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बिहार राजनीति विशेष: भाजपा के राज्यों में सत्ता संधान के अभिनव फंडे...!

Wed, 15 Apr 2026 02:58 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Wed, 15 Apr 2026 02:58 PM IST
सार

भारतीय लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने के तीन मान्य तरीके रहे हैं। पहला, कोई भी पार्टी चुनाव जीतकर बहुमत के साथ अपने दम पर सत्ता में आ जाए। इस हिसाब से आज देश के आधे से ज्यादा राज्यों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है।

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BJP innovative tactics to gain power in the states
नीतीश कुमार का अभिवादन करते सम्राट चौधरी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार में जिस नफीस अंदाज में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाकर कथित स्वैच्छिक राजनीतिक वानप्रस्थ में भेजा गया और उनकी जगह सीएम के रूप में भाजपा के सम्राट का राज्याभिषेक किया गया, वह भारतीय जनता पार्टी के अपने राज्यारोहण का चौथा और नवीनतम महाप्रयोग है।

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इस मायने में आज देश में भाजपा का कोई भी सियासी सानी नहीं है, जिसने सत्ता संधान के इतने विविध तरीके ईजाद किए हों। इसके पहले दलबदल ही पिछले दरवाजे से सत्तासीन होने का एक मात्र फंडा था। जबकि भाजपा के इन फंडों में  दबाव, दबंगई, धैर्य, चतुराई, उग्रता, सौम्यता, मित्रता, शत्रुता, अवसरवाद और दीर्घकालीन लक्ष्य सामने रखकर हाईब्रिड चालें चलते रहना भी शामिल है।
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राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में इन चालों को बारीकी से देखें तो भाजपा ने हर उस राज्य में, जहां वह केवल अपने दम पर सत्ता हासिल करने की स्थिति में नहीं है, और जहां अन्य क्षेत्रीय दलों की बैसाखी के बगैर उसका आगे बढ़ना संभव नहीं है या फिर उन राज्यों में जहां जनसांख्यिकी और जातिवाद का अलग स्ट्रक्चर है, सत्ता में आने के लिए अलग-अलग मॉडल विकसित किए हैं।
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बिहार इस मॉडल श्रृंखला का चौथा ‘सफल’ प्रयोग है। संभव है कि हमे इसका एक और नया प्रयोग पश्चिम बंगाल में देखने को मिले। क्योंकि वहां विधानसभा चुनाव में भाजपा यूं तो अपने दम पर सत्ता पाने के और ममता बैनर्जी को हराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है, लेकिन खुदा-न-खास्ता किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिला तो वहां भी कोई नया ‘खेला’ देखने को मिल सकता है।

भारतीय लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने के तीन मान्य तरीके रहे हैं। पहला, कोई भी पार्टी चुनाव जीतकर बहुमत के साथ अपने दम पर सत्ता में आ जाए। इस हिसाब से आज देश के आधे से ज्यादा राज्यों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है।

दूसरा है, किसी सत्तासीन या क्षेत्रीय दल की सत्ता को दल-बदल कर गिरा दिया जाए और हर मुमकिन जोड़तोड़ कर अपनी सरकार बनाई जाए, जैसे कि मध्यप्रदेश में 6 साल पहले हुआ।

तीसरा, महाराष्ट्र मॉडल है, जहां पहले किसी सहयोगी दल का सीएम बनकर भाजपा उसे कंधा दे और चुनाव करवाकर खुद उसके कंधे पर सवार हो जाए। चौथा है, बिहार मॉडल।

जहां सियासी हालात को अपने अनुकूल ढलने तक का लंबा इंतजार किया जाए और कंधा देते-देते धीरे से सवार को उतारकर खुद पालकी में विराजमान हुआ जाए और यह सब कुछ लखनवी नफासत के साथ किया जाए कि कोई  उफ् तक न कर सके और इसे नियति का चक्र मानकर खुद हाथ में झांझ-मंजीरे थाम बैठे। 

हालांकि, यह मॉडल मप्र मॉडल के ठीक विपरीत है, जहां भाजपा ने मामूली बहुमत से सत्तारूढ़ हुई कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार में ही  सेंध लगा दी और पार्टी की अंतर्कलह को अपने पक्ष में भुना लिया। या यूं कहे कि मोटे तौर पर पहले ही भगवा रंग में रंग चुके मप्र में सत्ता संचालन में आया यह मामूली ‘ब्रेक’ था, जिसे सियासी हिकमत के साथ ‘ठीक’ कर लिया गया।

इस दृष्टि से भाजपा में ‘हिकमत’ शब्द की व्याख्या बहुत व्यापक है। इसमे ‘साम-दाम-दंड-भेद’ सब जायज है और इस राजनीतिक नैतिकता के पैमाने भी 21 वीं सदी की भाजपा के हैं। इसके आगे दूसरी राजनीतिक पार्टियां लगभग बेबस नजर आती  हैं।

