हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल: तिलक के बाद गांधी से सर्वाधिक प्रभावित रही भारतीय पत्रकारिता
यह भी आज के पत्रकारों को शायद नहीं पता होगा कि मुंबई समाचार एक ऐसा अखबार है,जो बीते दो सौ चार साल से नियमित प्रकाशित हो रहा है। यह भी एक दिलचस्प तथ्य होगा कि इस बरस 30 मई को उदन्त मार्तण्ड को 200 साल हो जाएंगे।
विस्तार
हम भारतीय अक्सर अपनी श्रुति या वाचिक परंपरा पर गर्व करते हैं। कल भी करते थे। शायद आगे भी करते रहेंगे। लेकिन हकीकत तो यह है कि जब पूर्वजों को अपनी इस भूल का अहसास हुआ तो उन्होंने वाचिक परंपरा त्याग कर हमारे पौराणिक ग्रंथों को लिपिबद्ध करना शुरू किया। इसीलिए चार वेद समेत अनेक बेहद पुराने ग्रन्थ आज भी हमारे सामने हैं। इसके बावजूद अनगिनत अनमोल दस्तावेज हमारी वाचिक परंपरा की बलि चढ़ गए। हजार डेढ़ हजार साल पहले जो बेजोड़ पुस्तकें लिखी गईं, वे हमने अपनी लापरवाही या उदासीनता से विलुप्त हो जानें दीं।
मसलन कोई नहीं जानता कि राजा भोज का विमान ग्रन्थ कहां है और समूचा जल मंगल ग्रन्थ किसके पास है? विमान ग्रन्थ में आधुनिकतम विमान बनाने की तकनीक थी और जल मंगल में पानी से प्रत्येक बीमारी का इलाज बताया गया है। जलमंगल के कुछ अध्याय तो कहीं कहीं उपलब्ध हैं ,लेकिन समूचा ग्रन्थ अनुपलब्ध है। यह आने वाली नस्लों के लिए हमारे पुरखों का एक ऐसा भयानक काम है, जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।
हमारे अधिकांश पूर्वज एक और अक्षम्य कृत्य कर गए। सामंती शासन प्रणाली के कारण उन्होंने चारण परंपरा का निर्वाह करते हुए ऐसे ऐसे हैरतअंगे ग्रन्थ लिखे, जो अतिरंजना और अतिशयोक्ति की सारी सीमाएं तोड़ते थे। जैसे आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान करने वाली किताबों में लिखा है कि ऊदल में सैकड़ों हाथियों का बल था। दोनों भाइयों के पास उड़ने वाली घोड़ी थी, वगैरह वगैरह।
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पृथ्वीराज रासो में भी कुछ ऐसा ही है। बढ़ा-चढ़ा कर अपने स्वामी की चाटुकारिता बखान करने का दुष्परिणाम यह हुआ कि आज गांव-गांव में इन अतिरंजित गाथाओं पर लोग आंख मूंदकर भरोसा करते हैं और अतीत के ऐतिहासिक चरित्रों के गीत गा रहे हैं। हमारी रगों में चारण परंपरा आज भी दौड़ रही है। सदियों तक गुलामी का एक बड़ा कारण यह भी है।
मैं अपने ऐतिहासिक चरित्रों की बहादुरी को कमतर नहीं आंकना चाहता, लेकिन अशुद्ध और बढ़ा चढ़ाकर विरुदावलि गाने के सख्त खिलाफ हूं। इस प्रवृति का नुसान यह हुआ है कि इस कालखंड में प्रामाणिक लेखन अथवा इतिहास का दस्तावेजीकरण हाशिए पर चला गया और विकृत इतिहास लेखन से पन्ने के भरे हुए हैं। पुरखों के लिखे इन ग्रंथों पर हम आज आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। पर, उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसीलिए आज भी लेखन के नाम पर किए गए अपराध के दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं।
एक सौ अड़सठ साल
इन इतिहासकारों ने अपने लेखन के साथ न्याय नहीं किया। यह अलग चर्चा का विषय हो सकता है। फिलहाल मेरा आशय केवल प्रामाणिक लेखन और दस्तावेज़ीकरण से है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए। मोटे तौर पर इतिहासकारों के बाद पत्रकारों की यह जिम्मेदारी बनती थी कि वे उन समसामयिक विषयों पर तथ्यात्मक लेखन करें, जिनके वे प्रत्यक्षदर्शी हैं। उनसे आशा की जाती थी कि पत्रकारिता के नजरिए से उन दिनों की अतीत गाथा पन्नों पर उतारें, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी हो सके। गुज़िश्ता अठहत्तर साल में ऐसा कोई ठोस प्रयास हमें नहीं दिखाई देता। हालांकि कुछेक अपवाद भी हैं। अलबत्ता एक नायाब नमूना हमें इस बरस जरूर देखने को मिला है। यह अंधेरे बंद कमरे में रौशनदान जैसा है।
अत्यंत गंभीर और वरिष्ठतम संपादक विजय दत्त श्रीधर ने 168 साल की पत्रकारिता को गागर में भरकर अनगिनत नस्लों पर उपकार का कर्ज लाद दिया है। इस चुनौती भरे काम में उनकी उमर के तीन दशक से भी अधिक लग गए। श्रीधर जी का पहला शाहकार माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय के रूप में हमारे सामने है। यह संभवतः विश्व का अकेला संस्थान है, जहां सदियों का अतीत करोड़ों पन्नों में सुरक्षित है।
इसके बाद तीन खण्डों में समग्र भारतीय पत्रकारिता की रचना करके श्रीधर जी ने हमें नायाब धरोहर सौंपी है। पहले भाग का आगाज़ 1780 से होता है और एक सदी यानी 1880 तक चलता है। दूसरा हिस्सा 1881 से 1920 तक की पत्रकारिता समेटे हुए है। श्रीधर जी ने इसे तिलक युग का नाम दिया है। तीसरे खंड का सफर 1921 से शुरू होकर 1948 पर आकर रुकता है। यह संसार के सबसे बड़े पत्रकार गांधी जी के नाम से समर्पित है।
