। मैं अपनी सीट पर बैठा रहा और ट्रेन के रुकने का इंतज़ार करने लगा। जब ट्रेन स्टेशन पर बस रुकने ही वाली थी, मैंने बैग को संभाला और अपनी सीट पर खड़ा हो गया। तभी मेरी नज़र सहयात्री पर पड़ती है। हम दोनों कोच की विपरीत दिशाओं में उतरने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, क्योंकि भीड़ काफी थी।

अचानक से हम दोनों की नज़रें टकराती हैं। सहयात्री मुझे देखकर मुस्कुराते हुए हौसला बढ़ाते हैं और अपने होंठों को हिलाते हुए कहते हैं—‘ALL THE BEST’, साथ ही 'Thumbs up' वाला अंगूठा दिखाते हैं। जिसे मैं भी बड़े आदर के साथ सीने पर हाथ रखकर, सम्मानपूर्वक बिना आवाज़ के "Thank you" बोलता हूँ। इसके बाद हम दोनों अपने-अपने गंतव्य और अपनी नियति की ओर बढ़ चले।

जब तक मैं ट्रेन में था, तब तक मेरे रास्ते तय थे। लेकिन जैसे ही मैं प्लेटफ़ॉर्म से बाहर आया, पूरा का पूरा शहर मेरे लिए अनजान था। मुझे नहीं पता था कि मुझे किस दिशा में जाना है और किससे सहायता माँगनी है।

मैं प्लेटफ़ॉर्म से बाहर आने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ता हूँ। जैसे ही मैं प्लेटफ़ॉर्म से बाहर आया, मेरे दिमाग की बत्ती जली और केवल दो बातें समझ में आईं कि आगे मुझे क्या करना है: पहली बात: बेवजह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाना है। दूसरी बात: रहने के लिए एक अच्छा सा कमरा जो उचित दाम में हो, लेना है।

मैंने 17 तरह के होटल देखे, उनके कमरों की हालत देखी, परंतु वे सभी मेरे बजट से बाहर थे। इसके बाद जब मैंने 18वें होटल का कमरा जाकर देखा, तो वह मुझे ठीक लगा और मैंने इसे अपना अंतिम विकल्प माना। यहीं पर रहकर आराम किया और 2 दिन इसी में गुज़ारे। थोड़ी ही दूर पर भोजन के लिए भोजनालय थे, चाय-पानी की व्यवस्था थी, इसीलिए मैंने इसका लाभ उठाया।

किसी को परवाह नहीं

करीब शाम के 7:00 बज रहे थे, तब मेरे मन में उथल-पुथल मची। इसका कारण था कि मैंने अपने मित्रों और पहचान के लोगों को बताया था कि मैं अकेले जयपुर जा रहा हूँ। लेकिन जब से मेरी यात्रा आरंभ हुई, तब से लेकर अब तक किसी ने कॉल करके या मैसेज करके यह तक नहीं पूछा कि, "धनंजय आप कैसे हो? आप वहाँ ठीक भी हो या नहीं?" किसी बाहरी व्यक्ति ने, चाहे वे खुद को सच्चे मित्र कहते हों या मेरे पहचान वाले हों, किसी ने हाल-चाल नहीं पूछा।

यही वह वक्त था जब मैं अंदर से टूट रहा था, आँखें नम थीं और अश्रुओं की धाराएँ लगातार बह रही थीं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मैं सभी की परवाह करता हूँ, पर आज ऐसा कोई एक भी नहीं जो मेरी थोड़ी सी भी परवाह करता हो। यही मेरे लिए सबसे बड़ा आंतरिक झटका था।

