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सामान्य हो रहा जनजीवन: 22 साल बाद केरलापेंदा के राम मंदिर में गूंजे घंटे-घड़ियाल, कभी नक्सली हिंसा का था खौफ

Mon, 05 Oct 2026 09:03 AM IST
Dr. Sanjay Pandey डॉ. संजय पांडेय
Updated Mon, 05 Oct 2026 09:03 AM IST
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Life Returning to Normal After 22 Years Ram Temple Keralapenda CG  Temple Bells and Gongs Resonate
केरलापेंदा का राम मंदिर, जहां 22 साल बाद शुरू हुई पूजा। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
बस्तर का जो इलाका कभी नक्सली हिंसा, बारूदी सुरंगों और बंदूक की आवाजों से पहचाना जाता था, आज सुरक्षा बलों की मौजूदगी, गांवों में बढ़ती आवाजाही और सामान्य जीवन की लौटती आहट से बदलता दिख रहा है। सुकमा के पुनर्वास केंद्र से शुरू हुआ सफर जगरगुंडा से आगे केरलापेंदा पहुंचने पर बदलाव की सबसे मार्मिक तस्वीर दिखी। करीब 22 वर्षों तक बंद रहे गांव का श्रीराम मंदिर में फिर घंटियों की गूंज सुनाई देती है।
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वर्ष 2003 में माओवािदयों ने ग्रामीणों को मंदिर बंद रखने और वहां पूजा नहीं करने का फरमान सुनाया था। भय इतना गहरा था कि लोगों ने मंदिर से दूरी बना ली। मंदिर के भीतर भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। लंबे समय तक यहां सन्नाटा रहा। फिर अप्रैल 2025 में हालात बदले। सुरक्षा बलों की मौजूदगी और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई की गई। बंद पड़े कपाट खुले और दोबारा पूजा शुरू हुई। मंदिर पहुंचकर सबसे पहले ध्यान उस बदलाव पर जाता है, जहां कभी भय के कारण दीप नहीं जलता था, वहां अब पूजा की घंटियां सुनाई देती हैं।
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केरलापेंदा की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मार्च-अप्रैल वर्ष 2025 में यहां से 9 समेत कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद गांव को माओवादी मुक्त घोषित किया गया। यह तथ्य बताता है कि बदलाव सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। उसका असर गांव के सामाजिक जीवन पर भी दिखाई देने लगा है।
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शहादत याद दिलाती खूनी सड़क
जगरगुंडा से जब आगे बढ़ते हैं तो रास्ता उस इतिहास से रूबरू कराता है, जिसकी स्मृतियां आज भी इलाके में मौजूद हैं। स्थानीय स्तर पर इस मार्ग की पहचान खूनी सड़क के नाम से हैं, जहां 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला इलाके में नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की जान गई थी। जंगल की शांति के बीच इस घटना का जिक्र आज भी उस दौर की भयावहता को सामने ला देता है।


पूवर्ती में एक अलग तरह की मुलाकात
केरलापेंदा से कुछ घंटे की दूरी पर स्थित पूवर्ती वही गांव है, जिसे कुख्यात नक्सली कमांडर हिडमा के पैतृक गांव के रूप में जाना जाता है। यहां हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से मुलाकात हुई। सवाल सिर्फ अतीत को लेकर नहीं थे। ये जानने की कोशिश थी कि आज गांव में जिंदगी कैसी है। इस मुलाकात ने बस्तर की कहानी का दूसरा पक्ष सामने रखा। किसी हिंसक आंदोलन से जुड़े व्यक्ति का नाम राष्ट्रीय स्तर पर भले ही सुर्खियों में रहा हो लेकिन उसके पीछे परिवार, गांव और आम लोगों की अलग जिंदगी होती है। यहां इस फर्क को महसूस किया जा सकता है।
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