क्या हमारी मौजूदा नस्लें महात्मा गांधी और तिलक महाराज की पत्रकारिता से वाकिफ हैं? बड़े-बड़े पत्रकारिता विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी इन महापुरुषों की पत्रकारिता शुमार नहीं है। क्या लोग जानते हैं कि 1857 के नाकाम गदर के बाद पहले संपादक मौलाना बाकर अली और दूसरे क्रांतिकारी पत्रकार बेदार बख़्त को अंग्रेजों ने निर्भीक लेखन और अभिव्यक्ति के लिए सूली पर चढ़ा दिया था। कितने विद्वान इन तथ्यों से वाकिफ हैं ? शायद एक फीसदी भी नहीं । ऐसे उनचास अध्यायों में शामिल अदभुत जानकारियों से यह ग्रन्थ अटा पड़ा है।
इस बेमिसाल शोध पर सिलसिलेवार बात करना बेहतर होगा। पहले भाग से शुरुआत करते हैं- अपने निवेदन में श्रीधर जी विनम्रता से मानते हैं कि वे ऐसा कोई दावा नहीं कर रहे हैं कि सब कुछ इस ग्रन्थ में संजो लिया गया है। वे कहते हैं कि नए तथ्यों की खोज, उनमें संशोधन और उन्हें तराशने की प्रक्रिया निरंतर जारी रहने वाली है। यह हमें आश्वस्त करती है कि 168 साल की यात्रा कथा का यह विराम नहीं है। वे लिखते हैं,
"यह भारत का सबसे उथल-पुथल भरा कालखंड है। उन दिनों यह महादेश एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा था। सम्पूर्ण आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था। इस महासंग्राम में कलम के सिपाहियों ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की। संपादकों और समाचारपत्र-पत्रिकाओं ने इसके लिए भारी कीमत चुकाई। उन पर छापे पड़े, जुर्माने भरे, जेल गए, गोली खाई और फांसी चढ़ गए। जोश और जूनून की इस बलिपंथी पत्रकारिता को मिशन कहा गया। "
समग्र भारतीय पत्रकारिता के पहले भाग में पंद्रह अध्याय हैं। इनमें मुल्क में पत्रकारिता की शुरुआत से लेकर भाषायी रूपों में इसके विकास का विवरण है। संभवतः यही इस शोधपरक दस्तावेज को सबसे अलग और विशिष्ट बनाती है।
अभी तक हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता और स्वाधीनता आंदोलन में उनके योगदान को सामने लाने वाला कोई अन्य दस्तावेज मेरी नजर से नहीं गुजरा। लेकिन इस शोध में आप तमिल, बांग्ला, उड़िया, कन्नड़, तेलुगु, उर्दू, गुजराती, मराठी, मलयालम, असमियां और हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं का समावेश देखेंगे। उनसे पता चलता है कि कमोबेश पूरे हिन्दुस्तान में बरतानवी हुक़ूमत के विरुद्ध आक्रोश पनपना शुरू हो गया था।
गोरों की तानाशाही से मोर्चा लेती हुई पत्रकारिता का लोकतान्त्रिक स्वरूप भी इन्ही दिनों उभरकर आया था, जो आज विलुप्त है। यह संपादक के नाम पत्र स्तंभ के बारे में है। श्रीधर जी लिखते हैं,
"संपादक के नाम पत्र स्तंभ का जनक हिकी का बंगाल गजट था। इससे ज्ञात होता है कि यह पत्र जनता की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का पक्षधर था। जन भावनाओं को उजागर करके समस्याओं और सोच को प्रमुखता से उठाता था। इसके पच्चीस मार्च 1780 के अंक में फिलन थ्रोप्स का संपादक के नाम पत्र छपा था। इस पत्र में कोलकाता के श्मशान घाट पर गंदगी की शिकायत थी।"
आज के हिंदुस्तान में यह स्तंभ अखबारों के पन्नों से नदारद है। लेकिन, प्रसंग के तौर पर बता दूं कि भारत के महान संपादक राजेंद्र माथुर ने पहले नई दुनिया और फिर नवभारत टाइम्स का प्रधान संपादक रहते हुए संपादक के नाम पत्र को एक आंदोलन बना दिया था। वे प्रतिदिन सैकड़ों पत्र खुद पढ़ते थे। उनके नई दुनिया कार्यकाल में तो गांव-गांव में पत्र लेखक मंच बन गए थे। इन मंचों ने लोगों की सोच को मुखरित किया था और उनकी भाषा को संस्कार दिए थे।
पढ़कर आश्चर्य होता है कि 1822 में उर्दू साप्ताहिक जाम-ए-जहाँनुमा से गोरी हुकूमत घबरा उठी थी। कोलकाता के मुख्य सचिव विलियम ब्रूथ बैले ने एक फाइल में लिखा कि यह समाचार पत्र भविष्य में अंग्रेज सत्ता के खिलाफ आग लगाने वालों का नेतृत्व कर सकता है।
यह भी आज के पत्रकारों को शायद नहीं पता होगा कि मुंबई समाचार एक ऐसा अखबार है,जो बीते दो सौ चार साल से नियमित प्रकाशित हो रहा है। यह भी एक दिलचस्प तथ्य होगा कि इस बरस 30 मई को उदन्त मार्तण्ड को 200 साल हो जाएंगे। इस कड़ी में टाइम्स ऑफ इंडिया के जन्म की दास्तान यकीनन दिलचस्प है। यह तो लोगों की जानकारी में है कि इस समाचारपत्र की शुरुआत 1861 में गोरी सत्ता के दरम्यान हुई थी। लेकिन कितने लोग यह जानते होंगे कि एक अंग्रेज रॉबर्ट नाईट ने बॉम्बे टाइम्स, बॉम्बे स्टैंडर्ड और बॉम्बे टेलीग्राफ समाचारपत्रों का विलय करके टाइम्स ऑफ इंडिया प्रारंभ किया था?
