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सीजी: पत्नी को लगातार प्रताड़ित कर आत्महत्या के लिए मजबूर करना दुष्प्रेरण, हाईकोर्ट ने पति को ठहराया जिम्मेदार
Sun, 04 Oct 2026 01:59 PM IST
हिमांशु सिंह बघेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिलासपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिलासपुर
Published by: हिमांशु सिंह बघेल
Updated Sun, 04 Oct 2026 01:59 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या से जुड़े मामले में लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना को आत्महत्या के दुष्प्रेरण की परिस्थितियों से जोड़ा है। अदालत ने कहा कि यदि किसी महिला को इस तरह प्रताड़ित किया जाए कि उसे आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न दिखाई दे, तो ऐसी स्थिति धारा 306 के तहत दुष्प्रेरण का अपराध बन सकती है।
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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
- फोटो : C.G. High Court
विस्तार
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पत्नी की आत्महत्या से जुड़े मामले में चिकित्सक पति को उत्तरदायी ठहराते हुए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनवरत शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न से ऐसा वातावरण निर्मित करना, जिसमें महिला के पास जान देने के अलावा कोई अन्य विकल्प न बचे, आत्महत्या के दुष्प्रेरण की श्रेणी में आता है। सिविल लाइन थाना क्षेत्र निवासी रश्मि प्रकाश की घर में फांसी लगाकर हुई मृत्यु के मामले में उनके भाई आशीष नाथ ने पति डॉ. संजय प्रकाश पर गंभीर हिंसा और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
निचली अदालत के फैसले को दी गई चुनौती
प्रकरण में निचली अदालत ने 28 जून 2016 को निर्णय सुनाते हुए डॉ. संजय प्रकाश को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत तीन वर्ष के कारावास तथा 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हालांकि, निचली अदालत ने आरोपी को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से मुक्त कर दिया था। इस निर्णय के विरुद्ध मृतका के भाई ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। वहीं, चिकित्सक ने भी अपनी तीन वर्ष की सजा को रद्द करने की मांग करते हुए अपील प्रस्तुत की थी।
बच्चों के बयानों से सामने आई प्रताड़ना
मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने मृतका के पुत्र रोहित और पुत्री तनिष्का के कथनों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। बच्चों ने अदालत को बताया कि उनके पिता के अपने क्लीनिक में कार्यरत एक नर्स के साथ संबंध थे। मां द्वारा इस संबंध का विरोध करने पर पिता उनके साथ नियमित रूप से मारपीट करते थे। बच्चों ने यह तथ्य भी उजागर किया कि उनकी मां को पानी में नींद की गोलियां मिलाकर दी जाती थीं और घटना से एक दिन पहले भी उनके साथ मारपीट की गई थी। गवाहों के अनुसार, आरोपी अपनी पत्नी को तलाक देकर नर्स से विवाह करने की धमकियां देता था।
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साक्ष्यों का समग्रता से आकलन जरूरी
उच्च न्यायालय ने सभी उपलब्ध साक्ष्यों का पुनरीक्षण करते हुए टिप्पणी की कि निचली अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का पृथक-पृथक मूल्यांकन किया था। परिस्थितियों का एकीकृत विश्लेषण करने पर मामला पूरी तरह अलग रूप ले लेता है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का संदर्भ देते हुए उच्च न्यायालय ने प्रतिपादित किया कि यदि किसी व्यक्ति के साथ लगातार ऐसा व्यवहार किया जाए कि उसे आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प दिखाई न दे, तो ऐसी परिस्थितियां धारा 306 के तहत आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध गठित करती हैं। इस आधार पर उच्च न्यायालय ने आरोपी पति की भूमिका को अत्यंत गंभीर माना है।
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निचली अदालत के फैसले को दी गई चुनौती
प्रकरण में निचली अदालत ने 28 जून 2016 को निर्णय सुनाते हुए डॉ. संजय प्रकाश को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत तीन वर्ष के कारावास तथा 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हालांकि, निचली अदालत ने आरोपी को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से मुक्त कर दिया था। इस निर्णय के विरुद्ध मृतका के भाई ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। वहीं, चिकित्सक ने भी अपनी तीन वर्ष की सजा को रद्द करने की मांग करते हुए अपील प्रस्तुत की थी।
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बच्चों के बयानों से सामने आई प्रताड़ना
मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने मृतका के पुत्र रोहित और पुत्री तनिष्का के कथनों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। बच्चों ने अदालत को बताया कि उनके पिता के अपने क्लीनिक में कार्यरत एक नर्स के साथ संबंध थे। मां द्वारा इस संबंध का विरोध करने पर पिता उनके साथ नियमित रूप से मारपीट करते थे। बच्चों ने यह तथ्य भी उजागर किया कि उनकी मां को पानी में नींद की गोलियां मिलाकर दी जाती थीं और घटना से एक दिन पहले भी उनके साथ मारपीट की गई थी। गवाहों के अनुसार, आरोपी अपनी पत्नी को तलाक देकर नर्स से विवाह करने की धमकियां देता था।
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साक्ष्यों का समग्रता से आकलन जरूरी
उच्च न्यायालय ने सभी उपलब्ध साक्ष्यों का पुनरीक्षण करते हुए टिप्पणी की कि निचली अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का पृथक-पृथक मूल्यांकन किया था। परिस्थितियों का एकीकृत विश्लेषण करने पर मामला पूरी तरह अलग रूप ले लेता है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का संदर्भ देते हुए उच्च न्यायालय ने प्रतिपादित किया कि यदि किसी व्यक्ति के साथ लगातार ऐसा व्यवहार किया जाए कि उसे आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प दिखाई न दे, तो ऐसी परिस्थितियां धारा 306 के तहत आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध गठित करती हैं। इस आधार पर उच्च न्यायालय ने आरोपी पति की भूमिका को अत्यंत गंभीर माना है।