मेरे मित्रों और पहचान के लोगों के अलावा एक ऐसा परिवार था जो हर पल मेरी हर एक स्थिति के बारे में पूछ रहा था। शायद आप अब तक समझ चुके होंगे कि वह किसका परिवार होगा? हाँ, वह मेरा ही परिवार था। मेरी माताश्री, पिताश्री, भाई-बहन और मेरे ताऊजी मेरे बारे में चिंता कर रहे थे कि, "मेरा बच्चा दूसरे शहर गया है, पता नहीं वह कैसे रह रहा होगा?" अब मुझे समझ आ रहा था कि पूरे संसार में भौतिक रूप से कोई हमारा अपना है, तो वे केवल और केवल माता-पिता हैं, इसके अलावा और कोई नहीं।

इस समय दिमाग में विचारों का बवंडर घूम रहा था, तभी मेरे एक मित्र (राजवीर गौतम) की कॉल आती है। वह पहला प्रश्न ही यही पूछता है कि, "आराम से हो, कोई दिक्कत तो नहीं?" मैंने औपचारिकता में कह दिया कि, "सब बढ़िया है, कोई दिक्कत नहीं है।"
वह आगे कहता है कि, "खाना-वाना हुआ कि नहीं?"

मैंने कहा, "हाँ भाई हो गया है, मैं आराम से हूँ, कोई दिक्कत या परेशानी नहीं।"

मैं आपको इस मित्र के बारे में थोड़ा सा बताऊँ, तो मैं उससे बस एक ही बार रूबरू मिला था, उसके बाद आज तक मैंने उससे मुलाकात नहीं की। मेरा यह मित्र मेरे जयपुर जाने से पहले, 12 जुलाई को परीक्षा देने के लिए आ चुका था और परीक्षा देकर अपने घर वापस भी चला गया था। जब वह परीक्षा देने आया था, तब मैं उसका हाल-चाल पूछ रहा था; ठीक इसके विपरीत अब वो मेरा हाल-चाल पूछ रहा है। कुछ समय तक बात करने के बाद हम दोनों आधुनिक दूरभाष यंत्र को विराम देते हैं।

इसके उपरांत मैंने खुद को संभालने की कोशिश की, लेकिन मेरी अतिविचार (overthinking) की समस्या परेशान कर रही थी। इसी के प्रभाव से मैं पूरी रात सो नहीं सका। कभी पानी पीता, तो कभी टहलने लगता। इसी तरह घड़ी देखते-देखते सुबह के 4:45 बज चुके थे।

Solo Journey from Lucknow to Jaipur: Unforgettable Travel Story of Life, Struggles and Human Connection
लखनऊ से जयपुर के सफर का अनुभव - फोटो : Ai

परीक्षा वाला दिन

आज मेरी परीक्षा का दिन था और परीक्षा केंद्र पर जाने की तैयारी करनी थी। मैं नहा-धोकर तैयार हुआ। अब समय 5:40 AM हो रहा था। मुझे किसी भी हालत में 8:00 AM बजे परीक्षा केंद्र पर रिपोर्टिंग करनी थी। मैं किसी तरह परीक्षा केंद्र पर पहुँचा। परीक्षा केंद्र के पास में ही एक चाय की दुकान दिखी। मैं दुकान के पास गया, वहाँ मेरी चाय वाले के साथ थोड़ी सी बातचीत हुई…….

मैं: भैया, एक छोटी चाय देना।

चायवाला: क्या आज कोई परीक्षा है?
मैं: हाँ।

चायवाला: कौन सी परीक्षा है?
मैं: शिक्षक बनने की परीक्षा है।

चायवाला: आप यहाँ के तो हो नहीं, कहाँ से आए हो?
मैं: मैं लखनऊ से आया हूँ।

चायवाला: हाँ, मुझे लगा ही था कि आप लखनऊ से होंगे। मैं भी कभी-कभार लखनऊ आया-जाया करता हूँ।
मैं: अच्छा, बढ़िया है।

चायवाला: आप कौन सी जाति से हो?
मैं: मैं ब्राह्मण हूँ और ब्राह्मणों में मैं तिवारी हूँ।