यह खंड एक तथ्य और उद्घाटित करता है। ब्रिटिश राज की तमाम साजिशों के बावजूद हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच कोई कड़वाहट नहीं थी। मदरसों की ओर से संचालित समाचारपत्रों के संपादक हिन्दू होते थे और हिंदूवादी संस्थाओं में मुस्लिम संपादक काम करते थे। यहां तक कि कई गोरों ने जो अखबार निकाले, उनमें भी मुस्लिम और हिन्दू संपादक होते थे। सांप्रदायिक सद्भाव का ऐसा उदाहरण आज नहीं दिखाई देता।
जब साक्षरता का प्रतिशत पांच या छह फीसदी था तो हमारे दिल और दिमाग बड़े और उदार थे। मगर, आज अस्सी प्रतिशत साक्षर होने के बाद भी हमारे मष्तिष्क संकुचित और संकीर्ण हो गए हैं।
पाठकों को भरोसा नहीं होगा लेकिन मुझे याद है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का यह नाम मदरसे के मौलवी ने दिया था। इस नामकरण के नेंग स्वरूप वस्त्र और सोने-चांदी के सिक्के बैलगाड़ी में भरकर उनके पिता सेठ रामचरण कनकने मौलवी जी के पास ले गए तो दिन भर बहस के बाद भी मौलवी जी ने एक पैसा नहीं लिया था। राष्ट्रकवि का मूल नाम उनके जन्म के समय एक पंडित जी ने रखा था, जिसमें लगभग पचास अक्षर थे। ऐसे नाम को कौन स्वीकार करता?
बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता
बहरहाल ! आगे बढ़ते हैं। तिलक युग की पत्रकारिता याने इस वृहत शोध के दूसरे खंड की बात करते हैं। उन्नीस अध्यायों वाला यह खंड मेरी नजर में सबसे खास है। इसमें अगले 39 साल की सशक्त होती अख़बारनवीसी का ब्यौरा है। आज़ादी के लिए संघर्ष जवान हो रहा था और सामाजिक चेतना करवट ले रही थी। इसी कालखंड में बाल गंगाधर तिलक यानी तिलक महाराज प्रकट होते हैं। वे नारा देते हैं, स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। देखते ही देखते यह नारा समूचे मुल्क़ की अवाम की आवाज बन जाता है। आजादी की चाह अंगड़ाई लेती है और महात्मा गांधी इस देश में आत्मा की तरह सांसों में धड़कने लगते हैं।
मगर, तिलक महाराज का जिक्र एक बार फिर करते हैं। एक जनवरी 1881 को वे अंग्रेजी साप्ताहिक मराठा और तीन दिन बाद चार जनवरी को मराठी साप्ताहिक केसरी का शुभारंभ करते हैं। केसरी के तेवर सख़्त थे और वह विचारों का शोला था। हिंदी भाषी क्षेत्र में स्वराज का नारा बुलंद करने के लिए माधवराव सप्रे हिंदी में केसरी का प्रकाशन करते हैं। तिलक जी से घबराकर बरतानवी सत्ता ने उन्हें मांडले (आज के म्यांमार में) जेल में डाल दिया। लेकिन तब तक वे अपना काम कर चुके थे।
कानपुर से गणेशशंकर विद्यार्थी का प्रताप, बनारस से विष्णु पराड़कर का आज और जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी का कर्मवीर और काला कांकर से महामना मदनमोहन मालवीय के संपादन में हिंदोस्थान क्रांतिदूत बन गए। तेलुगु में सुब्रमण्यम अइयर ने स्वदेशमित्रन और मलयालम में कंदतिल वर्गीज़ मापिल्लै ने मलयाला मनोरमा का आगाज किया। यह सिलसिला पूरे राष्ट्र में फैल गया।
मौलाना आज़ाद एक शानदार पत्रकार थे। उन्होंने 1912 में उर्दू में आज़ादी की अलख जगाने वाले पत्र अल हिलाल का प्रकाशन किया। नतीजतन उन्हें बंगाल से निकाल दिया गया। मगर आप उर्दू के एक और साप्ताहिक स्वराज का प्रकाशन है। यह शांति स्वरूप भटनागर ने निकाला था। ढाई साल तक यह अख़बार निकला। इसके आठ संपादक हुए। इनमें छह को 94 बरस की क़ैद हुई और दो को आजन्म कालापानी दिया गया। इस भाग में एक पूरा अध्याय इस संपादक गाथा पर केंद्रित है। क्या हमारी नई पीढ़ियों को अपने पुरखों के इन बलिदानों की खबर है?
