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हाईकोर्ट की यह कैसी टिप्पणी? "स्तन पकड़ना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार या बलात्कार की कोशिश नहीं"

Thu, 20 Mar 2025 07:17 PM IST
Shruti Agrawal श्रुति अग्रवाल
Updated Thu, 20 Mar 2025 07:17 PM IST
सार

किसी नाबालिग पीड़िता के आरोपों के खिलाफ इस तरह की टिप्पड़ियों के बाद महसूस होता है कि ‘ पॉक्सो कानून’ आखिर बना ही क्यों? बाल यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय ने साल 2012 में पॉक्सो एक्ट बनाया था।

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controversial remarks by Allahabad High Court judge and indian society
यह टिप्पणी इलाहबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने की है। - फोटो : एएनआई

विस्तार

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“पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे पुलिया के नीचे खींचकर ले जाने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते।” इलाहबाद हाईकोर्ट


यह टिप्पणी इलाहबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने की है। जज द्वारा की गई टिप्पणी सिर्फ एक आरोप नहीं बल्कि इस तरह के कई आरोपों में बार-बार प्रयुक्त की जाती है। इससे पहले भी बॉम्बे हाईकोर्ट की एडिशनल जज पुष्पा गनेडीवाल ने यौन उत्पीड़न के एक आऱोपी को यह कहकर बरी कर दिया था कि कपड़े के ऊपर से स्तन दबाना यौन अपराध के अंतर्गत नहीं आता, आरोपी के ऊपर पॉक्सो एक्ट नहीं लगाया जा सकता है।

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शुक्र है कि हाईकोर्ट के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर पलट दिया था कि ‘सेक्सुअल मंशा ’ से शरीर के किसी भी हिस्से को छूना पॉक्सो एक्ट का मसला है। यह नहीं कहा जा सकता कि कपड़े के ऊपर से बच्चे के निजी अंगों का स्पर्श यौन शोषण नहीं है। ऐसी परिभाषा बच्चों को शोषण से बचाने के लिए बने प़ॉक्सो एक्ट को ही खत्म कर देगी।

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अब एक और टिप्पणी आई है। किसी नाबालिग पीड़िता के आरोपों के खिलाफ इस तरह की टिप्पड़ियों के बाद महसूस होता है कि ‘ पॉक्सो कानून’ आखिर बना ही क्यों? बाल यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय ने साल 2012 में पॉक्सो एक्ट बनाया था। जिसका पूरा नाम प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट है। इस कानून के जरिए नाबालिग बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे यौन अपराध और छेड़छाड़ जैसे मामलों में कार्रवाई की जाती है।

इस कानून को बनाने का उद्देश्य नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों को रोकना और इस तरह के अपराधियों को कड़ी सजा दिलवाना था। ताकि भविष्य में अपराधी बच्चों को कुत्सिक इरादों का शिकार ना बना सके। बचपन में हुआ यौन हमला मानसिक और भावनात्मक रूप से बहुत तोड़ देता है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह कहना कि पीड़िता के प्राइवेट पार्ट को पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ देना या उसे पुलिया के नीचे खींचकर लेकर जाने की कोशिश करना बलात्कार या बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता...पीड़ित नाबालिगों के हौंसले पस्त करने वाला है।

यूं भी यौन अपराध के बाद पीड़ित मन-मस्तिष्क में खुद को ही दोषी मानने लगता है ऐसे में इस तरह की टिप्पणी मनोबल गिराने वाली साबित होगी। पीड़ित लड़की आखिर किस इच्छाशक्ति से कोर्ट के दरवाजे खटखटाने की हिम्मत करेगी। यदि वह पहले से ही यह जानती हो कि कोर्ट जाने से उसकी रुसवाई ही होगी। हमारे यहां यूं ही न्याय में बहुत देरी की जाती है। उस पर पहले थाने में उसकी एफआईआर दर्ज नहीं होगी, फिर लोअर कोर्ट से दिए गए समन की धाराएं हाईकोर्ट में बदल दी जाएंगी।
 

आखिर क्या था मामला?

कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी 2022 को अपने बेटी के साथ हुए यौन हमले की शिकायत निचली अदालत में दर्ज करवाई थी। शिकायत में कहा था कि गांव के तीन युवकों ‘पवन, आकाश और अशोक’ ने बेटी को बाइक से घर छोड़ने की बात की। रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के स्तनों को छूने की कोशिश की। उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए पायजामे का नाड़ा तोड़ दिया।

लड़की की चीख-पुकार सुनकर वहां से गुजर रहे सतीश और भूरे ने लड़की को बचाने की कोशिश की तो आरोपी उन्हें देसी तमंचा दिखाकर भाग गए। नाबालिग के अभिभावक पुलिस के पास गए। वहां पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की तो उन्होंने अदालत का रुख किया। निचली अदालत ने आरोपियों के खिलाफ समन जारी किया। समन में पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 ( अपराध करने का प्रयास ) औऱ धारा 376 के अंतर्गत जांच करने का निर्देश दिया गया था। जिसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी।

जहां अदालत ने अपने आदेश में कहा-

केवल यह तथ्य कि अभियुक्तों ने पीड़िता के स्तनों को पकड़ लिया या पायजामे की डोरी तोड़ दी, और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की। लेकिन कुछ लोगों के हस्तक्षेप पर वे भाग निकले। यह अपने आप में बलात्कार के प्रयास का मामला नहीं बनता। ”

यह टिप्पणी अपने आप में काफी विचलित करने वाली है। इससे पीड़िताओं के हौंसले कमजोर होंगे। वे अपराध के खिलाफ आवाज उठाने से पहले कई बार सोचेंगी कि उनकी शिकायत की सुनवाई होगी भी या नहीं। माननीय अदालतों को ऐसी टिप्पणी करने से पहले मानवीय होना बेहद जरूरी है।


 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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