चायवाला: मैं भी ब्राह्मण हूँ और @@@ जाति से हूँ।
('@@@' इस शब्द के बारे में मुझे कुछ समझ नहीं आया कि यह व्यक्ति खुद को कौन सा ब्राह्मण कह रहा है। मैंने उससे पूछा भी नहीं। अगर मैं पूछ भी लेता तो क्या ही होता? मैं परीक्षा देने आया हूँ, किसी पचड़े में पड़ने नहीं।)

चायवाला चाय देता है।

मैं: कितना हुआ?
चायवाला: ₹7 की चाय है, मैं तुम्हें ₹5 की दूँगा।

मैंने ₹5 का सिक्का दिया और थोड़ी दूर जाकर चाय पीने लगा।

चाय पीने के बाद बगल में ही मिठाई की दुकान थी। मैंने देखा कि गरमा-गर्म कचौड़ियाँ निकल रही हैं। मैं दुकान पर गया और मिठाई वाले के साथ संवाद होता है……

मैं: भैया, ये कचौड़ियां कितने की हैं?
मिठाईवाला: ₹20 की।

मेरी नज़र सफ़ेद रसगुल्ले के बर्तन पर पड़ी, वहाँ रसगुल्ले के ऊपर एक मक्खी बैठी हुई थी।

मैंने कहा: भैया, मक्खी तो हटा दीजिए।
मिठाईवाला: अरे, पड़ा रहने दीजिए!

मैं एक कचौड़ी लेकर बाहर आ गया। मेरा मन था कि मैं एक सफ़ेद रसगुल्ला खा लूँ, पर मिठाई वाले के व्यवहार और उसकी साफ़-सफ़ाई को देखकर खाने का मन ही मर गया।

मैं शांत रहा। अब मैं दोबारा चाय पीने के लिए जाता हूँ। इस बार भी चाय वाले ने ₹5 की ही चाय दी। मैं चाय वाले के भाव से बहुत खुश हुआ।

इसके उपरांत मुझे दो लड़के मिले, जो मुझे अपना एडमिट कार्ड दिखाकर पूछते हैं कि, "ज़रा इसको देखिए कि यही सेंटर है ना?" मैंने कहा, "हाँ।"

इसके बाद एक महिला मिलीं, जो लगभग 35 साल की रही होंगी। वह भी अपना परीक्षा केंद्र ढूँढ रही थीं। उन्होंने कहा, "भैया, इसका लोकेशन फ़ोन में डाल दो।" मैंने ऐसा ही किया। उनका परीक्षा केंद्र मेरे परीक्षा केंद्र से 1.5 किलोमीटर दूर ही था। मैंने उन्हें "All the Best" बोला और वह मुस्कुराते हुए चली गईं।

मै परीक्षा केंद्र के अंदर गया। वहां सत्यापन के बाद जो कुर्सी मुझे प्राप्त हुई, वहां पर मै बैठ गया। और खुद को शारीरिक और मानसिक स्तर पर खुद को शांत करने लगा। कुछ समय पश्चात एक लड़की मेरे आगे वाली कुर्सी पर आकर बैठ जाती है।

कक्ष नियंत्रक जो एक युवा महिला ही थी, वो मुझसे पूछती है, आप कहां से आए हो?  मै कहता हूं कि मैं लखनऊ से आया हूं। इस बात से आश्चर्यचकित होकर मेरी कुर्सी के आगे वाली पर बैठी वही लड़की जो कुछ समय पहले ही आई है, मुझसे पूछती है..... 