उनके सामने दो ही विकल्प हैं। या तो वो भाजपा के साथ, उसकी शर्तों पर उसके दास बनकर रह लें या फिर सत्ता गंवाने के लिए तैयार रहें। चूंकि राजनीति का अंतिम ध्येय सत्ता है और वो कैसे हासिल की जाती है, यह सवाल नैतिक होते हुए भी अदम्य सत्ताकांक्षा के आगे गौण है। भाजपा का इसमे पूरा विश्वास है।

इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि अब भाजपा के कोर एजेंडे के सभी मुद्दे पूरे हो चुके हैं। इसलिए सत्ता संधान के लिए नया धनुष और बाण चाहिए।

भाजपा अंतिम कोर मुद्दा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का है, जिसे उसने अलग तरीके से राज्यवार लागू करना शुरू किया है। संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव तक इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाए।

कश्मीर से धारा 370 हटाने और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के एजेंडे पूरे हो ही चुके हैं। यानी इनके बूते अब मतों के दोहन की संभावना नहीं के बराबर है।

इन भावनात्मक मुद्दों से हटकर पार्टी महिलाओं को सीधे नकदी जैसे तरीकों को आजमा रही है, जो जमीनी स्तर पर राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा फलदायी सिद्ध हो रहे हैं। लेकिन ये उपाय सत्ता परिवर्तन के पुराने फंडे से प्रेरित हैं कि जनादेश हासिल कर सत्ता में आया जाए और फिर इसी के सहारे अंगद के पांव की तरह जमा जाए। हालांकि इस काम में विकास, हिंदुत्व, समान अधिकार, सुशासन, समरसता आदि अनुषांगिक घटक हैं।

जहां तक बिहार की बात है तो वहां सत्ता सीधे अपने हाथ में लेने के लिए भाजपा ने  माफिक गजब का धैर्य दिखाया है। देर से ही सही, वह घड़ी आ गई कि पटना में घी के दीए जलाए जाएं।

नीतीश कुमार ने अपने 20 साल के राज में ज्यादातर समय भाजपा के सहारे ही राजनीति की और सुशासन बाबू की छवि गढ़ी। क्योंकि लालू राज में बिहार गवर्नेंस के पाताल में चला गया था। ऐसे में वहां के लोगों को नीतीश कुमार का ‘सुशासन’ भी राम राज की तरह लगने लगा।

यह बात अलग है कि नीति आयोग के विकास के तमाम पैमानों पर बिहार आज भी सबसे निचली पायदान पर है। विकास की दौड़ में यूपी और एमपी भी उससे काफी आगे निकल गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह उस राज्य की हालत है, जिसे देश का सर्वाधिक राजनीतिक चेतना वाला प्रदेश कहा जाता है। वहां से कई क्रांितकारी आंदोलन उठे।

इन आंदोलनों ने दूसरे राज्यों को तो बदल दिया, लेकिन ‘दिया तले अंधेरे’ की तर्ज पर बिहार जहां का तहां रहा। यह बिहार का दुर्भाग्य है कि वहां इस मुखर राजनीतिक चेतना की भौतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास की चेतना से आदर्श जुगलबंदी कभी भी नहीं हो सकी।

बहरहाल, राज्य के नए और भाजपा के पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में भी यह जुगलबंदी आगे हो सकेगी या नहीं, कहना मुश्किल है। बताया यही जा रहा है कि बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी नीतीश कुमार की भी पसंद हैं, क्योंकि वह अति पिछड़ी कोइरी जाति से आते हैं। लेकिन इस ‘जातीय फिक्स्ड डिपॉजिट’ से कोई बुनियादी मसला हल नहीं होता।

सम्राट अपनी जातीय पूंजी को राज्य के विकास में कैसे निवेश करते हैं, यह देखने की बात है। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि राज्य में डबल इंजिन की सरकार बनने से विकास की गति और दिशा तेज होगी। लेकिन खतरा यह भी है कि बिहार में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण और तेज हो सकता है।

सम्राट चौधरी इस पर कैसे नियंत्रण रखते हैं, यह भी देखना होगा। वैसे सम्राट को स्वीकारने में बिहार के सभी समुदायों को ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वो भाजपा के पहले मुख्यमंत्री भले हों, लेकिन वो संघ की पाठशाला के विद्यार्थी नहीं रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सम्राट भी एक दीर्घ कालीन एजेंडे के तहत तात्कालिक व्यवस्था है।

इस ‘सम्राट’  को भी दिल्ली के तख्त का हुकुम ही मानना होगा और भाजपा का खांटी राष्ट्रवादी नेतृत्व तैयार होने तक राज्य का रथ हांकना होगा। वैसे भी बिहार से नीतीश की विदाई मंडलवाद, समन्वयवाद, राजनीतिक हिंडोलावाद (कभी इधर तो कभी उधर), अति पिछड़ावाद और सियासी सौम्यता की भी विदाई है।

अब देखना यह है कि बिहार किस राज्य को फॉलो करता है, यूपी को, गुजरात को, मप्र को अथवा असम को। आगे की सियासत यह भी तय करेगी कि भाजपा सत्ता में आने अथवा बने रहने का कोई चौथा फार्मूला भी विकसित करेगी या नहीं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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