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Hindi News ›   Chhattisgarh ›   Judicial panel indicts senior cop for command failure in 2009 Rajnandgaon naxal attack that killed 29 policemen

मदनवाड़ा नक्सली हमला : 29 पुलिसकर्मी 'नेतृत्व की विफलता' के कारण हुए शहीद, न्यायिक आयोग की रिपोर्ट चौंकाने वाली

Thu, 17 Mar 2022 02:07 AM IST
देव कश्यप पीटीआई, रायपुर
पीटीआई, रायपुर Published by: देव कश्यप Updated Thu, 17 Mar 2022 02:07 AM IST
सार

मदनवाड़ा नक्सली हमले की जांच करने वाले एक सदस्यीय न्यायिक आयोग ने कहा कि यह घटना 'कमांड की विफलता' का परिणाम थी, अभियान का नेतृत्व बेहद गैरजिम्मेदाराना तरीके से किया गया जिसकी वजह से पुलिस बल को भारी नुकसान हुआ।

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Judicial panel indicts senior cop for command failure in 2009 Rajnandgaon naxal attack that killed 29 policemen
नक्सली हमला। (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित राजनांदगांव जिले में 2009 में हुए मदनवाड़ा नक्सली हमले की जांच करने वाले एक सदस्यीय न्यायिक आयोग ने क्षेत्र के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक की भूमिका पर सवाल उठाया है। 

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आयोग ने आईपीएस अधिकारी मुकेश गुप्ता की कड़ी आलोचना की, जो उस समय क्षेत्र में पुलिस महानिरीक्षक के रूप में तैनात थे। आयोग ने कहा कि यह घटना 'कमांड की विफलता' का परिणाम थी, अभियान का नेतृत्व बेहद गैरजिम्मेदाराना तरीके से किया गया जिसकी वजह से पुलिस बल को भारी नुकसान हुआ।
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वहीं तत्कालीन दुर्ग आईजी मुकेश गुप्ता ने रिपोर्ट के निष्कर्षों का विरोध करते हुए कहा है कि उन्हें अपना बचाव करने का कोई मौका नहीं दिया गया है। गुप्ता ने कहा, ‘‘मेरे खिलाफ बड़ी संख्या में दर्ज किए गए मामलों से स्पष्ट है कि सरकार मुझे परेशान कर रही है। हालांकि उच्चत न्यायालय ने उनपर स्थगन लगा दिया है।’’ उन्होंने कहा है कि आयोग ने उनपर जांच आयोग अधिनियम की धाराओं आठ बी एवं आठ सी के प्रावधानों का पालन किए उनपर दोष मढ़ दिया।

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राजनांदगांव जिले के मानपुर थाना क्षेत्र के मदनवाड़ा, कोरकट्टा और कोरकोट्टी गांव के पास 12 जुलाई, 2009 को नक्सलियों ने पुलिस दल पर घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में जिले के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक वीके चौबे समेत 29 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे।


घटना के 10 साल बाद कांग्रेस नीत मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने जनवरी, 2020 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश शंभू नाथ श्रीवास्तव के नेतृत्व में न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। छत्तीसगढ़ विधानसभा में बुधवार को बघेल ने श्रीवास्तव आयोग का प्रतिवेदन और उस पर शासन द्वारा की गई कार्यवाही का विवरण सदन के पटल पर रखा।

आयोग ने हिंदी में तैयार की गई अपनी 109 पन्नों की रिपोर्ट में कहा है, ‘‘तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए तथा साक्ष्यों का परिशीलन करने से यह स्पष्ट होता है कि अगर कमांडर/आईजी (गुप्ता) ने समझदारी या साहस से काम लिया होता, तो परिणाम कुछ और होता। लेकिन उन्होंने जो कुछ भी किया वह कायरतापूर्ण कार्य के अलावा और कुछ नहीं था, क्योंकि उनके पास केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) की इकाइयों को (आमने-सामने) इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त समय था।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘इसमें स्पष्ट है कि पुलिस एक ओर सिर्फ मार झेलने के लिए खड़ी थी और भारी नुकसान उठाया। उसने सामने वाले पर ना कोई हमला किया और न ही हमले को रोका गया। यह इस तथ्य से सिद्ध होता है कि किसी भी नक्सली को किसी तरह की चोट नहीं पहुंची, न ही कोई हताहत हुआ। 

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘मदनवाड़ा शिविर की स्थापना 26 जून, 2009 को बरसात के मौसम में की गई थी। यह साक्ष्य है कि शिविर की स्थापना पुलिस महानिरीक्षक मुकेश गुप्ता के आदेश पर की गई थी। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने बरसात में शिविर लगाने का विरोध भी किया था। वहां सामान्य सुविधाएं भी नहीं थीं।’’ रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘12 जुलाई, 2009 को सुबह करीब छह बजे जब सशस्त्र बल के जवान शौच के लिए गए थे तभी नक्सलियों ने उनपर हमला कर दिया, जिसमें दो जवान शहीद हो गए।’’