लड़की: क्या तुम भी UP से हो?
मैं: मतलब तुम भी UP से हो?
लड़की: मैं गोरखपुर से आई हूं।
मै: मैं लखनऊ से आया हूं।

ऐसे ही अनौपचारिक बाते शुरू हुई तो पता चला कि वो लड़की अपनी मम्मी के साथ आई है जो अपने शारीरिक वजन के कारण चल भी नहीं पाती। बातो से पता चला कि वो अभी किसी सीबीएसई स्कूल में 25000 रुपए के वेतन पर शिक्षण कार्य करती है। मुझे पता चला कि उसका विषय अंग्रेजी साहित्य (English Literature) हैं। मेरा भी विषय अंग्रेजी साहित्य ही है। आज GS की परीक्षा है। कल शिक्षण विषय की परीक्षा होनी है। मैंने उससे पूछा कि कल आपका परीक्षा केंद्र कहां बना है? उस लड़की ने कहा कि उसका केंद्र सांगानेर बना है। मैने कहा मेरा भी सांगानेर बना है।

अब परीक्षा का समय आ गया था, प्रश्न पत्र भी आ गए थे। इसीलिए अब हम बात नहीं कर सकते थे। परीक्षा सकुशल संपन्न हुई। हम दोनों ने भी अपनी अपनी बुद्धिमत्ता के साथ परीक्षा संपन्न की।

परीक्षा देने के तुरंत बाद मैं साधन पकड़कर बिना एक मिनट बर्बाद किए मै अपने होटल वाले कमरे में आ गया। कमरे में जाने के पहले ही दुपहर का खाना खा लिया था। अब मैं कमरे में आराम करने लगा।

शाम के करीब 7:00 बजे का समय था। मैं अपने होटल से बाहर आया। इसके बाद मै टहलते–टहलते एक होटल में गया। जिस होटल में मै गया था वहां का पक्का नियम यह था कि एक थाली में जो कुछ खाने की सामग्री आयेगी वो एक ही बार आयेगी, उसके बाद दोबारा मांगने पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा। मैने वेटर को बुलाया और कहा कि भैय्या मुझे बहुत जोर की भूख लगी है, एक काम करो 150  रुपए वाली थाली लगा दो।

वेटर का बड़ा दिल

मैंने वेटर से पूछा कि अगर कोई आइटम कम पड़ जाए तो क्या दोबारा नहीं दोगे? उसने कहा कि एक ही बार मिलेगा। मैने बड़े ही प्रेम से उससे कहा कि भैय्या जरा थोड़ा–सा देख लेना जो भी आइटम लाना बढ़ाकर ही लाना, भूख बहुत तेज लगी है।

थोड़ी देर बाद वेटर खाने की थाली लेकर लाया और मेरे सामने मेज पर रख दी। उसने धीरे से थाली रखते हुए कहा कि भाई सिर्फ तुम्हारे लिए अपने हाथों से पनीर के टुकड़े बढ़ा दिए है, सबको 2–3 पनीर के टुकड़े दिए जाते है, तुम्हारे लिए मैने 6–7 कर दिए है। मैंने उसका शुक्रिया अदा किया। जब मैं खाना खा रहा था, बीच में उसने मुझसे पूछा कि खाना कैसा बना है? मैने मुस्कुराते हुए और गर्दन हिलाते हुए, हां कहा।

इसके बाद मैंने आस-पास की सारी गलियाँ घूमीं, जहाँ मैं रुका हुआ था। मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं इस स्थान को पहले से ही जानता हूँ। आपको मैं एक सच बात बताऊँ, भले ही मैं अपने घर से काफी दूर था, परंतु मुझे घर की याद बिल्कुल भी नहीं आ रही थी।

इसके पश्चात मैं अपने कमरे में आया और सो गया। सुबह के ठीक 4:00 बजे मैं अचानक उठ गया। इसके बाद मैं नहा-धोकर तैयार हो गया। मुझे याद आया कि दोपहर के 12:00 बजे मुझे कमरे का चेक-आउट करना होगा, परंतु उस समय तो मैं परीक्षा दे रहा हूँगा। अगर मैं 12:00 बजे के बाद कमरे का चेक-आउट करता हूँ, तो मुझे अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है। इससे बचने के लिए मैंने अपना सारा सामान समेट लिया और सुबह ही रिसेप्शन पर पहुँच गया। मैंने अपना सामान वहीं रख दिया और कमरे का चेक-आउट कर दिया। फिर ज़रूरी सामान अपने साथ लेकर परीक्षा केंद्र की ओर बढ़ चला।