इसी खंड में द्विवेदी युग के सूत्रधार महावीर प्रसाद द्विवेदी का भी हवाला दिया गया है। महावीर प्रसाद द्विवेद्वी ने सरस्वती के जरिए भाषा और व्याकरण के नए संस्कार डाले। मैं याद कर सकता हूं कि द्विवेद्वी जी ने ही हमें मैथिलीशरण गुप्त से परिचित कराया था। उनका छद्म नाम रसिकेन्द्र बंद कराकर असली नाम से छापना शुरू किया। इतना ही नहीं, मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी हिंदी में लिखना सरस्वती से ही शुरू किया था क्योंकि द्विवेद्वी जी ने बृज बोली से प्रभावित गुप्त जी के लेखन को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था।
आज हमारे समाचारपत्रों में कार्टून विधा का लोप सा होता जा रहा है लेकिन करीब डेढ़ सौ साल पहले के गुलाम हिन्दुस्तान में कार्टून के जरिए अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण थी। जब 1883 में वृन्दावन से राधाचरण गोस्वामी ने भारतेन्दु का प्रकाशन प्रारंभ किया, तो उसमें पूरे एक पन्ने का कार्टून छपता था। यह कार्टून चुटीले कटाक्षों के लिए विख्यात था। मैं याद कर सकता हूँ कि आज़ादी के बाद भी कार्टून विधा की लोकप्रियता चरम पर थी। हम लोगों ने आर के लक्ष्मण और उनके आम आदमी के माध्यम से ऐसे-ऐसे व्यंग्य बाण निकलते देखे, जो आज विलुप्त हो चुके हैं।
प्रसंगवश बता दूं कि आर के लक्ष्मण का आखिरी साक्षात्कार मैंने लिया था। उनका केबिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक के कक्ष से कम से कम दोगुना था। उनकी ज़िंदगी का एक उदाहरण मैं कभी नहीं भूल सकता। जब लक्ष्मण जवान थे और बतौर कार्टूनिस्ट अपनी पेशेवर पारी शुरू करना चाहते थे तो उनका सपना था कि वे उस दौर के महान कार्टूनिस्ट डेविड लाओ जैसे बनें। वे मेहनत करते गए। जब वे सारे संसार के कार्टूनिस्टों के आराध्य बन गए तो एक दिलचस्प घटना हुई।
दरअसल वे अपने कार्टून बनाने के समय में कोई दख़ल पसंद नहीं करते थे और न ही किसी से मिलते थे। उनकी निजी सचिव को यह स्पष्ट निर्देश थे। एक दिन जब वे कार्यालय पहुंचे तो उनकी सचिव ने बताया कि कोई अतिथि मिलने के लिए उनके कक्ष में बैठा है। लक्ष्मण का पारा सातवें आसमान पर था। उन्होंने सचिव को डांट लगाईं कि उसने ऐसा क्यों किया तो सचिव ने उत्तर दिया ," सर ! वह एक अंग्रेज हैं और लंदन से सिर्फ आपसे मिलने के लिए आया है।"
लक्ष्मण हैरान परेशान से अंदर दाख़िल हुए। भीतर एक अंग्रेज बैठा था। लक्ष्मण को देखते ही सम्मान से उठ खड़ा हुआ और बोला ," सर ! आय एम डेविड लाओ। कार्टूनिस्ट फ्रॉम लंदन एंड ग्रेट फैन ऑफ़ योर कार्टून्स "। लक्ष्मण को काटो तो खून नहीं। उनके द्रोणाचार्य सामने और वे एकलव्य की तरह थे। क्या ऐसा किसी की ज़िंदगी में होता है?
यह लक्ष्मण की लोकप्रियता है कि लक्ष्मण के रचे गए काल्पनिक ' कॉमन मैन ' की मूर्तियां पुणे और मुंबई के चौराहों पर लगी हैं। यह लोकतंत्र में आम आदमी की ही आवाज है। आज संपादक के नाम पत्र की तरह कार्टून भी हमारे पन्नों से अनुपस्थित होते जा रहे हैं।
श्रीधर जी के इस दूसरे भाग में विशेषीकृत पत्रकारिता के भी अनेक उदाहरण मिलते हैं। मसलन कृषि,विज्ञान, रंगीन चित्र और पुस्तक समीक्षा जैसे क्षेत्र भी उस काल की पत्रकारिता से अछूते नहीं थे। तिलक युग का यह दूसरा भाग जहाँ अपना उपसंहार करता है,वहाँ से भारत में गांधी युग की शुरुआत होती है।
महात्मा गांधी की पत्रकारिता
दक्षिण अफ्रीका में पत्रकारिता करते-करते गांधी जी 1915 में स्वदेश लौटे और हिन्दुस्तान की आज़ादी के केंद्र बिंदु बन गए। इसीलिए तीसरा हिस्सा यानी गांधी युग की पत्रकारिता मेरी दृष्टि में इस समग्र पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। केवल 27 बरस की पत्रकारिता ने भारत से गोरों की विदाई देखी। पंद्रह अध्यायों में सिमटी भारतीय पत्रकारिता का यह सबसे जीवंत और धड़कता हुआ दस्तावेज़ है।गांधी इस कालखंड के प्राण हैं।
श्रीधर जी इस खंड की प्रस्तावना में लिखते हैं,
"यह तथ्य रेखांकित किया जाना चाहिए कि लोकमान्य तिलक के बाद महात्मा गांधी ने भारतीय पत्रकारिता को सर्वाधिक प्रभावित किया। सन 1921 से 1948 तक के कालखंड को पत्रकारिता का गांधी युग कहा जाएगा। गांधी युग में भारत की सभी भाषाओं और प्रांतों में पत्र-पत्रिकाएं निकाले जा रहे थे। धारवाड़ - कर्नाटक से 1921 में कन्नड़ साप्ताहिक कर्मवीर का प्रकाशन तिलक की विचारधारा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हुआ। यह नए युग की मांग के अनुरूप महात्मा गांधी की राह का राही बन गया।"
