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पहली इंडियन टीम की जर्सी कभी नहीं उतारती थी। : मनु भाकर
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01jjrp11- ओलंपियन मनु भाकर।
साल्हावास। ओलंपियन, भीम, अर्जुन अवाॅर्डी गोरिया गांव निवासी मनु भाकर ने शूटिंग खेलते हुए एक दशक पूरा कर लिया है। उन्होंने अपने कॅरिअर के स्वर्णिम पलों को याद करते हुए सोशल मीडिया पर शेयर किया। लिखा कि जब मुझे पहली इंडियन टीम की जर्सी मिली थी तो मैं उसे कभी नहीं उतारती थी।
100 से ज्यादा इंटरनेशनल मेडल उन्होंने एक दशक के कॅरिअर में जीते। मनु भाकर लिखती हैं कि कभी सोचा भी नहीं था कि सफर इतना खूबसूरत, प्रेरणा देने वाला होगा। परिवार हमेशा मेरी ताकत रहा है। गर्मियों में भी अपना सारा समय पिस्टल और इक्विपमेंट के साथ बिताता थी।
मनु भाकर ने बताया कि पहली सीनियर वर्ल्ड कप जीत 2018 में हुई। वह उस समय 16 साल की ही थीं। इससे कॉन्फिडेंस मिला। अप्रैल 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स ऑस्ट्रेलिया में मैंने गोल्ड जीता था और रिकॉर्ड तोड़े थे। मुझे याद है कि कॉमनवेल्थ गेम्स असल में क्या होता है। इससे वह बिल्कुल अंजान थीं।
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मनु भाकर का कहना है कि शुरुआती दिन संघर्ष भरे नहीं थे। पेरिस 2024 से ठीक पहले उनके मन में टोक्यो 2020 के कई विचार थे। भगवत गीता का पाठ किया और अपने अतीत से उबरने और वर्तमान और भविष्य के लिए मजबूत बनने में मदद की। जो भी हो तालियां तो बनती हैं। इतना सफर तय करने पर और आगे बढ़ते रहने के लिए। अंत में उन्होंने कहा कि अच्छा बनो, आस्था या विश्वास होना चाहिए। बस लाइफ ऐसी हो की पीछे मुड़कर देखो तो मजा आ जाए।
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100 से ज्यादा इंटरनेशनल मेडल उन्होंने एक दशक के कॅरिअर में जीते। मनु भाकर लिखती हैं कि कभी सोचा भी नहीं था कि सफर इतना खूबसूरत, प्रेरणा देने वाला होगा। परिवार हमेशा मेरी ताकत रहा है। गर्मियों में भी अपना सारा समय पिस्टल और इक्विपमेंट के साथ बिताता थी।
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मनु भाकर ने बताया कि पहली सीनियर वर्ल्ड कप जीत 2018 में हुई। वह उस समय 16 साल की ही थीं। इससे कॉन्फिडेंस मिला। अप्रैल 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स ऑस्ट्रेलिया में मैंने गोल्ड जीता था और रिकॉर्ड तोड़े थे। मुझे याद है कि कॉमनवेल्थ गेम्स असल में क्या होता है। इससे वह बिल्कुल अंजान थीं।
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मनु भाकर का कहना है कि शुरुआती दिन संघर्ष भरे नहीं थे। पेरिस 2024 से ठीक पहले उनके मन में टोक्यो 2020 के कई विचार थे। भगवत गीता का पाठ किया और अपने अतीत से उबरने और वर्तमान और भविष्य के लिए मजबूत बनने में मदद की। जो भी हो तालियां तो बनती हैं। इतना सफर तय करने पर और आगे बढ़ते रहने के लिए। अंत में उन्होंने कहा कि अच्छा बनो, आस्था या विश्वास होना चाहिए। बस लाइफ ऐसी हो की पीछे मुड़कर देखो तो मजा आ जाए।