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कोरोना से जंग: महामारी एक उत्सव

Mon, 13 Apr 2020 11:29 AM IST
Vinod purohit विनोद पुरोहित
Updated Mon, 13 Apr 2020 11:29 AM IST
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coronavirus pandemic celebrating like festival
ताली-थाली बजाकर और दीपक जलाकर जनता को इस महामारी के खिलाफ एकजुट किया गया। - फोटो : अमर उजाला

वाकई यह देश बहुरंगी और उत्सवधर्मी है। हर मौके को उत्सव में बदलना यहां लोगों को बखूबी आता है। इस बार तो गजब हो गया। महामारी को भी उत्सव में बदल दिया है। शंख फूंके जा रहे हैं, घंटे-घड़ियाल और मंझीरे बजाए जा रहे हैं। महामारी को भी खुद के होने पर शक हो रहा होगा। दहशत का माहौल सिर्फ सरकारी घोषणाओं में और अखबारों-टेलीविजन की सुर्खियों तक सिमट गया है। यह नए अनुभवों के संकलन का दौर है।

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जो वर्षों से कोई ज्ञानी-ध्यानी नहीं कर पाया, वो अदृश्य वायरस ने कर दिया। लोग घरों में स्वस्फूर्त बंद हैं और कोई उफ्फ तक नहीं। झंडा-बैनर-नारे भी नहीं निकले, किसी की मुठ्ठी तक नहीं तनी। घरों में गजब का प्रेम-स्नेह उमड़ रहा है। तुलसीदासजी की पंक्ति...भय बिनु होय न प्रीत... असल मायने में अब चरितार्थ हो रही है।

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कोरोना वायरस - फोटो : अमर उजाला

टेलीविजन पर रामायण धारावाहिक चल रहा है और शहर में प्रतीक रूप में रामराज्य आ गया है। हमारे यहां प्रतीकों का बड़ा महत्व है, इसका भी गजब का गणित है..सब काम प्रतीकों में हो जाते हैं। असल भले फेल हो जाए लेकिन प्रतीक के सौ फीसद खरा रहने की गारंटी रहती है। उस पर कोई उंगली उठने का सवाल ही नहीं, क्योंकि प्रतीक तो प्रतीक है ना।... हां तो मैं कह रहा था कि शहर में मानो रामराज आ गया है।

सड़कें सनी हैं..घरों में बेतहाशा सफाई हो रही है। माहौल एकदम पवित्र है। चेहरों पर मास्क है कि कोई जीवाणु सांसों के जरिए भूले से भी अंदर न चला जाए। दान-पुण्य अपने पंचम भाव में है। लोग एकांतवास सीख गए हैं। 14 दिनों में 14 बरस के वनवास के किस्से श्रद्धाभाव से कहे-सुने जा रहे हैं। छिटपुट को छोड़कर चोरी चकारी की घटनाएं भी नहीं हो रही हैंं।

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शहर में दान-दर्शन का जोर है, वो दान ही क्या जिसका दर्शन न हो। मुख्य मार्गों से गली-कुलियों तक मानवीयता दौड़ रही है। चमचमाते झंडे-बैनरों को पार्श्व में रखकर मूक नारा गूंज रहा है कि कोई भूखा न सोने पाए। लेने वाले और देने वाले एक-दूसरे की गंध पहचानकर एक-दूसरे की ओर खिंचे चले आ रहे हैं। आम दिनों में दरवाजे से दुत्कारे जाने वाले अब खुशामद के साथ गरम-गरम पूड़ियां उड़ा रहे हैं। सूनी सड़कों पर दानवीरों और नेता किस्म के लोगों की परिक्रमा चल रही है। लोग अपने अपने हिसाब से पूड़ी-सब्जी आदि के पैकेट बंटवाने में मशगूल हैं…साथ में समर्थक नत्थी हैं। उनकी भी बन आई है।

लॉक़आउन की सख्ती के बावजूद बिना पिटे शहर का फोकट में नजारा लेकर चहक रहे हैं। इनकी सबकी जिम्मेदारी है। एक का काम है कि फोटो सही आ जाए और अखबारों में छप जाए, ताकि भैया खुश हो जाएं। दूसरे का काम है गरीबों और जरूरतमंदों की पहचान करके भैया को बताना। एक का काम बक्से में से पैकेट निकालकर भैया के हाथों में थमाना।

इस प्रकार सबके काम बंटे हुए हैं। पुलिस और अफसर भी पीछे नहीं हैं। उनकी भी जिद है कि हम भी गरीबों तक पहुंचें और यही जिद नेताओं और दानवीरों की कुढ़न का कारण है। नाम चमकाने के भरपूर मौके पर पानी फेरने की जुगत भी खूब चल रही है। दान-पुण्य की बिसात पर मानो शतरंज की शह-मात चल रही है।

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लॉकडाउन के पहले एक-दो दिन छोड़कर गरीबों की बन आई है। सब्जी-पूड़ी से गले-गले तक अटे घूम रहे हैं। पेट इतना भर रहा है कि बदहजमी में नींद नहीं आ रही है। पेट खराब हो रहा है। दवा-अस्पताल बंद पड़े हैं...हजम करने के लिए लॉकडाउन क चलते बाहर टहल भी नहीं पा रहे हैं, सो बार-बार हाथ धोना पड़ रहा है। ऐसे हाल में हालांकि एक झोपड़ी के सामने से गुजरते समय मैं चौंक गया। दरअसल अंदर से शायद किसी बुजुर्ग की आवाज थी। हे भगवान, ऐसे दिन बार-बार दिखाए।

कुछ गरीबों के फ्रिज भी गले-गले तक भरे पड़े हैं लेकिन उनके चेहरों और पुकार में बेचारगी बदस्तूर है...क्या साब हफ्ता हो गया मुंह पर अन्न का दाना नहीं रखा। साहब को ऊपर से फटकार पड़ी तो एक्शन में आए। नाक का सवाल तो था ही, शक भी था...क्योंकि रोज ही राशन भेजा जा रहा है, वह जा कहां रहा है। खाकी के जेहन में सवाल उठ रहा है कि हमारे अलावा इतनी तेजी से कौन खा सकता है। छापा डाला तो गरीब का नया संस्करण प्रकाशित हुआ।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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