गांधी की पत्रकारिता इस मायने में बेमिसाल कही जा सकती है क्योंकि 1921 से 1935 के बीच पत्रकारिता करना जान की बाजी लगाना था। गोरी सत्ता ने खौफ और दहशत का ऐसा माहौल बना दिया था, जिसमें आम आदमी आजादी का सपना देखने में भी डरता था। कुछ उदाहरण देता हूं।
अंग्रेजों ने कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित की थी। उसे ख़ुशी का मौका मानते हुए दिल्ली में 23 दिसम्बर 1912 को वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग की शाही सवारी निकल रही थी। वाइसराय एक हाथी पर सवार थे। उस पर आज़ादी के मतवालों ने बम फेंका। इसमें महावत की मृत्यु हो गई और वाइसराय घायल हो गए। उन्हें तीन महीने बिस्तर पर रहना पड़ा। इसके बाद तो गोरे जल्लाद बन गए। उन्होंने मुल्क़ में ऐसा कत्लेआम मचाया कि लोग कराह उठे। बात-बात में क्रांतिकारियों को फांसी दी जाने लगी।
वाइसराय पर बम फेंकने के आरोप में मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद और मास्टर अवधबिहारी को मृत्युदंड दिया गया और कई क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास दिया गया। इसके बाद 17 नवंबर 1913 को राजस्थान के अरावली के मानगढ़ में बरतानवी फौज ने 2500 भील आदिवासियों को घेरकर गोलियों से भून दिया। दो साल बाद यानी 1915 में संसार के सबसे बड़े गदर की योजना विश्वासघात के कारण नाकाम हो गई, जिसमें 8000 क्रांतिकारी गोपनीय तरीके से समंदर के रास्ते जहाजों में भरकर भारत पहुंचे थे।
उन्होंने अविभाजित हिन्दुस्तान की 26 सैनिक छावनियों में सशस्त्र विद्रोह की खुफिया योजना बनाई थी। इसमें ग़दर के नौजवान संपादक करतार सिंह सराभा और इलाहाबाद से प्रकाशित उर्दू अख़बार स्वराज में उप संपादक रहे पंडित परमानन्द ( भाई परमानन्द नहीं ) समेत 26 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई थी।
बाद में प्रिवीकौंसिल ने मुल्क़ में बगावत की आशंका के मद्देनज़र 19 देशभक्तों की सजा आजन्म क़ैद में बदल दी। शेष 7 को फांसी दे दी गई थी। आज़ाद हिंद फौज के संस्थापक रास बिहारी बोस भी इस गदर के सूत्रधार थे। वे ऐन वक़्त पर गोरी पुलिस को चकमा देकर भाग निकले थे।
जब मैं 7 या 8 साल का था तो पंडित परमानन्द ने मुझे बताया था कि वे स्वराज में पत्रकारिता प्रशिक्षण के दरम्यान जेल की चक्की पीसा करते थे और बाजार में घंटा बजाकर स्वराज बेचते थे। लोग आते। चुपचाप अखबार खरीदकर ले जाते। पंडित परमानन्द पंडित सुंदरलाल के कर्मयोगी में भी लिखते थे। इसके बाद 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ। बाद के वर्षों में चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी जाती है और छतरपुर जिले में चरणपादुका नरसंहार किया जाता है। अर्थात भारत के हर इलाके में बेगुनाह देशवासियों को मारकर बरतानवी सत्ता आतंक का साम्राज्य कायम कर चुकी थी।
यहां लंबी पृष्ठभूमि इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि मैं बताना चाहता था कि उन दिनों अंग्रेजों का डर कितना था। ऐसे में गांधी जी के लिए पत्रकारिता कितनी जोखिम भरी थी, बताने की आवश्यकता नहीं। शायद इसीलिए श्रीधर जी ने इस खंड का नाम गांधी युग दिया होगा। सन 1919 में यानी करीब एक सौ छह साल पहले गांधीजी गुजराती में नवजीवन शुरू करते हैं। यंग इंडिया के संपादक बनते हैं और झकझोरने वाले विचारों की नदी बहाते हैं।
यंग इंडिया का संपादक बनते ही वे पहला पत्र अखबार में उन लोगों को लिखते हैं, जो उनसे असहमत थे या उनका विरोध करते थे। दूसरा पत्र वे उन गोरों को लिखते हैं, जिसमें वे उन्हें भारत की आज़ादी के लिए मजबूर करने वाले तर्क देते हैं। यह दोनों अखबार करीब-करीब तेरह-चौदह साल निकलते रहे।
गांधी के नैतिक साहस का एक और उदाहरण। सन 1919 में ही रॉलेट एक्ट लागू हुआ। इसमें प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की पूर्व अनुमति जरूरी बना दी गई थी। एक्ट के तहत किसी अपील और दलील का स्थान नहीं था। गांधी जी इसके विरोध में सत्याग्रह का प्रकाशन करते हैं। इस अखबार के प्रकाशन की अनुमति वे नहीं लेते। पहले अंक में ही लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन तब तक होता रहेगा, जब तक कि एक्ट वापस नहीं लिया जाता। यह साहस दिखाने वाले सिर्फ गांधी ही हो सकते थे।
