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बिलासपुर: बीमार माता-पिता से अलग रहने का दबाव क्रूरता, हाई कोर्ट ने पति को दी तलाक की मंजूरी

Fri, 04 Sep 2026 05:46 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Fri, 04 Sep 2026 05:46 PM IST
सार

बीमार और बुजुर्ग माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाना और पति पर झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

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Pressure to live separately from ailing parents is cruelty, High Court grants divorce to husband
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बीमार और बुजुर्ग माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाना और पति पर झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एनके चंद्रवंशी की एकल पीठ ने वैवाहिक विवाद मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली है। साथ ही, उच्च न्यायालय ने पेंड्रा रोड स्थित निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति की तलाक अर्जी खारिज कर दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि शादी के बाद नया परिवार बनता है, लेकिन यह किसी व्यक्ति को अपने बीमार माता-पिता के प्रति नैतिक और कानूनी दायित्वों से मुक्त नहीं करता।
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उत्तर प्रदेश के इटावा निवासी विवेक अग्रवाल का विवाह 12 दिसंबर 2014 को पेंड्रा रोड की निवासी महिला के साथ हुआ था। दोनों का एक बेटा भी है। पति के अनुसार, उसकी पत्नी छोटी-छोटी बातों पर विवाद करती थी और उसकी वृद्ध तथा बीमार मां को छोड़कर अलग बड़े मकान में रहने की जिद करती थी। जब उसने अपनी मना किया, तो दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। इसके बाद 11 अगस्त 2019 को पत्नी बिना अनुमति के घर से नकदी और गहने लेकर अपने मायके पेंड्रा रोड चली गई। उसने अपने बेटे को इटावा में ही छोड़ दिया था।
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निचली अदालत ने खारिज की याचिका
ससुराल वापस न लौटने पर पति ने वर्ष 2022 में पेंड्रा रोड स्थित अदालत में क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने 18 फरवरी 2025 को याचिका खारिज कर दी थी। निचली अदालत का मानना था कि पति अपनी पत्नी के विरुद्ध लगाए गए क्रूरता के आरोपों को सिद्ध नहीं कर पाया है। निचली अदालत के इसी निर्णय को पति ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
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बेटे का इन्कार, पूरी तरह स्वाभाविक
मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि अपनी बीमार मां को बेसहारा छोड़ने से इन्कार करना किसी भी बेटे के लिए पूरी तरह स्वाभाविक है। बिना किसी ठोस कारण के पति को उसकी मां से अलग करने का दबाव बनाना स्वयं में क्रूरता है। अदालत ने देखा कि वर्ष 2019 से दोनों अलग रह रहे हैं और उनके बीच लगातार विवाद तथा झूठे आपराधिक मामलों के कारण आपसी विश्वास समाप्त हो चुका है। इस आधार पर उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए तलाक की मंजूरी दे दी।
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