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देव की डायरी: पार्किंग में खाट खड़ी करने का सुख

देव प्रकाश चौधरी देव प्रकाश चौधरी
Updated Fri, 09 Oct 2026 06:47 PM IST
सार

 दिल्ली में दूसरों की पार्किंग में अपनी गाड़ी खड़ी करने का सुख ही 'कुछ और' है।  वहीं, अपनी पार्किंग में दूसरों की खड़ी कार को देखने का दुख भी 'कुछ और' है। अगर आपका घर किसी बाजार में है तो सुख-दुख की यह आंख-मिचौली चलती रहती है।अपनी पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने में क्या रखा है? वह आपकी है। जगह भी आपकी और गाड़ी भी आपकी। इसमें रोमांच कहां से आएगा? रोमांच तो तब है, जब आप किसी दूसरे की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करें और वहां लिखी पट्टी आपको देखती रह जाए- "यहां गाड़ी खड़ी करना मना है।" आप पट्टी को देखते हैं। पट्टी आपको देखती है। और आप उसी के नीचे अपनी गाड़ी खड़ी करके निश्चिंत भाव से चले जाते हैं। यह काम गहरा आत्मविश्वास मांगता है। 

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deo ki dairy satir on indian system parking system in delhi
दिल्ली का ट्रैफिक - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

दिल्ली जैसे महानगर में गाड़ी चलाना एक पराक्रम है तो उसको पार्क करने के लिए जगह ढूंढना कला है। इस 'पराक्रम' और इस 'कला' में अद्भुत संबंध है। जो दिन में सड़कों पर गाड़ी चलाता है, वह उसे शाम में पार्क करने की जगह भी ढूंढ निकालता है, भले ही वह जगह किसी दूसरे की रिजर्व पार्किंग ही क्यों न हो।

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यह एक साधना है, जो सिद्ध हुआ, उसका जीवन सफल है। सतत प्रयास, सूझबूझ, धैर्य और शर्मिंदा न होने के गुण के साथ जो आदमी यहां गाड़ी लेकर निकलता है, वह देखते-देखते उसे दूसरे की पार्किंग में खड़ी करने में कुशल हो जाता है। 
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दिल्ली में दूसरों की पार्किंग में अपनी गाड़ी खड़ी करने का सुख ही 'कुछ और' है।  वहीं, अपनी पार्किंग में दूसरों की खड़ी कार को देखने का दुख भी 'कुछ और है। अगर आपका घर किसी बाजार में है तो सुख-दुख की यह आंख-मिचौली चलती रहती है।अपनी पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने में क्या रखा है? वह आपकी है। जगह भी आपकी और गाड़ी भी आपकी। इसमें रोमांच कहां से आएगा?
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रोमांच तो तब है, जब आप किसी दूसरे की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करें और वहां लिखी पट्टी आपको देखती रह जाए-“यहां गाड़ी खड़ी करना मना है।”आप पट्टी को देखते हैं। पट्टी आपको देखती है। और आप उसी के नीचे अपनी गाड़ी खड़ी करके निश्चित भाव से चले जाते हैं। यह काम गहरा आत्मविश्वास मांगता है। 

दूसरों की पार्किंग में गाड़ी पार्क करने का सुख

दूसरों की पार्किंग में गाड़ी पार्क करने वाला आदमी जानता है कि वह गलत है, लेकिन वह इस ज्ञान को अपने व्यवहार में आने नहीं देता। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह गाड़ी लगाता है और ऐसे चला जाता है, जैसे कोई ठेलेवाला सड़े केले बेचकर खिसक लेता है। दिल्ली और एनसीआर में मैंने देखा है कि कुछ लोग अपनी गाड़ी के शीशे पर मोबाइल नंबर रख देते हैं। यह सभ्यता की आखिरी निशानी है। असली खिलाड़ी नंबर भी नहीं रखता। उसे विश्वास होता है कि जिसके घर के सामने उसने गाड़ी खड़ी की है, वह इंतजार करेगा। करता रहेगा। आखिर वह कर भी क्या सकता है?