इसके बाद 1933 मेंं उनकी पहल पर हरिजन कल्याण के लिए नया अखबार हरिजन निकलता है। क्या आप यह जानते हैं कि हरिजन नाम संपादक के नाम पत्र लिखने वाले एक दलित पाठक ने गांधी जी को भेजा था। यह पहले अंग्रेजी में फिर हिंदी में निकला। उनका इस समाचारपत्र के लिए उद्देश्य एकदम साफ था- सेवा।
आज विचारों की खुराक हमें कहां मिलती है। न के बराबर। गांधी ने उस समय कहा था कि एक विचार पत्र होना चाहिए। सरकार के दबाव और सेंसरशिप के विरोध में वे लिखते हैं- एक-एक पंक्ति अगर दिल्ली में बैठे प्रेस सलाहकार को भेजना पड़े तो मैं स्वतंत्रतापूर्वक काम नही कर सकता। प्रेस की आज़ादी तो विशेषाधिकार है।
गांधी के तेवर से सरकार परेशान हो चुकी थी। जब 1942 में उन्होंने अंग्रेजो! भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू किया तो हरिजन बंद करना पड़ा। गांधी जेल गए और इधर हरिजन पर ताला पड़ गया। एक-एक प्रति जला दी गई। दो बरस बाद गांधी जी जेल से छूटे तो फिर हरिजन शुरू कर दिया। सेवाग्राम से ही उन्होंने सर्वोदय का भी प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। यह उनके अंत समय तक जारी रहा। गांधी ने अपने को हमेशा पूर्णकालिक पत्रकार माना। उनका कहना था कि सबसे बड़ा काम देश की आज़ादी है। इसके बाद मेरा काम पत्रकारिता का है। उन्होंने साफ-साफ कहा था," संपादक को कोई भी परिणाम भुगतना पड़े, लेकिन उसे अपने विचार खुलकर व्यक्त करना चाहिए।"
बनारसीदास चतुर्वेदी की पत्रकारिता
गांधीजी को समर्पित समग्र भारतीय पत्रकारिता के इस अंतिम भाग में कन्नड़, असमिया, मलयालम, मराठी, तमिल, तेलुगु तथा अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दक्रान्ति का विवरण है। चांद के फांसी अंक को सलामी दी गई है। खास बात यह है कि इस कालखंड में जो समाचारपत्र निकले, उनमें से अधिकांश आज भी प्रकाशित हो रहे हैं। ( लेकिन उनकी वर्तमान पत्रकारिता की दिशा और दशा पर मैं चुप रहना पसंद करूंगा)
इनके अलावा डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के मराठी साप्ताहिक मूक नायक और बहिष्कृत भारत के जन्म की कहानी भी आप इस भाग में पढ़ सकते हैं। डॉक्टर आम्बेडकर को भारतवासी संविधान निर्माण में उनकी भूमिका के लिए जानते हैं। पर, वे मूलतः विलक्षण अर्थशास्त्री थे, यह लोग नहीं जानते। अर्थशास्त्र में पहली भारतीय पीएचडी डॉक्टर आंबेडकर ने ही की थी, यह भी कम लोग ही जानते हैं।
साढ़े नौ बरस तक बनारसीदास चतुर्वेदी ने विशाल भारत का निर्भीक संपादन किया और उसके बाद मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ आ गए। वहां कुण्डेश्वर से मधुकर का प्रकाशन किया। सन्दर्भ के तौर पर बता दूं कि चतुर्वेदी जी पहले इंदौर के डेली कॉलेज में प्राध्यापक थे। इस कॉलेज में अधिकतर रियासतों के राजकुमार पढ़ने आया करते थे। टीकमगढ़ रियासत के राजकुमार भी चार साल तक बनारसीदास चतुर्वेदी के छात्र रहे थे। जब वे राजा बने तो उन्होंने चतुर्वेदी जी को न्यौता भेजा कि वे टीकमगढ़ आकर रहें और पत्रिका का प्रकाशन करें। मधुकर पत्रिका चतुर्वेदी जी ने ही निकाली थी।
दिलचस्प कहानी यह है कि राजा साहब बुंदेलखंडी व्यंजनों के बड़े शौकीन थे और बहुत अच्छे रसोइये भी थे। उन्होंने बुंदेली व्यंजनों पर एक किताब लिखी और अपने प्रधानमंत्री को दिल्ली भेजा कि वे इस किताब को किसी प्रेस से प्रकाशित कराएं। उन दिनों दिल्ली में गिने-चुने प्रकाशक ही होते थे। जब प्रधानमंत्री दिल्ली गए तो उन प्रकाशकों ने बड़ा मजाक़ उड़ाया। प्रधानमंत्री से राजा साहब ने यह किस्सा सुना तो बहुत क्रोधित हो गए और सीधे लंदन या जर्मनी से नई प्रिंटिंग प्रेस खरीदकर टीकमगढ़ में लगाईं। इस प्रेस में बुंदेली व्यंजनों की वह किताब छपी।
बाद में इस मशीन के लिए कोई पूर्णकालिक काम नहीं बचा तो उन्होंने बनारसी दास चतुर्वेदी से प्रार्थना कि वे राजा मधुकर शाह के नाम से मधुकर नमक पत्रिका निकालें। चतुर्वेदी जी ने यह आग्रह स्वीकार कर लिया। बताने की आवश्यकता नहीं कि मधुकर में अपनी रचना छपवाने के लिए चोटी के लेखक लालायित रहते थे। स्वतंत्रता से पहले मधुकर पत्रिका ने हिंदी पत्रकारिता की शोभा बढ़ाई है।
पहली रेडियो पत्रकार
इससे 106 साल पहले केसरी के मराठी और हिंदी में प्रकाशन के बाद बुंदेलखंड केसरी निकला। यह आज के उत्तर प्रदेश में शामिल बुंदेलखंड के राठ क़स्बे के निकट घने जंगलों में एक गुप्त मंदिर से निकलता था। अंग्रेजों की पिट्ठू पुलिस प्रकाशन स्थल का पता नहीं लगा सके, दो चार दिन बाद वह स्थान बदल दिया जाता था और साइकिलोस्टाइल मशीन रातों रात और घने जंगल में ले जाई जाती थी।कभी बैलगाड़ी पर, कभी साइकल पर तो कभी पोटली बनाकर सर पर रखकर।
