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झीरम घाटी नक्सल हमले के 13 साल: महेंद्र कर्मा के शव पर नक्सलियों ने किया था डांस, 30 से ज्यादा हुए थे दिवंगत
Mon, 25 May 2026 04:49 PM IST
Lalit Kumar Singh
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: Lalit Kumar Singh
Updated Mon, 25 May 2026 04:49 PM IST
सार
Jhiram Ghati Naxal Attack: छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी नक्सल हमले का जब भी जिक्र होता है तो कांग्रेसी वो तस्वीर याद कर कांप जाते हैं।
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- फोटो : Amar ujala digital
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विस्तार
Jhiram Ghati Naxal Attack 2013: छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी नक्सल हमले का जब भी जिक्र होता है तो कांग्रेसी वो तस्वीर याद कर कांप जाते हैं। लोगों के जेहन में साल 2013 की वो घटना ताजा हो जाती है। 25 मई 2013 का वो दिन छत्तीसगढ़ कभी नहीं भूल सकता। कांग्रेसियों के लिये यह काला दिन है। इस बड़े नक्सली हमले को आज पूरे 13 साल हो गये। आज सोमवार को झीरम घाटी नक्सल हमले की बरसी है। 13 साल पहले आज ही के दिन छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी लहूलुहान हुई थी। उस दिन नक्सलियों ने मौत का तांडव किया था और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता सहित 32 से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।
इस नक्सली नरसंहार के चश्मदीद कांग्रेस नेता शिवसिंह ठाकुर उस घटना को यादकर आज भी कांप उठते हैं। वो भावुक हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि मेरे शरीर से गोलियां तो निकल गईं, लेकिन पीठ में अभी भी धंसे उनके अवशेष आज भी दर्द बनकर कुरेद रहा है।
सुकमा से लौटते वक्त दोपहर 3:30 बज रहे थे, जब हम झीरम घाटी पहुंचे। गाड़ी में अचानक गोली लगने की आवाज आई। मेरे साथी ने बाहर झांककर देखा तो पहाड़ों में कई नक्सली बंदूक लेकर हमला करने के लिये आ रहे थे। इस बीच मुझे और मेरे साथियों को गोली लग गई। कुछ दूर जाने पर नजरों के सामने धुआं छा गया। कुछ देर में गोलियां और मारो-मारो की आवाज आने लगी।
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छोड़ दी थी बचने की उम्मीद
नक्सली कह रहे थे कि महेंद्र कर्मा को सरेंडर करो। जैसे ही कर्मा सामने आए, नक्सली उन्हें बंधक बनाकर ले गए। बंदूक थामे नक्सली गाड़ियों के पास आकर सभी को हाथ ऊपर करके बाहर निकलने को कहा। हमारी गाड़ी में महिला नक्सली पहुंचीं। जख्मी हालत में जब हम हाथ ऊपर कर नीचे आए तो वे हमें 500 फीट ऊपर पहाड़ी पर ले गए। इस दौरान करीब 60 नक्सलियों के बीच घिरे हमने बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी।
नक्सली बोले- सभी लोग मारे जाओगे
मौत के साए में नक्सलियों के बीच घिरे जिंदगी की उम्मीद टूट रही थी। बीच से एक नक्सली ने कहा कि नंदकुमार पटेल कौन हैं? जल्दी से बताओ, नहीं तो सभी मारे जाओगे। इस पर हमारे एक साथी ने हिम्मत दिखाई। नक्सली उन्हें 10 कदम दूर पड़े शव के पास ले जाकर उस व्यक्ति के बारे में पूछने लगे। तब उन्होंने नक्सलियों को बताया कि यह महेंद्र कर्मा हैं, नंदकुमार नहीं। यह सुनकर नक्सली अपने दूसरे गुट को इसकी जानकारी देकर चले गए।
दो कदम चलकर गिर गए, फिर नहीं उठे
नक्सलियों के जाने के बाद हम पहाड़ से पैदल चलकर जैसे-तैसे गाड़ी तक पहुंचे। देखा कि उदय भैया (उदय मुदलियार) गाड़ी में बैठे थे। मैंने कहा, भैया, बाहर आओ, चलते हैं। उन्हें गोली लगी थी। जैसे ही गाड़ी से नीचे उतरे, दो कदम चलकर गिर गए। फिर कभी उठे नहीं। विद्या भैया (विद्याचरण शुक्ल) की गाड़ी के करीब जाकर उन्हें बाहर निकालने में मदद की। गोलियों से लहूलुहान विद्या भैया कराहते हुए पानी-पानी कह रहे थे। विचलित करने वाला वह दृश्य आज भी सोने नहीं देता है।
'बस्तर टाइगर' महेंद्र कर्मा को़ ऐसे उतारा मौत के घाट
माना जाता है कि इस हमले में मुख्य टारगेट बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा थे। सलवा जुडूम का नेतृत्व करने की वजह से नक्सली उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। नक्सलियों ने उनके शरीर पर करीब 100 गोलियां दागीं और चाकू से 50 से ज्यादा वार किए। हत्या के बाद नक्सलियों ने उनके शव पर चढ़कर डांस भी किया था।
'कांप उठती है आत्मा'
नक्सलियों के जाने के बाद सभी घायलों को एंबुलेंस से भेजा जा रहा था, लेकिन हमें नंदकुमार भैया की चिंता थी। जानकारी मिली थी कि नक्सली उन्हें ले गए हैं। ऐसे में अनहोनी का अंदेशा पहले ही लग चुका था। सुबह अस्पताल में इस बात की जानकारी मिली कि वह भी हमारे बीच नहीं रहे। वह भयावह पल याद कर आज आत्मा कांप जाती है। न जाने कितनी रातें बिना सोए गुजरीं। अपनों को खोने का दर्द रह-रहकर सता रहा है। अब बस षड़यंत्रकारियों के चेहरे सामने आने और उन्हें सजा मिलने का इंतजार है।