एक बार मैंने देखा कि मेरे पड़ोसी की पार्किंग में एक लाल रंग की अनजान सी कार खड़ी थी और कार के शीशे पर एक कागज में मोबाइल फोन नंबर लिखा हुआ था। मेरे पड़ोसी ने भुनभुनाते हुए दनाक से फोन मिलाया, "भाई साहब, आपने मेरी पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर दी है।"  

उधर से जवाब मिला, "अच्छा!" पड़ोसी ने लगभग गुस्से में कहा, "गाड़ी हटाइए।" उधर से जवाब मिला,  "अभी?"  पड़ोसी ने गुस्से का एक्सीलेटर बढ़ाते हुए कहा, "हां, अभी, अविलंब।"   उधर से जवाब मिला,  "देखिए, मैं थोड़ी दूर हूं।"  यह 'थोड़ी दूर' भारतीय नागरिक का सबसे सुविधाजनक भौगोलिक स्थान है।

आदमी कहीं भी हो, ऑफिस में, शादी में या सिनेमा हॉल में, लेकिन अपनी गाड़ी से हमेशा ‘थोड़ी दूर’ ही रहता है। कभी-कभी तो इतना दूर कि गाड़ी हटाते-हटाते पड़ोसी की उम्र निकल जाए। 

जगह खत्म नहीं हुई...

दूसरों की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने का एक सामाजिक लाभ भी है। इससे आदमी को यह अहसास होता है कि शहर में जगह अभी खत्म नहीं हुई है। जगह है, बस वह दूसरे के हिस्से में है। और दूसरे के हिस्से की चीज को अपना समझ लेने में हम भारतीयों की पुरानी दक्षता है। कुल मिलाकर देखें तो पार्किंग इस देश में केवल गाड़ी रखने की जगह नहीं है।

यह चरित्र की परीक्षा है। जिसने अपनी जगह पर गाड़ी खड़ी की, वह कानून मानता है और जिसने दूसरे की आरक्षित पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके कहा- "बस पांच मिनट के लिए है", वह भारतीय लोकतंत्र की असली आत्मा है। उसके पांच मिनट कभी खत्म नहीं होते। वह पांच मिनट में चाय पीता है, सब्जी खरीदता है, गोलगप्पे खाता है और कभी-कभी तो शादी भी तय कर लेता है। उधर पार्किंग का मालिक अपनी ही जगह पर शरणार्थी बनकर सड़क पर घूमता रहता है।  

दूसरे की पार्किंग में अपनी गाड़ी लगाने वाला आदमी मूलतः आशावादी होता है। उसे भरोसा रहता है कि सामने वाला कुछ न कुछ इंतजाम कर लेगा। और सचमुच सामने वाला कर लेता है। वह सड़क पर अपनी गाड़ी खड़ी कर देता है। अब उसकी गाड़ी किसी तीसरे की परेशानी है। तीसरा चौथे की जगह घेरता है। चौथा पांचवें की। और इस तरह एक आदमी की पार्किंग से शुरू हुई समस्या पूरा मोहल्ला मिलकर लोकतांत्रिक ढंग से बांट लेता है। 

मुझे तो कई बार यह लगता है कि दिल्ली में दूसरे की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करना दरअसल एक सामाजिक प्रयोग है। आप देखना चाहते हैं कि सामने वाला कितना सहनशील है? वह जितना सहता है, आप उतना आगे बढ़ते हैं। मेरे मोहल्ले में एक साहब और हैं। वे जब अपनी गाड़ी लेकर बाहर निकलते हैं तो पार्किंग को खाली नहीं छोड़ते। वहां एक फोल्डिंग खाट बिछा जाते हैं। खाट पर कुछ ऊल-जलूल सामान भी रख देते हैं। ऐसा सामान जिसका घर में कोई उपयोग नहीं और पार्किंग में तो बिल्कुल नहीं।

लेकिन साहब को मालूम है कि वस्तुओं का उपयोग उनकी उपयोगिता से नहीं, उनके द्वारा घेरी गई जगह से तय होता है।  गाड़ी साहब की बाहर सड़क पर दौड़ रही होती है और पार्किंग में साहब की खाट पड़ी रहती है और खाट के साथ चेन और ताला इस बात के गवाह हैं कि खाली जगह वास्तव में खाली नहीं है। साहब शाम में गाड़ी लेकर लौटते हैं।

पहले ताला खोलते हैं, फिर चेन खोलते हैं, फिर खाट खड़ी करते हैं और अंत में अपनी गाड़ी पार्क करते हैं। खाट, चेन और ताला, ये तीनों मिलकर दिल्ली की पार्किंग का नया त्रिकोण बनाते हैं। गाड़ी बाहर दौड़ रही होती है और पार्किंग में खाट यह संदेश दे रही होती है- "यहां जगह तो है, लेकिन आपके लिए नहीं।" 

उस साहब को देखकर सहज ही यह सवाल उठता है कि क्या दिल्ली में सबको खाट खरीद लेनी चाहिए? दिल्ली के मोहल्लों में अगर हर आरक्षित पार्किंग में दिन में एक-एक खाट बिछ जाए तो दृश्य कितना मनोरम होगा! उससे भी ज्यादा मनोरम दृश्य तब होगा, जब सारी खाटें शाम में एक साथ खड़ी होंगी।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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