बस से आगे का सफर

मैं जयपुर की सिटी बस से दूरी तय करने लगा। बस कंडक्टर ने एक लड़के की तरफ इशारा करते हुए बताया कि, "यह भी वहीं जा रहा है, जहाँ तुम जाना चाहते हो।" कंडक्टर ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैंने उससे पूछा था कि क्या यह बस सांगानेर जाएगी, तो उसने बताया था कि नहीं, यह सांगानेर नहीं जाएगी, आपको दूसरा वाहन करना पड़ेगा।

वह लड़का मुझसे बोलता है, "चलो, साथ चलते हैं।" मैंने कहा, "ठीक है।"

बस से उतरने के बाद मैं समझ गया था कि वह भी परीक्षा देने ही जा रहा है। इसीलिए रास्ते भर हमारे बीच काफी बातचीत हुई। हम दोनों ऐसे घुल-मिल गए मानो एक-दूसरे को बहुत अच्छे से जानते हों। वह लड़का बार-बार अपने व्हाट्सएप पर खुद का लगाया हुआ स्टेटस देख रहा था, जो माता-पिता के दिए गए संस्कारों से संबंधित था।

इसके बाद हम दोनों परीक्षा केंद्र के अंदर गए। सत्यापन कराने के बाद मैं अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। मेरे बैठने के कुछ मिनट बाद ही वही लड़की, जो कल परीक्षा देने आई थी और जिससे मेरी बातचीत हुई थी, आज भी मेरे आगे की नियत कुर्सी पर आकर बैठ गई।

मैंने उसे "हाय" कहा, उसने भी "हाय" कहा। उसने कल की परीक्षा के बारे में पूछा कि कैसी हुई थी, परीक्षा? मैंने कहा, "परीक्षा अच्छी हुई थी।" इसके जवाब में मैंने भी उससे ठीक यही प्रश्न पूछा कि आपकी परीक्षा कैसी हुई थी, तो उसने कहा, "ठीक ही थी।"

मेरे दाएँ तरफ एक और लड़की बैठी हुई थी, जो गाज़ीपुर (UP) से थी। उसने भी कल की परीक्षा पर चर्चा शुरू कर दी।

इसी बीच दो नौजवान कक्ष निरीक्षकों का हमारे परीक्षा कमरे में आगमन होता है। हमारे बीच चल रही चर्चा में वे दोनों भी शामिल हो जाते हैं। वे दोनों भी हमसे काफी घुल-मिल गए। चर्चा के बीच पता चला कि वे दोनों राजस्थानी सरकारी शिक्षक हैं। उन्होंने पिछले वर्ष ही 3rd ग्रेड की परीक्षा पास की थी। वर्तमान में वे शिक्षक हैं।

चर्चा जारी थी, सभी लोग अपना-अपना दृष्टिकोण साझा कर रहे थे। मुझे खुद वहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला।

कुछ समय बाद परीक्षा का समय हो गया, चर्चाएँ बंद हो गईं। हम सभी अब नियमों के तहत अपने-अपने दायरे में आ गए। परीक्षा के बीच में दोनों में से एक कक्ष निरीक्षक ने मुझे चाय भेंट की। मैंने उस भेंट को स्वीकार किया बिना किसी संकोच के। परीक्षा समाप्ति के बाद उन दोनों कक्ष निरीक्षकों ने बारी-बारी से पूछा कि, "परीक्षा कैसी हुई?" मैंने कहा, "अच्छी हुई, सर।"

इसके बाद मैंने उनका शिक्षण स्थान पूछा, तो उन्होंने बताया, "हमारा विद्यालय इस विद्यालय के बगल में ही है। आज हमारी ड्यूटी इसी विद्यालय में लगी है, हम तो बस ड्यूटी कर रहे हैं।"