इसे पढ़ते हुए मुझे 1942 के अंग्रेजों! भारत छोड़ो आंदोलन की याद आ रही है। इस आंदोलन में जब महात्मा गांधी समेत सारे बड़े नेताओं की गिरफ़्तारी हो गई तो ऊषा मेहता ने गोरों को चकमा देते हुए खुफिया तौर पर कांग्रेस रेडियो प्रारंभ किया था। इस मायने में ऊषा हिन्दुस्तान की पहली ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट हैं। यह कांग्रेस रेडियो गोरी पुलिस और उसके गुप्तचरों को चकमा देते हुए काम करता था।
बंबई ( तब इसका नाम मुंबई नहीं था) के अलग अलग इलाकों में रोज रात इस रेडियो के ट्रांसमीटर का पुर्जा-पुर्ज़ा खोला जाता था और रातों रात दूसरे स्थान पर ले जाया जाता था। जब तक पुलिस किसी इलाके में सिग्नल पकड़ती, तब तक ट्रांसमीटर किसी अन्य क्षेत्र में स्थापित कर दिया गया जाता। महीनों तक यह प्रसारण पत्रकारिता चलती रही। अफसोस ! इसी प्रसारण टीम से जुड़े रहे एक देशद्रोही ने अंग्रेजों को इसकी सूचना दे दी और इस तरह गुलाम हिन्दुस्तान की प्रसारण पत्रकारिता का यह अनमोल अध्याय समाप्त हो गया। स्वयं उषा मेहता ने मुझे एक साक्षात्कार में इस ख़ुफ़िया रेडियो की सारी कहानी सुनाई थी। संसार के किसी अन्य मुल्क में ऐसा नमूना देखने को नहीं मिलता।
प्रेमचंद की पत्रकारिता
गांधी युग की पत्रकारिता वाले इस खंड में कथा सम्राट प्रेमचंद की ख्याति कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में थी। लेकिन एक मासिक पत्रिका हंस के संपादक प्रेमचंद का नया रूप 1930 में देशवासियों ने देखा। उनके पत्रकारिता वाले तेवरों से आज भी यह राष्ट्र अनभिज्ञ है। प्रेमचंद ने इसमें ओजस्वी संपादकीय ,सम सामयिक विषयों पर गंभीर और तीख़ी टिप्पणियाँ लिखीं। प्रवेशांक में उन्होंने लिखा ,
" स्वाधीनता केवल मन की एक वृति है। इस वृत्ति का जागना ही स्वाधीन हो जाना है। अभी तक हमारे दिलों में यह विचार ही नहीं आया। हमारी चेतना इतनी मंद ,मद्धम और मुर्दा हो गई थी कि उसमें ऐसी महान महत्वाकांक्षा का जन्म ही नहीं हो सकता था। लेकिन भारत के कर्णधार महात्मा गांधी ने हमें सोते से जगा दिया। अब इस संग्राम में हम एक दिन जीतेंगे। वह दिन जल्द आएगा या देर से ,यह हमारे साहस,पराक्रम और अक़्ल पर निर्भर करेगा। हमारा धर्म है कि उस दिन को शीघ्र लाने के लिए तपस्या करते रहें। यही इस हंस का मक़सद है। "
प्रेमचंद ने इन्द्रनाथ मदान को 7 सितंबर 1934 को एक साक्षात्कार दिया था। हंस की बात चली तो मुझे वह साक्षात्कार याद आ रहा है। इसमें प्रेमचंद कहते हैं ,
" मैं मूलतः पत्रकार नहीं था। देशकाल की परिस्थितियों ने आजादी के लिए मुझे पत्रकार बना दिया। जो मैंने साहित्य में धन कमाया था, वह सब पत्रकारिता में गंवा दिया। लेकिन मैं प्रसन्न हूं।"
प्रेमचंद कोई ऐसा दावा नहीं करते कि वे हिंदुस्तान के सबसे प्रखर संपादक हैं। लेकिन,1935 में महात्मा गांधी ने स्वयं उनको मिलने के लिए वर्धा आमंत्रित किया। हालांकि वे 1920 में एक सभा में उनका भाषण सुन चुके थे। इसका असर यह हुआ कि नौकरी छोड़ दी और फिर प्रेमाश्रम लिखा। जब 1928 में महात्मा जी इलाहाबाद आए। (उन दिनों अधिकृत तौर पर प्रयागराज नाम नहीं था) प्रेमचंद जी दो दिन पहले से इलाहाबाद जाकर डट गए, मगर मुलाक़ात नहीं हो पाई। गांधी जी का मिनट-दर-मिनट कार्यक्रम पहले से तय था। वे तनिक निराश तो हुए,लेकिन तय किया कि अब पत्रकारिता करेंगे। इसके बाद गोरी हुकूमत पर उनके हमले बढ़ गए। हंस की नींव यहीं पड़ गई।
महात्मा गांधी ने प्रेमचंद जैसे कथा सम्राट को पत्रकार बना दिया, तो गांधी की पत्रकारिता का महत्व समझा जा सकता है । प्रेमचंद ने लिखा ,
" महात्मा गांधी देशभक्त हैं। उन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर दिया है। हमारी भलाई के लिए दिन रात हिन्दुस्तान भर में दौड़ रहे हैं। ऐसे महान पुरुष विरले ही होते हैं।"
गांधी जी से पहली बार मिलने के बाद प्रेमचंद ने लिखा ,
"जितना महात्मा जी को समझता था, उससे कहीं ज़्यादा मिले। उनसे मिलने के बाद कोई ऐसा नहीं है,जो उनका हुए बिना लौट आए। वे सबके हैं और उनसे मिलने के बाद सब उनके हो जाते हैं। उनके सामने कितना ही बड़ा झूठा जाए, उनके सामने तो सच ही बोलना पड़ेगा। मैं तो उनका चेला ही हो गया। वैसे तो महात्माजी का चेला गोरखपुर में ही हो गया था। तभी तो नौकरी एकदम छोड़ी थी। गांधी इस युग का सबसे बड़ा पंडित है। उसका दिल दोनों के लिए बराबर है। वह आदमियत पहले देखता है। जब आदमी आदमी न रहा तो मज़हब क्या है और किसका है।"
