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अरपा नदी पर मंडराया प्रदूषण का संकट!: बिलासपुर का 40% गंदा पानी बिना उपचार सीधे नदी में, सरकार ने मानी बात
Tue, 01 Sep 2026 07:15 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Tue, 01 Sep 2026 07:15 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने स्वीकार किया है कि बिलासपुर शहर से रोजाना निकलने वाले 72.20 एमएलडी गंदे पानी में से करीब 40 फीसदी बिना उपचार के सीधे अरपा नदी में गिर रहा है।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने स्वीकार किया है कि बिलासपुर शहर से रोजाना निकलने वाले 72.20 एमएलडी गंदे पानी में से करीब 40 फीसदी बिना उपचार के सीधे अरपा नदी में गिर रहा है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में अरपा नदी के जल प्रदूषण को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार पिंगुआ ने शासन की ओर से शपथपत्र प्रस्तुत कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की।
शासन ने अदालत को बताया कि वर्ष 2026 तक बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र की अनुमानित आबादी 6,68,540 हो जाएगी। शहर से प्रतिदिन औसतन 72.20 एमएलडी गंदा पानी निकल रहा है। वर्तमान में 78 एमएलडी की कुल क्षमता वाले चार एचटीपी संचालित हैं, लेकिन इनसे केवल 43.90 एमएलडी सीवेज ही ट्रीट हो पा रहा है।
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इस प्रकार लगभग 28.30 एमएलडी सीवेज का उपयोग शोधन प्रणाली में नहीं हो पा रहा है, जिससे अरपा के अस्तित्व और संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ गई है। शहर में 70 नाले हैं, जिनमें 35 उत्तरी और 35 दक्षिणी छोर पर हैं। इनमें पांच उत्तरी और छह दक्षिणी प्रमुख नाले शामिल हैं। ये नाले सीवेज को एचटीपी तक पहुंचाने के साथ कुछ स्थानों पर सीधे नदी में मिल रहे हैं।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि मंगला में 16 एमएलडी क्षमता के दो नए एसटीपी तैयार किए जा रहे हैं। इनमें मंगला-बी संयंत्र की क्षमता 10 एमएलडी है और इसका करीब 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। प्रशासन ने 31 दिसंबर तक इसका इलेक्ट्रोमैकेनिकल कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा है। वहीं, छह एमएलडी क्षमता वाले मंगला-डी संयंत्र का सिविल और इलेक्ट्रोमैकेनिकल काम पूरा हो चुका है और फिलहाल इसका ट्रायल रन चल रहा है।
दोनों नए संयंत्रों के चालू होने पर बिलासपुर की कुल सीवेज शोधन क्षमता 78 से बढ़कर 94 एमएलडी पहुंच जाएगी। सरकार ने अदालत में स्वीकार किया कि मौजूदा एचटीपी की कम उपयोगिता को दूर करना बेहद आवश्यक है। इसके लिए नगरीय प्रशासन विभाग तकनीकी परीक्षण कर नई कार्ययोजना तैयार कर रहा है। विभाग का मुख्य ध्येय है कि शत-प्रतिशत सीवेज का शोधन करने के बाद ही जल को अरपा नदी में छोड़ा जाए, जिससे नदी के जल को प्रदूषित होने से रोका जा सके।
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मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में अरपा नदी के जल प्रदूषण को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार पिंगुआ ने शासन की ओर से शपथपत्र प्रस्तुत कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की।
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शासन ने अदालत को बताया कि वर्ष 2026 तक बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र की अनुमानित आबादी 6,68,540 हो जाएगी। शहर से प्रतिदिन औसतन 72.20 एमएलडी गंदा पानी निकल रहा है। वर्तमान में 78 एमएलडी की कुल क्षमता वाले चार एचटीपी संचालित हैं, लेकिन इनसे केवल 43.90 एमएलडी सीवेज ही ट्रीट हो पा रहा है।
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इस प्रकार लगभग 28.30 एमएलडी सीवेज का उपयोग शोधन प्रणाली में नहीं हो पा रहा है, जिससे अरपा के अस्तित्व और संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ गई है। शहर में 70 नाले हैं, जिनमें 35 उत्तरी और 35 दक्षिणी छोर पर हैं। इनमें पांच उत्तरी और छह दक्षिणी प्रमुख नाले शामिल हैं। ये नाले सीवेज को एचटीपी तक पहुंचाने के साथ कुछ स्थानों पर सीधे नदी में मिल रहे हैं।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि मंगला में 16 एमएलडी क्षमता के दो नए एसटीपी तैयार किए जा रहे हैं। इनमें मंगला-बी संयंत्र की क्षमता 10 एमएलडी है और इसका करीब 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। प्रशासन ने 31 दिसंबर तक इसका इलेक्ट्रोमैकेनिकल कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा है। वहीं, छह एमएलडी क्षमता वाले मंगला-डी संयंत्र का सिविल और इलेक्ट्रोमैकेनिकल काम पूरा हो चुका है और फिलहाल इसका ट्रायल रन चल रहा है।
दोनों नए संयंत्रों के चालू होने पर बिलासपुर की कुल सीवेज शोधन क्षमता 78 से बढ़कर 94 एमएलडी पहुंच जाएगी। सरकार ने अदालत में स्वीकार किया कि मौजूदा एचटीपी की कम उपयोगिता को दूर करना बेहद आवश्यक है। इसके लिए नगरीय प्रशासन विभाग तकनीकी परीक्षण कर नई कार्ययोजना तैयार कर रहा है। विभाग का मुख्य ध्येय है कि शत-प्रतिशत सीवेज का शोधन करने के बाद ही जल को अरपा नदी में छोड़ा जाए, जिससे नदी के जल को प्रदूषित होने से रोका जा सके।