यह वाक्या इतना आनंद और गरिमापूर्ण था कि जब मैं परीक्षा केंद्र से बाहर आया, तब मैं अंदर से बहुत ज्यादा ऊर्जावान और नई संभावनाओं को महसूस कर पा रहा था। मैं परीक्षा केंद्र के बाहर आ गया था। वह लड़का, जो आज सुबह सिटी बस में मिला था, वह फिर से मिल गया। उसने कहा, "आओ, साथ चलते हैं।" मैंने कहा, "ठीक है, भैया।"

हम दोनों ने पुनः सिटी बस ली और साथ में चल दिए। बस में भीड़ बहुत अधिक थी। अगर मैं आपको समझाने के लिए बताऊँ, तो भीड़ ऐसी थी जैसे चींटियों का झुंड बिना एक भी रिक्त स्थान छोड़े चल रहा हो।

वह लड़का बस में दूसरों से बात करने लगा, और मैं अपनी ही धुन में मस्त था। वह लड़का किसी दूसरे यात्री से बात करते हुए कह रहा था कि, "मेरे पापा ICU में हैं, अगले 3-4 दिनों में डॉक्टर घर भेजने की तैयारी में हैं।" मैं यह सब चुपचाप सुन रहा था। कुछ समय बाद उसका गंतव्य (स्टॉप) आने ही वाला था, तब उसने मुझसे कहा, "मित्र, अब हम चलते हैं।"

जैसे ही उसने मुझे "मित्र" कहा, वैसे ही मेरे अंदर भावुकता की एक लहर पूरे दिल-दिमाग में दौड़ गई। इस भावना को न तो पूरी तरह व्यक्त किया जा सकता है और न ही शब्दों में पिरोया जा सकता है। हम दोनों ने हाथ मिलाया और मुस्कुराते हुए एक-दूसरे से विदा ली।

जब वह मित्र बस से उतर गया, तब मैंने उस दूसरे लड़के (यात्री) से बात की, जिससे वह बात कर रहा था, और पूछा, "क्या उसके पापा ICU में हैं? क्या कोई गंभीर बीमारी हो गई है?" उस लड़के ने कहा, "हाँ, वह तो यही बता रहा था।"

मैंने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की कि उसके पापा जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाएँ।

सच कहूँ तो, उस नए मित्र के साथ बिताए गए समय में मुझे उससे कोई विशेष लगाव महसूस नहीं हुआ था, परंतु जिस क्षण उसने मुझे "मित्र" संबोधित किया, उसी क्षण से एक गहरा आत्मिक लगाव हो गया और मैं भावुक हो उठा था।

इसके पश्चात मैं सीधे अपने होटल गया, जहाँ मैं रुका हुआ था। अपना सामान उठाया और जयपुर जंक्शन की ओर चलने लगा। जैसे ही मैंने 30-40 मीटर की दूरी तय की, वैसे ही वह गोरखपुर वाली लड़की और उसकी मम्मी दिख जाती हैं। मैं आराम से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। जैसे ही मेरी नज़र उस लड़की पर पड़ी, उसी क्षण उस लड़की की नज़र भी मुझ पर पड़ी। उसने कहा, "यही है होटल, जहाँ मैं रुकी थी।" मैंने कहा, "अच्छा है, मैंने यह होटल देखा हुआ था।"

घर वापसी की तैयारी

मैंने उस लड़की से कहा, "मैंने तो चेक-आउट कर दिया है, मैं चला अपने घर।" मैंने उसे अंतिम बार "Bye" बोला। उसने भी अपना हाथ हिलाकर "Bye" किया और हमने अंतिम विदाई ली। यह पूरा प्रसंग मेरे चलते-चलते ही पूरा हुआ। मैं देख पा रहा था कि उसकी मम्मी थोड़ी आश्चर्यचकित दिख रही थीं। इसका कारण था कि मेरी बेटी को यहाँ कोई जानता नहीं, तो यह कौन लड़का है जो मेरी बेटी से बात कर रहा है!

