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हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी बागियों को झटका, शक्ति परीक्षण से बाहर

Mon, 09 May 2016 11:47 PM IST
एजेंसी, ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल, नई दिल्ली
एजेंसी, ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल, नई दिल्ली Updated Mon, 09 May 2016 11:47 PM IST
सार

  • उत्तराखंड में आज के शक्ति परीक्षण से पहले कांग्रेस के बागी विधायकों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका
  • सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
  • हाईकोर्ट ने अयोग्य ठहराने संबंधी स्पीकर का आदेश सही करार दिया 

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rebel MLA can't vote in floor test of uttarakhand assembly.
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Reuters

विस्तार

उत्तराखंड की सियासत में भूचाल लाने वाले कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को नैनीताल हाईकोर्ट से करारा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने इन विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के स्पीकर के फैसले को सही ठहराया है, जिसके बाद बागी विधायक मंगलवार को विधानसभा में होने वाले शक्ति परीक्षण में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। सोमवार को हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के तत्काल बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे बागी विधायकों को वहां से भी कोई राहत नहीं मिली।  

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शक्ति परीक्षण से पहले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट ने स्पीकर के आदेश को सही करार दिया है। न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि सभी नौ बागी विधायक 10 मई को होने वाले फ्लोर टेस्ट के दौरान मतदान नहीं कर सकेंगे। साथ ही याचिकाकर्ताओं से कहा है कि यदि वे चाहें तो स्पीकर के समक्ष पुनर्विचार अर्जी दायर कर सकते हैं।
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पीठ ने बागी विधायकों की दो याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि भले ही विधायकों ने दूसरे दल की सदस्यता नहीं ली, लेकिन उनके आचरण से यह सिद्ध हो चुका है कि विधायकों ने स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता त्याग दी थी। अदालत ने इसे दलबदल कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने का आधार माना।

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सुप्रीम कोर्ट में भी विधायकों को नहीं मिली राहत

rebel MLA can't vote in floor test of uttarakhand assembly.
विधायकों के अयोग्य रहने से विधानसभा का गणित भी बदल गया है।

अदालत ने 57 पेज के फैसले में कहा कि बागी विधायकों ने अपने नेता और अपनी सरकार को ही नहीं छोड़ा, बल्कि असहमति के नाम पर अपने आचरण से उन्होंने अपनी पार्टी को भी छोड़ दिया। वरना बागी विधायक (भाजपा विधायकों के साथ) संयुक्त ज्ञापन में यह नहीं कहते कि उन्होंने विनियोग विधेयक के विरोध में मतदान किया है। सरकार अल्पमत में है और हरीश रावत कैबिनेट को बर्खास्त किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का फैसला आते ही बागी विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी इन नौ विधायकों को किसी प्रकार की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने नौ विधायकों को फ्लोर टेस्ट में हिस्सा लेने की इजाजत देने से इनकार किया है।

पीठ ने कहा है कि तय दिन और समय के तहत विधानसभा में फ्लोर टेस्ट होगा। हालांकि पीठ इन नौ विधायकों की याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गई है। जिस पर 12 जुलाई को सुनवाई होगी। इन विधायकों ने अयोग्य ठहराए जाने को चुनौती दी है।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद विधानसभा का गणित

rebel MLA can't vote in floor test of uttarakhand assembly.
उत्तराखंड विधानसभा - फोटो : file photo

नौ विधायकों के अयोग्य रहने से विधानसभा में सदस्यों की संख्या की कुल संख्या 61 रह गई है। इसमें कांग्रेस के पास 27 विधायक हैं। कांग्रेस ने पीडीएफ के छह सदस्यों का समर्थन हासिल होने का दावा भी किया है, जिससे उसके पास कुल 33 विधायकों का समर्थन है। जबकि 61 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा पाने के लिए हरीश रावत को 31 का जादुई आंकड़ा पाने की जरूरत है। वहीं, भाजपा के 28 विधायक हैं, जिनमें भीम लाल आर्य पर भाजपा को भी भरोसा नहीं है। पीडीएफ में दो विधायक बसपा के, एक यूकेडी और तीन निर्दलीय शामिल हैं। 

ये हैं बागी विधायक
कांग्रेस के नौ बागी विधायकों में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत, विधायक सुबोध उनियाल, शैला रानी रावत, उमेश शर्मा काऊ,  कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, अमृता रावत, शैलेंद्र मोहन सिंघल व प्रदीप बत्रा शामिल हैं। इनमें विजय बहुगुणा को छोड़ आठ विधायकों ने हाईकोर्ट में 27 मार्च को याचिका दायर कर स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल की ओर से उनकी सदस्यता समाप्त करने के आदेश को चुनौती दी थी। 

बागी विधायकों ने लगाया था स्पीकर पर आरोप

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बागी विधायकों ने हरीश रावत के खिलाफ सदन में ही मोर्चा खोल दिया था। - फोटो : AmarUjala

कांग्रेस के बागी विधायकों ने अपनी याचिका में कहा था कि स्पीकर का आदेश प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। उन्होंने दुर्भावना व राजनीति से प्रेरित होकर बिना सुनवाई का मौका दिए आदेश पारित कर दिया। विधायकों के मुताबिक उन्होंने मुख्यमंत्री हरीश रावत को बदलने की मांग की थी। अपनी पार्टी की कभी मुखालफत नहीं की, इसलिए उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता है। 

हाईकोर्ट ने कहा
पीठ ने कहा सरकार या नेता को त्यागने या पार्टी त्यागने के बीच के अंतर की रेखा बहुत ही महीन है। असहमति तो मान्य है, लेकिन यह पार्टी त्यागने में नहीं बदल जाना चाहिए। एक सीमा से ज्यादा असहमति को दसवीं अनुसूची के खंड 2(1)(क) के तहत पार्टी छोड़ना ही माना जाएगा।

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