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एनडीए में डिनर से पहले दरार, केन्द्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा का भोज में शामिल होने से इंकार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
Updated Thu, 07 Jun 2018 03:05 PM IST
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उपेंद्र कुशवाहा
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लोकसभा चुनाव से पहले हिस्सेदारी को लेकर राजग में चल रहे विवाद के बीच भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आज पटना आ रहे हैं। वहीं रालोसपा के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा आज पटना में आयोजित राजग के भोज में शामिल नहीं होने का फैसला लिया है। भाजपा आज सहयोगी दलों के लिए पटना में भव्य भोज का आयोजन किया है। इस मौके पर राजग के अंदर उभरे मतभेदों को व्यक्त कर रहे नेताओं से मुलाकात कर गठबंधन की मजबूती पर बल देने की कवायद माना जा रहा है। लेकिन भोज से पहले ही भाजपा को उपेंद्र कुशवाहा ने झटका दे दिया है।
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इस भोज में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा नेता व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, केंद्रीय मंत्री व लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान तथा केंद्रीय मंत्री व रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा हिस्सा लेंगे। इस संबंध में पार्टी के एक नेता ने कहा है कि भाजपा महासचिव और पार्टी के बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव, प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष नित्यानंद राय और राजग के अन्य सहयोगी भी भोज में हिस्सा लेंगे।
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वहीं जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव श्याम रजक ने कहा कि नीतीश कुमार महत्वपूर्ण भूमिका में रहे हैं। हमने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इससे कम सीटों पर चुनाव लड़ने का कोई सवाल ही नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर एनडीए नीतीश कुमार की छवि का फायदा उठाना चाहता है तो उसे जेडीयू के साथ न्याय करना होगा। उन्होंने कहा कि हम विचारधारा और नीतियों के आधार पर एनडीए के साथ हैं, लेकिन यह कहना झूठ नहीं होगा कि हमारे साथ अन्याय हुआ है। हमें जिस तरह से प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली।
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पिछले चुनाव में लोजपा पांच और रालोसपा ने तीन सीटों पर जीत हासिल की थी। अगर सीटिंग फार्मूले पर हिस्सेदारी की बात होती है, तो जदयू को नौ से अधिक सीट मिलना असंभव है, जबकि जदयू की बात अगर सुनी जाएगी तो भाजपा को अपने आठ सांसदों की बलि देनी पड़ सकती है। ऐसे में 15-15 सीटों पर भाजपा, पांच सीटों पर लोजपा, तीन सीटों पर रालोसपा और एक-एक सीट अरुण कुमार और पप्पू यादव जैसों के लिए छोड़ा जा सकता है।
जानकारों का कहना है कि ऐसे किसी फार्मूले पर भाजपा शायद ही राजी हो। यह सच है कि उपचुनाव के बाद भाजपा कमजोर हुई है, लेकिन इतनी भी कमजोर नहीं हुई है कि वो अपने घटक दलों के आगे घुटने टेक दे। अपनी ताकत को साधने के लिए ही भाजपा प्रमुख अमित शाह ने सहयोगी दलों से संपर्क साधने का अभियान चलाया है।