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मोदी-'राजकुमार' की मुलाकात, गर्माई सियासत
सुदीप ठाकुर/जगदलपुर
Updated Fri, 08 Nov 2013 08:25 PM IST
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भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद पहली बार बस्तर पहुंचे नरेंद्र मोदी ने इस पूर्व रियासत के महल में पहुंचकर महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव के वंशजों से मुलाकात कर यहां की सियासत में हलचल पैदा कर दी।
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मोदी यहां भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में चुनावी रैली को संबोधित करने आए थे। वह 180 वर्ष पहले बने महल में करीब पैंतीस मिनट रहे और उन्होंने बस्तर की पूर्व रियासत के युवा वारिस कमलचंद भंजदेव से बंद कमरे में अकेले में भी चर्चा की।
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हालांकि खुद कमलचंद भंजदेव इसे सौजन्यता भेंट बताते हैं। बस्तर की सियासत के लिहाज से इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि कई दशक बाद महल राजनीतिक तौर पर सक्रिय नजर आ रहा है।
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असल में अगस्त के महीने में जब बंगलुरु और लंदन से पढ़ाई करने वाले कमलचंद भंजदेव ने सियासत में उतरने का संकेत दिया तो कयास लगाए जाने लगे थे कि आखिर वह किस पार्टी का हाथ थामेंगे।
चर्चा तो थी कि कांग्रेस, भाजपा से लेकर पीए संगमा की पार्टी तक की ओर से उन्हें पेशकश थी।
खुद कमलचंद भंजदेव ने अमर उजाला से कहा कि सीपीआई चाहती थी कि मैं उनके साथ जुड़ूं, मगर मैंने देखा कि भाजपा आदिवासियों के हितों की बात कर रही है।
पांच सौ बरस पुरानी बस्तर रियासत ने आजाद भारत में उस वक्त देश और दुनिया का ध्यान खींचा था, जब 25 मई, 1966 को इसी महल में हुए गोलीकांड में प्रवीरचंद भंजदेव सहित अनेक आदिवासी मारे गए थे।
प्रवीरचंद भंजदेव बस्तर के इतिहास के वह शख्स हैं, जिनसे तत्कालीन कांग्रेस सरकार खतरा महसूस कर रही थी और उसे लग रहा था कि वे राज्य से बगावत कर देंगे।
उन्हें राज्य सत्ता ने हमेशा एक विद्रोही की तरह देखा। उम्र के तीसरे दशक में चल रहे कमलचंद भंजदेव महल के शानदार वूडन रूम में इस संवाददाता से चर्चा करते हुए कहते हैं, 'मैं प्रवीरचंद महाराज की विरासत को आगे बढ़ाना चाहता हूं।'
इस महल में प्लेटिनम और गोल्ड रूम भी हैं, जहां उनके पूर्वजों द्वारा बनवाए गए महंगे फर्नीचर, विदेशों से खरीदकर लाए गए फानूस लगे हुए हैं।
कमलचंद भंजदेव ने दो वर्ष पहले प्रवीर सेना का गठन कर सियासी माहौल का जायजा लेने की कोशिश की थी। चर्चा तो थी कि उन्हें भी चुनाव लड़ाया जा सकता है।
बातचीत के दौरान उनका सैमसंग एंड्रॉयड फोन भी बीच बीच में बजता रहता है। इस बीच, उनका सहायक उनका एप्पल का लैपटॉप भी ले आता है, जिससे वे कुछ तस्वीरें दिखाते हैं जो उन्होंने क्षेत्र में घूमते हुए खींच ली थी।
वह कहते हैं कि देखिए लोग किस तरह उन्हें आज भी उसी तरह सम्मान देते हैं, जैसा उनके पूर्वजों को दिया करते थे।
बातचीत के दौरान वे बार-बार दोहराते रहे कि वे तो दंतेश्वरी मंदिर के माटी पुजारी हैं। असल में यहां के आदिवासी अपने महाराज को अपनी ईष्ट देवी दंतेवश्वरी के दूत की तरह ही देखते हैं।
मगर हकीकत यह है कि यह अब सिर्फ रस्मी तौर पर ही रह गया है और वह भी बस्तर के मशहूर दशहरे के समय।
उनसे जब यह पूछा जाता है कि जिस तरह आज भाजपा पांच सौ से अधिक रियासतों का विलय करने वाले देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को पुर्नस्थापित करने की कोशिश कर रही है, क्या बस्तर के संदर्भ में प्रवीर चंद भंजदेव को पुर्नपरिभाषित करने की जरूरत नहीं है?
वह कहते हैं कि मेरे लिए यह कहना उचित नहीं होगा।
वे ऐसे हर सवाल से बचते हैं जो उन्हें असहज करता है। फिर वह माओवादी हिंसा से जुड़ा नीतिगत मसला ही क्यों न हो।
लेकिन मोदी से हुई मुलाकात को लेकर वे जिस तरह उत्साहित नजर आ रहे हैं उससे लगता है कि बस्तर की सियासत में उन्हें जल्द ही कोई बड़ी भूमिका मिल सकती है। अमर उजाला ने जब उनसे पूछा कि आप दोनों के बीच आखिर क्या बात हुई थी, तो वे हंसकर टाल जाते हैं।