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सीजी: सिर्फ रजिस्ट्री से नहीं रुकेगी जांच, आदिवासी जमीन पर गैर-आदिवासी कब्जे को लेकर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

Fri, 04 Sep 2026 06:42 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Fri, 04 Sep 2026 06:42 PM IST
सार

हाई कोर्ट की बिलासपुर स्थित डिवीजन बेंच ने आदिवासी भूमि से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आदिवासी व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर्ड बिक्री विलेख होने के आधार पर राजस्व अधिकारी जांच नहीं रोक सकते। 

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Mere registration won't stop investigation, High Court issues major ruling on non-tribal occupation of tribal
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की बिलासपुर स्थित डिवीजन बेंच ने आदिवासी भूमि से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आदिवासी व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर्ड बिक्री विलेख होने के आधार पर राजस्व अधिकारी जांच नहीं रोक सकते। यदि जमीन पर वास्तविक कब्जा या उपयोग किसी गैर-आदिवासी व्यक्ति का पाया जाता है, तो राजस्व अधिकारी मामले की गहन जांच कर सकते हैं।
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डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के 20 मार्च, 2024 के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। साथ ही, अदालत ने एसडीएम, कलेक्टर और कमिश्नर कोर्ट के पूर्व आदेशों को भी सही ठहराया। हाई कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी का मुख्य उद्देश्य आदिवासी भूमि को ऐसे व्यक्तियों के कब्जे से बचाना है, जो कानूनी रूप से उसके हकदार नहीं हैं। अदालत ने माना कि यदि केवल रजिस्ट्री के नाम पर जांच रोक दी गई, तो आदिवासियों की सुरक्षा के लिए बने कानून का मूल उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाएगा।
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नया बाराद्वार गांव का विवाद
यह पूरा मामला ग्राम नया बाराद्वार की सर्वे नंबर 665/1 की 0.29 एकड़ जमीन से जुड़ा है। यह जमीन शुरुआत में लतीराम और बाद में उनके पुत्र धनीराम के नाम दर्ज थी। धनीराम ने 23 मई 1979 को 5,000 रुपये में यह भूमि आदिवासी समुदाय के फिरतू राम के नाम रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के जरिये हस्तांतरित कर दी थी। फिरतू राम की मृत्यु के पश्चात यह जमीन गोकुल राम के नाम दर्ज हुई और बाद में उनके कानूनी वारिस इस मामले में अपीलकर्ता बने।
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जांच में मिले वास्तविक साक्ष्य
जानकी बाई ने धारा 170-बी के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राजस्व रिकॉर्ड में आदिवासी परिवार का नाम दर्ज होने के बावजूद भूमि पर वास्तविक कब्जा गैर-आदिवासी लखनलाल राठौर का है। जांच के दौरान एसडीएम ने पटवारी रिपोर्ट, गवाहों के बयानों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जमीन आदिवासी के पक्ष में लौटाने का आदेश दिया। कलेक्टर, कमिश्नर और रेवेन्यू बोर्ड ने भी इस फैसले को सही माना था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पटवारी रिपोर्ट, मकान निर्माण, बिजली कनेक्शन और संपत्ति कर भुगतान जैसे तथ्यों के आधार पर भूमि के वास्तविक उपयोग तथा कब्जे की जांच की जा सकती है।
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