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मौजीराम हर साल बारात लेकर जाते हैं और खाली हाथ लौटते हैं...
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Fri, 10 Mar 2017 02:25 PM IST
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बूसी गांव में मौजीराम की मूर्ति
- फोटो : amar ujala
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राजस्थान में मौजीराम हर साल बारात लेकर जाते हैं और खाली हाथ लौटते हैं...। यहां के पाली जिले में बूसी गांव में हर साल धुलण्डी पर बारात निकलती है। गांव में यह परम्परा सालों से चली आ रही है। सोमेसर के बूसी गांव में हर साल धुलण्डी के दिन मौजीराम और मौजनी देवी का विवाह किया जाता है। इसके लिए बाकायदा बारात निकाली जाती है।
मान्यता है कि पिछले करीब सैकड़ों साल से ऐसा चलता आ रहा है। करीब 500 साल पहले जैन बोहरा परिवार ने मौजीराम और मौजमी देवी की मूर्ति बूसी गांव में स्थापित की थी। मौजीराम की प्रतिमा यहां जैन मंदिर के पास है और मौजमी देवी की मूर्ति ब्रह्मपुरी में लगाई गई है। लोगों का कहना है कि यहां जो भी मन्नत मांगते हैं वह पूरी होती है। मौजीराम का विवाह समारोह धुलण्डी के दिन शुरू होता है। गांव और आसपास के लोग पहले इसके लिए विधि—विधान से पूजन करते हैं।
फिर धूमधाम से बारात निकाली जाती है। यह बारात गांव के गली—मोहल्लों से निकलती है जिसमें हर धर्म और जाति के लोग शामिल होते है। छतों पर खड़े लोग बारात की अगवानी करते हुए गुलाल और फूलों की वर्षा करते है। जैन मंदिर से बारात शुरू होती है। जहां से मौजीराम की मूर्ति को कंधे पर उठाकर ले जाया जाता है। बारात सुनारों के बास में जाकर रुकती है। गांव के ठाकुर रावले में हिंदु रीति—रिवाज से विवाह के विधान पूरे किए जाते हैं। इस दौरान स्त्रियां मंगल गीत गाती है।
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विवाह की संपूर्ण विधि पूरी होने के बाद मौजीराम को वापस पहले वाले स्थान पर ही ले जाकर स्थापित कर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो विवाह के बाद ही शिव का प्रतीक माने जाने वाले दूल्हे मौजीराम का मौजनी देवी से वियोग भी हो जाता है।
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मान्यता है कि पिछले करीब सैकड़ों साल से ऐसा चलता आ रहा है। करीब 500 साल पहले जैन बोहरा परिवार ने मौजीराम और मौजमी देवी की मूर्ति बूसी गांव में स्थापित की थी। मौजीराम की प्रतिमा यहां जैन मंदिर के पास है और मौजमी देवी की मूर्ति ब्रह्मपुरी में लगाई गई है। लोगों का कहना है कि यहां जो भी मन्नत मांगते हैं वह पूरी होती है। मौजीराम का विवाह समारोह धुलण्डी के दिन शुरू होता है। गांव और आसपास के लोग पहले इसके लिए विधि—विधान से पूजन करते हैं।
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फिर धूमधाम से बारात निकाली जाती है। यह बारात गांव के गली—मोहल्लों से निकलती है जिसमें हर धर्म और जाति के लोग शामिल होते है। छतों पर खड़े लोग बारात की अगवानी करते हुए गुलाल और फूलों की वर्षा करते है। जैन मंदिर से बारात शुरू होती है। जहां से मौजीराम की मूर्ति को कंधे पर उठाकर ले जाया जाता है। बारात सुनारों के बास में जाकर रुकती है। गांव के ठाकुर रावले में हिंदु रीति—रिवाज से विवाह के विधान पूरे किए जाते हैं। इस दौरान स्त्रियां मंगल गीत गाती है।
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विवाह की संपूर्ण विधि पूरी होने के बाद मौजीराम को वापस पहले वाले स्थान पर ही ले जाकर स्थापित कर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो विवाह के बाद ही शिव का प्रतीक माने जाने वाले दूल्हे मौजीराम का मौजनी देवी से वियोग भी हो जाता है।