उसमें कहा गया है, ‘‘जांच के दौरान यह तथ्य आया है कि आईजी मुकेश गुप्ता ने पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे को घटना के बाद मदनवाड़ा जाने को कहा था। गुप्ता ने यह भी संदेश दिया था कि वह भी थोड़ी देर बाद मदनवाड़ा के लिए निकल रहे हैं।’’ जांच समिति की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘आईजी गुप्ता जानते थे कि पुलिस अधीक्षक चौबे नक्सलियों की हिट लिस्ट में थे, इसके बावजूद उनकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं किया। जबकि सीआरपीएफ, एसटीएफ, जिला बल और अन्य पुलिस अधिकारी वहां विभिन्न करीबी क्षेत्रों में मौजूद थे।’’

उसमें कहा गया है, ‘‘घटना के दिन विनोद चौबे ने मानपुर पुलिस स्टेशन को निर्देश दिया था कि बाइक युक्त पुलिस बल को तैयार रखा जाए। जब चौबे मदनवाड़ा की ओर आगे बढ़ रहे थे तभी उनके पीछे चल रहे वाहन के चालक को गोली लगी। चौबे वहीं रुक गए और मानपुर थाने को खबर किया कि नक्सलियों ने कोरकोट्टी गांव के करीब घात लगाया है।’’

रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘चौबे ने निर्देश दिया कि मोटरसाइकिल युक्त पुलिसकर्मियों को न भेजा जाए। उन्होंने इसकी जानकारी आईजी मुकेश गुप्ता को भी दी। जानकारी मिली है कि इससे पहले ही मोटरसाइकिल युक्त पुलिस दल पहले ही मानपुर से निकल चुका था।’’ रिपोर्ट के अनुसार, घटनास्थल पर मोटरसाइकिल सवार 12 जवानों का पहला पुलिस दल पहुंचा और नक्सलियों की गोलियों का शिकार हुआ, बाद में 12 जवानों का एक और दल पहुंचा और वे सभी भी नक्सलियों की गोलियों से शहीद हो गये। इसके बाद वहां एंटी लैंड माइन व्हीकल पहुंचा, जिसपर नक्सलियों ने भारी गोलीबारी की।

उसमें कहा गया है, ‘‘बचे हुए अतिरिक्त बल को आक्रमण का आदेश देने का पर्याप्त समय था लेकिन उच्चाधिकारी (तत्कालीन आईजी) ने कुछ नहीं किया। वह सिर्फ खुद को गोलियों की बौछार से बचाते रहे और बुलेटप्रुफ वाहन में बैठे रहे।’’ रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘रिकार्ड पर जो तथ्य हैं उनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वरिष्ठतम अधिकारी ने अनेक गलतियां की है और अभियान के दौरान बलों का नेतृत्व उचित तरीके से नहीं किया।’’

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘‘संबंधित अधिकारी के खराब दृष्टिकोण से बड़ी संख्या में ऐसे लोग हताहत हुए जिन्हें आसानी से बचाया जा सकता था। यदि पहले से सक्रिय रहते और योजनाबद्ध तथा उचित तरीके से कार्रवाई करते तो इतने लोग हताहत नहीं होते।’’ रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘आईजी जोन को इस जांच आयोग के समक्ष अपना साक्ष्य देने बुलाया गया लेकिन वे नहीं आए तथा उन्होंने एक आवेदन लगाया कि इस जांच आयोग के अध्यक्ष को ही हटा दिया/छुटकारा दे दिया जाए। यह एक तरह से खुद को प्रस्तुत करने से बचाने जैसा था। उनकी अनुपस्थिति से अनेक प्रश्न अनुत्तरित रह गए हैं।’’

आयोग ने सुझाव दिया है कि नक्सलियों से युद्ध के मैदान में असफल होने का मुख्य कारण अनुभवहीनता तथा कमांडर का त्रुटिपूर्ण निर्णय है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बातों को ध्यान में रखते हुए अनुभवी अधिकारियों को छांटना चाहिए, उन्हें कठिन प्रशिक्षण देना चाहिए और उनकी क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए।


गौरतलब है कि मदनवाड़ा घटना के दौरान दुर्ग क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक रहे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी मुकेश गुप्ता को वर्तमान सरकार ने 2019 में निलंबित कर दिया था। गुप्ता के खिलाफ नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले (2015) की जांच के दौरान कथित रूप से आपराधिक साजिश रचने और अवैध फोन टैप करने का मामला दर्ज किया गया है।

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