छत्तीसगढ़: ऐसा क्या हुआ कि इस बार 'चाउर वाले बाबा' का जादू प्रदेश में नहीं चला?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर Updated Tue, 11 Dec 2018 04:10 PM IST
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raman singh
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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के वोटों की गिनती जारी है। शुरुआती रुझानों में कांग्रेस ने जबरदस्त बढ़त बनाई हुई है, जबकि भाजपा इस बार अपना किला बचाने में पूरी तरह से नाकामयाब रही है। 'चाउर वाले बाबा' के नाम से मशहूर प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी जादू इस बार फेल हो गया और भाजपा पूरे प्रदेश में धराशायी हो गई।  
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अब सवाल ये उठता है कि आखिर क्या कारण हैं कि जो शख्स लगातार 15 सालों तक प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा, लोग उसे 'चाउर वाले बाबा' के नाम से जानते हैं, अचानक उसका जादू कैसे खत्म हो गया? इस सवाल का जवाब जानने से पहले ये जान लेते हैं कि रमन सिंह को आखिर 'चाउर वाले बाबा' क्यों कहा जाता है? 


दरअसल, साल 2003 में रमन सिंह अपने बेहतरीन काम और साफ छवि के चलते चुनाव जीतकर पहली बार प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे। इसके बाद भी उनके विकास कार्य जारी रहे। इस दौरान उन्होंने प्रदेश के बुनियादी ढांचे पर काम किया, जैसे कि सड़क और बिजली।

इसके अलावा इंसान की जो बुनियादी जरूरत होती है- खाना, उसपर ध्यान दिया और पूरे प्रदेश में एक योजना शुरू की, जिसके तहत गरीबों को 2-3 रुपये किलो चावल बांटा गया। बस यहीं से रमन सिंह का एक नया नाम पड़ा- चाउर वाले बाबा यानी चावल वाले बाबा। चलिए अब जान लेते हैं कि 'चाउर वाले बाबा' यानी रमन सिंह का जादू इस बार प्रदेश में क्यों नहीं चला? 

इसके कई कारण हैं। पहला ये कि साल 2003 से लगातार सत्ता में रही भाजपा को इस बार विरोधी लहर का सामना करना पड़ा। कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए इस बार जीतोड़ मेहनत की और डॉ. रमन सिंह के खिलाफ खूब प्रचार-प्रसार किया, जिसका फायदा भी उन्हें मिला और भाजपा का मजबूत गढ़ कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में उसका का सूपड़ा साफ हो गया।   

दूसरा कारण है राज्य के किसानों की सरकार के प्रति नाराजगी। राज्य में भले ही रमन सिंह को 'चाउर वाले बाबा' के नाम से जाना जाता हो, लेकिन इस बार की हकीकत कुछ और ही थी। इस बार किसानों की नाराजगी उनपर भारी पड़ी है और किसानों का ये गुस्सा इस बार सरकार के खिलाफ वोट के रूप में निकल कर आया। दरअसल, पिछले कुछ महीनों की बात करें तो पूरे देश के किसानों ने इस बार एकजुट होकर मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया और निश्चित तौर पर इस प्रदर्शन का असर राज्यों पर भी पड़ा। 
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सरकार बनाने की चाबी आदिवासियों के हाथ 

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