मेरा उस लड़की के साथ एक पल भी बेवजह रुकना मेरी मर्यादा और आत्म-सम्मान के खिलाफ था, इसीलिए मैं रुका नहीं। मेरे पास समय था कि मैं 10-5 मिनट रुक सकता था, परंतु उसका तात्पर्य क्या निकलता?

उस लड़की से अंतिम विदाई के उपरांत, जब मैं स्टेशन की ओर बढ़ रहा था, तब मेरे हृदय में हल्का-सा धक्का लगा कि मैं जयपुर छोड़कर जा रहा हूँ, जिस शहर ने मुझे वास्तविक अर्थों में अकेलापन महसूस होने ही नहीं दिया। अब तक के जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि मेरी पहली ही यात्रा में जितने भी सह-यात्री मिले, वे सब के सब मेरे ही चरित्र का प्रतिबिंब थे।

जिस प्रकार प्रकृति के नियम अटल और सार्वभौमिक हैं, ठीक वैसे ही यह नियम भी अटल है कि सभी का एक निश्चित समय होता है और उसके बाद अंतोगत्वा गमन ही होता है जैसे मेरी वतन वापसी हो रही है।

मैं ठीक उसी क्रम में वतन वापसी कर रहा था, जैसा मैंने जयपुर आगमन के लिए क्रम निर्धारित किया था। 17 जुलाई की रात को आगरा की जैन धर्मशाला में रुककर, अगले दिन 18 जुलाई की सुबह लखनऊ के लिए रवाना हुआ। दोपहर तक मैं चारबाग स्टेशन पर पहुँचा। इसके पश्चात मैं आलमबाग बस स्टॉप से रायबरेली डिपो की बस में बैठकर अपने गाँव के लिए निकल पड़ा।

गांव वापसी 

जैसे ही गांव के बस स्टॉप पर उतरा, वहाँ बह रही ताज़ी हवा अहसास करा रही थी कि बेटा, यह तुम्हारा ही गाँव है जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ है। घर आकर सभी का आशीर्वाद लिया। सभी ने मेरा हाल-चाल पूछा और पूरी यात्रा कैसी रही, इसके बारे में जाना। मैंने भी उत्साहपूर्वक और मनोबल बढ़ाने वाले शब्दों में कहा कि, "मुझे कहीं पर भी रत्ती भर दिक्कत नहीं हुई।"

आज का दिन बहुत ही अच्छे से व्यतीत हुआ। माता के हाथ के पकवान वाह! क्या कहने, इतने दिनों बाद खाने को मिल रहे थे। मुझे परिवार से बहुत प्रेम मिला। आज मैं इतना खुश था कि रात भर बैठकर पूरे संस्मरण का ड्राफ्ट तैयार कर लिया, ताकि कोई भी घटना, जो हर लहज़े में महत्वपूर्ण है, कहीं भूल न जाऊँ।

अगले दिन वह हुआ जिसने मेरी पूरी यात्रा का अंतिम अध्याय लिख दिया। सुबह-सुबह का समय था। मेरी माता जी चाय बना रही थीं। मैं उनके पास गया और कुछ हल्की-फुल्की हँसी-मज़ाक करने लगा। तभी माता जी ने कहा, "जब से जयपुर गए हो, सारे संस्कार भूल गए हो! जब मैं फोन करती थी, तब फोन पर एक बार भी आशीर्वाद नहीं लिया।"

हंसी-मज़ाक का माहौल मेरे लिए आंतरिक तौर पर गम के बादल में बदल गया। मैं सब सुन रहा था, मेरे पास शब्द नहीं थे। आंखें नम हो गई थीं,इसलिए नहीं कि मैंने आशीर्वाद नहीं लिया, बल्कि इसलिए कि मैं कैसे अपने संस्कारों को भूल गया।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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