हंस के अप्रैल 1930 अंक में आज़ादी की लड़ाई लेख में कथा सम्राट लिखते हैं,
"आज़ादी की लड़ाई शुरू हो गई। महात्मा गांधी ने 6 अप्रैल को डांडी यात्रा करके ग़ुलामी की बंदी पर पहला हथौड़ा चलाया। सारे देश में उसकी झंकार गूंज उठी। पहले तो किसी की समझ में न आया कि महात्माजी क्या करने जा रहे हैं। उनका मज़ाक भी बनाया गया। गवर्नर ने अपने खुशामदी टट्टुओं से कहा कि यह दुःख भरा प्रहसन है। पर, उन्हें क्या मालूम था कि यह प्रहसन दो महीने में ही आज़ादी का प्रचंड प्रवाह सिद्ध होगा। उसे संगठित नौकरशाही रोक नहीं पाएगी। फ़िल्मों पर रोक लगाई जा रही है, खबरों पर सेंसर है।
अंग्रेजों की दानवता का नाच हम देख रहे हैं। कायरता,कमीनेपन और निर्दयता में इस जाति से बाज़ी ले जाना मुश्किल है। फिर भी हमारा जो अनुमान था, उससे ज़्यादा ही हो रहा है। न कोई कानून है, न कायदा न नीति न शर्म। इन अन्यायों से तो हमारी विजय तय है। हम तो महात्मा जी की सूझ-बूझ के कायल हैं। उन्होंने जो भी बात की, ख़ुदा क़सम लाजवाब की। न जाने कहां से नमक का टैक्स खोज निकाला कि उसने देखते ही देखते देश भर में आग लगा दी। "
सरदार भगत सिंह की पत्रकारिता
यह दौर हमें किरती की याद भी दिलाता है। अमृतसर से गुरुमुखी और उर्दू में यह ऐतिहासिक पत्र क्रांतिदूत की तरह सरदार अर्जुन सिंह निकालते थे। हैरानी होती है कि यह मासिक साठ पन्नों का था। किरती की पत्रकारिता के बारे में शानदार समाचार पत्र महारथी ने लिखा था ,
" यह पत्र क्रांतिकारी है। हमें दुःख है कि साहित्य-साहित्य चिल्लाने वाले किसी हिंदी सेवी को आज तक ऐसा पत्र निकालने का साहस नहीं हुआ। पत्र का एक-एक शब्द क्रांति का जयघोष कर रहा है। ग़ुलामी में जकड़ा भारत बहुत संभव है ,साहित्य के धोखे में अपने आपको भी खो बैठे। उफ, धन्य है वीरों का साहस…यह समाचारपत्र है या पीड़ितों की मर्म वेदनाओं का धधकता हुआ अग्निकुंड। इसको कहते हैं कलेजा और इसको कहते हैं आग। "
बता दूं कि महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए कॉलेज छोड़ने वाले सरदार भगतसिंह भी किरती के लेखकों में से एक थे। इसमें वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। काकोरी केस के सेनानियों को सलामी देते हुए जनवरी 1928 में भगतसिंह ने लिखा,
" हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फर्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं। तड़प रहे हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएं। "
सरदार भगत सिंह प्रताप के संपादकीय विभाग में काम करते थे। इस दरम्यान उन्होंने ऐसे ऐसे लेख लिखे ,जो बरतानवी सत्ता की चूलें हिलाते थे। वीर अर्जुन में उन्होंने शानदार रिपोर्टिंग की।
आज़ादी के बाद राजेंद्र माथुर युग
आज़ादी के बाद की पत्रकारिता तब तक अपनी जड़ों, सिद्धांतों और सरोकारों से जुड़ी रही, जब तक कि आज़ादी के समय पत्रकारिता कर रहे महापुरुष और संपादक जीवित रहे। बनारसीदास चतुर्वेदी , माखनलाल चतुर्वेदी, धर्मवीर भारती और रघुवीर सहाय ऐसे ही नाम हैं। लेकिन सर्वाधिक चमकदार और प्रतिभाशाली नाम राजेंद्र माथुर का है। आज़ादी के बाद राजेंद्र माथुर जैसा साहसी और प्रतापी संपादक दूसरा नहीं हुआ। वे नई दुनिया में प्रभाष जोशी को लाए।
प्रभाष जी भी अपने कालखंड के यशस्वी संपादक रहे। उनके अलावा सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसे संपादकों ने अपने उसूलों और निष्पक्षता की रक्षा करते हुए इस पवित्र पेशे का स्तर बनाए रखा है। हमारी पीढ़ी तक भी यह छाप दिखाई दी। छतरपुर का ऐतिहासिक पत्रकार उत्पीड़न कांड इसका गवाह है। इस कांड की जांच न्यायिक जांच आयोग ने की थी और जो स्वतंत्रता के बाद का पहला और आख़िरी ऐसा मामला था। इसी मामले ने मापदंड तय किया कि पत्रकारों को किसी ख़बर का स्रोत बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
मैं स्वयं इस मामले का एक पक्ष रहा हूँ और भारी उत्पीड़न झेला है। पर,आज हम देखते हैं कि पत्रकारिता से सरोकार गुम होते जा रहे हैं और बाज़ार हावी है। कुछ बाज़ारों ने बिगाड़ा और रही सही कसर सियासत ने पूरी कर दी। राजनीति और नेताओं ने जितना स्वस्थ पत्रकारिता को नुकसान पहुँचाया ,उतना किसी अन्य संस्था ने नहीं। हमें इस सियासत पर शर्म क्यों नहीं आनी चाहिए?
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