हमले में 32 लोग हुए थे दिवंगत
इस बड़े नक्सली हमले में बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, उदय मुदलियार, योगेंद्र शर्मा समेत कुल 30 लोग दिवंगत हो गए थे। मामले में कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर सुरक्षा में लापरवाही बरतने और राजनीतिक षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया था। झीरम हमला में लोकतंत्र पर बड़ा हमला था। कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी इस हमले में खत्म हो गई थी। 32 से ज्यादा लोग दिवंगत हुए थे।
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इस नक्सली नरसंहार के चश्मदीद कांग्रेस नेता शिवसिंह ठाकुर उस घटना को यादकर आज भी कांप उठते हैं। वो भावुक हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि मेरे शरीर से गोलियां तो निकल गईं, लेकिन पीठ में अभी भी धंसे उनके अवशेष आज भी दर्द बनकर कुरेद रहा है।
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सुकमा से लौटते वक्त दोपहर 3:30 बज रहे थे, जब हम झीरम घाटी पहुंचे। गाड़ी में अचानक गोली लगने की आवाज आई। मेरे साथी ने बाहर झांककर देखा तो पहाड़ों में कई नक्सली बंदूक लेकर हमला करने के लिये आ रहे थे। इस बीच मुझे और मेरे साथियों को गोली लग गई। कुछ दूर जाने पर नजरों के सामने धुआं छा गया। कुछ देर में गोलियां और मारो-मारो की आवाज आने लगी।
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छोड़ दी थी बचने की उम्मीद
नक्सली कह रहे थे कि महेंद्र कर्मा को सरेंडर करो। जैसे ही कर्मा सामने आए, नक्सली उन्हें बंधक बनाकर ले गए। बंदूक थामे नक्सली गाड़ियों के पास आकर सभी को हाथ ऊपर करके बाहर निकलने को कहा। हमारी गाड़ी में महिला नक्सली पहुंचीं। जख्मी हालत में जब हम हाथ ऊपर कर नीचे आए तो वे हमें 500 फीट ऊपर पहाड़ी पर ले गए। इस दौरान करीब 60 नक्सलियों के बीच घिरे हमने बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी।
नक्सली बोले- सभी लोग मारे जाओगे
मौत के साए में नक्सलियों के बीच घिरे जिंदगी की उम्मीद टूट रही थी। बीच से एक नक्सली ने कहा कि नंदकुमार पटेल कौन हैं? जल्दी से बताओ, नहीं तो सभी मारे जाओगे। इस पर हमारे एक साथी ने हिम्मत दिखाई। नक्सली उन्हें 10 कदम दूर पड़े शव के पास ले जाकर उस व्यक्ति के बारे में पूछने लगे। तब उन्होंने नक्सलियों को बताया कि यह महेंद्र कर्मा हैं, नंदकुमार नहीं। यह सुनकर नक्सली अपने दूसरे गुट को इसकी जानकारी देकर चले गए।
दो कदम चलकर गिर गए, फिर नहीं उठे
नक्सलियों के जाने के बाद हम पहाड़ से पैदल चलकर जैसे-तैसे गाड़ी तक पहुंचे। देखा कि उदय भैया (उदय मुदलियार) गाड़ी में बैठे थे। मैंने कहा, भैया, बाहर आओ, चलते हैं। उन्हें गोली लगी थी। जैसे ही गाड़ी से नीचे उतरे, दो कदम चलकर गिर गए। फिर कभी उठे नहीं। विद्या भैया (विद्याचरण शुक्ल) की गाड़ी के करीब जाकर उन्हें बाहर निकालने में मदद की। गोलियों से लहूलुहान विद्या भैया कराहते हुए पानी-पानी कह रहे थे। विचलित करने वाला वह दृश्य आज भी सोने नहीं देता है।
'बस्तर टाइगर' महेंद्र कर्मा को़ ऐसे उतारा मौत के घाट
माना जाता है कि इस हमले में मुख्य टारगेट बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा थे। सलवा जुडूम का नेतृत्व करने की वजह से नक्सली उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। नक्सलियों ने उनके शरीर पर करीब 100 गोलियां दागीं और चाकू से 50 से ज्यादा वार किए। हत्या के बाद नक्सलियों ने उनके शव पर चढ़कर डांस भी किया था।
'कांप उठती है आत्मा'
नक्सलियों के जाने के बाद सभी घायलों को एंबुलेंस से भेजा जा रहा था, लेकिन हमें नंदकुमार भैया की चिंता थी। जानकारी मिली थी कि नक्सली उन्हें ले गए हैं। ऐसे में अनहोनी का अंदेशा पहले ही लग चुका था। सुबह अस्पताल में इस बात की जानकारी मिली कि वह भी हमारे बीच नहीं रहे। वह भयावह पल याद कर आज आत्मा कांप जाती है। न जाने कितनी रातें बिना सोए गुजरीं। अपनों को खोने का दर्द रह-रहकर सता रहा है। अब बस षड़यंत्रकारियों के चेहरे सामने आने और उन्हें सजा मिलने का इंतजार है।
हमले में 32 लोग हुए थे दिवंगत
इस बड़े नक्सली हमले में बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, उदय मुदलियार, योगेंद्र शर्मा समेत कुल 30 लोग दिवंगत हो गए थे। मामले में कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर सुरक्षा में लापरवाही बरतने और राजनीतिक षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया था। झीरम हमला में लोकतंत्र पर बड़ा हमला था। कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी इस हमले में खत्म हो गई थी। 32 से ज्यादा लोग दिवंगत हुए थे।