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राजिम कुंभ कल्प मेला: संगम में बस रहा अस्थाई शहर, हजारों साधु संत और नागा होंगे शामिल; कल्पवाश से होगी शुरुआत

Wed, 21 Feb 2024 07:37 PM IST
श्याम जी. अमर उजाला नेटवर्क, गरियाबंद
अमर उजाला नेटवर्क, गरियाबंद Published by: श्याम जी. Updated Wed, 21 Feb 2024 07:37 PM IST
सार

राजिम कुंभ कल्प मेला में विभिन्न जगहों से हजारों साधु-संतो का आगमन होता है। प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में नागा साधु सहित अन्य संत आदि आते हैं और विशेष पर्व स्नान तथा संत समागम में भाग लेते हैं। 
 

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Rajim Kumbh Kalp Mela 2024 start from Kalpwash in Gariaband
कुलेश्वर नाथ महादेव मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित पवित्र धार्मिक नगरी त्रिवेणी संगम राजिम में प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक 15 दिनों का मेला लगता है। राजिम में तीन नदियों का संगम है, इसलिए इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। यहां मुख्य रूप से तीन नदियां बहती हैं, जिनके नाम क्रमशः महानदी, पैरी नदी और सोंढूर हैं। संगम स्थल पर कुलेश्वर महादेव जी विराजमान हैं। राज्य शासन द्वारा वर्ष 2001 से राजिम मेले को राजीव लोचन महोत्सव के रूप में मनाया जाता था। वर्ष 2005 से इसे और भव्य रूप के साथ राजिम कुंभ कल्प मेला के रूप में मनाया जा रहा है।

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यह आयोजन छत्तीसगढ़ शासन धर्मस्व एवं पर्यटन विभाग एवं स्थानीय आयोजन समिति के तत्वाधान में होता है। मेला की शुरुआत कल्पवाश से होती है। पखवाड़े भर पहले से श्रद्धालु पंचकोशी यात्रा प्रारंभ कर देते हैं। पंचकोशी यात्रा में श्रद्धालु पटेश्वर, फिंगेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर तथा चम्पेश्वर नाथ के पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धुनी रमाते है। 101 किमी की यात्रा का समापन होता है और माघ पूर्णिमा से मेला का आगाज होता है। 
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राजिम कुंभ कल्प मेला में विभिन्न जगहों से हजारों साधु-संतो का आगमन होता है। प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में नागा साधु सहित अन्य संत आदि आते हैं और विशेष पर्व स्नान तथा संत समागम में भाग लेते हैं। प्रतिवर्ष होने वाले इस मेला में विभिन्न राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं और भगवान श्री राजीव लोचन व श्री कुलेश्वर नाथ महादेव जी के दर्शन कर अपना जीवन धन्य मानते हैं। लोगों में मान्यता है की भगवान जगन्नाथपुरी जी की यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाती, जब तक भगवान श्री राजीव लोचन तथा श्री कुलेश्वर नाथ के दर्शन नहीं कर लिए जाते। राजिम कुंभ कल्प मेला का अंचल में अपना एक विशेष महत्व है।
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राजिम अपने आप में एक विशेष महत्व रखने वाला एक छोटा सा शहर है। राजिम गरियाबंद जिले की एक तहसील है। प्राचीन समय से राजिम अपने पुरातत्वों और प्राचीन सभ्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। राजिम मुख्य रूप से भगवान श्री राजीव लोचन जी के मंदिर के कारण प्रसिद्ध है। राजिम का यह मंदिर आठवीं शताब्दी का है। यहां कुलेश्वर महादेव जी का भी मंदिर है, जो संगम स्थल पर विराजमान है। राजिम में यह मेला प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक चलता है। इस दौरान प्रशासन द्वारा विविध सांस्कृतिक व धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।

स्थानीय ब्राह्मणों ने शासन को धरना प्रदर्शन की दी चेतावनी
राजिम कुंभ कल्प 2024 का प्रधान धार्मिक उत्सव महानदी महाआरती का आजपर्यंत तक दिशानिर्देश एवं कार्यादेश शासन द्वारा जारी नहीं करने पर स्थानीय ब्राह्मणों मे काफी रोष की स्थिति निर्मित हो गई है। जिस कारण आज गायत्री मंदिर राजिम में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल एवं स्थानीय ब्राह्मणों  की संयुक्त बैठक आयोजित की गई। स्थानीय ब्राह्मणों ने संयुक्त रूप से विज्ञप्ति जारी कर यह कहा कि पिछले डेढ़ महीने से माननीय बृजमोहन अग्रवाल जी एवं जिला प्रशासन को विधिवत आवेदन प्रस्तुत करने के उपरांत भी आज पर्यंत तक स्थानीय विप्र समिति के नाम से गंगा महाआरती हेतु कार्यादेश जारी नहीं किया गया है जो अत्यंत ही दुर्भाग्यजनक एवं चिंतन का विषय है। 

विदित हो,कि पिछले पंचवर्षीय कांग्रेस कार्यकाल में स्थानीय ब्राह्मणों के द्वारा ही महानदी महाआरती को अत्यंत ही मौलिकता पूर्ण वैदिक मंत्रों के साथ मुखर होकर संगीतबद्ध आरती की गई है, जिसकी भूरि- भूरि प्रशंसा तत्कालीन मुख्यमंत्री से लेकर सोशल मीडिया एवं सामान्यजन करते आए हैं, श्री राजीव लोचन मंदिर के पुरोहित एवं स्थानीय विप्र समिति के उपाध्यक्ष पं. विजय शर्मा ने बताया कि ऋग्वेद के मंत्रसंहिता, आचारदीपक, कर्मकांडभास्कर धर्मग्रंथो के अनुसार पूजन विधान में प्रत्यक्ष एवं मुखर वैदिक ऋचाओं का वाचन ही उचित एवं श्रेष्ठ माना गया है। 


बजरंग दल के जिला मठ मंदिर प्रमुख पंडित ऋषि तिवारी ने भी बताया कि  काशी, हरिद्वार जैसे महान तीर्थ स्थलों में भी गंगा महाआरती मुखर एवं प्रत्यक्ष रूप से की जाती है। और उसी विधान का पालन करते हुए हम सभी राजिम एवं नवापारा के स्थानीय ब्राह्मण पिछले 5 वर्षों से एवं वर्ष भर होने वाले महापर्वों में मौलिकता पूर्ण मुखर आरती करते आए हैं।

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